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मिसाल : पहली बुजुर्ग महिला ट्रक मकैनिक ,समाज के एक बड़े हिस्से के मुंह पर तमाचा !

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एक भारतीय महिला की ताकत को बयां करती यह कहानी, इस कहानी को पढ़कर अब नहीं खिलाएंगे अब आप बेटियों को बासी रोटियां !

 उदय दिनमान डेस्कः मिसाल : पहली बुजुर्ग महिला ट्रक मकैनिक ,समाज के एक बड़े हिस्से के मुंह पर तमाचा ! यह कहानी उस पुरूष समाज के लिए है जो महिलाओं को पांव की जूती समझते हैं। इस कहानी को पढ़ने के बाद आप अब नहीं खिलाएंगे अब आप बेटियों को बासी रोटियां !आपका नजरियां बदल जाएगा कि महिला की ताकत क्या होती है और वह क्या कर सकती है। ध्यान दें आधुनिकता की चकाचौंध और हमारे भाग्यविधाता भी इस ओर ध्यान अवश्य दें कि कही…!

 

भारतवर्ष में महिलाओं के ताकत,वीरता और मातृत्व के कई किस्से आपने और हमने पढ़े और सुने है। कई फिल्मों,नाटको के द्वारा इनका चित्रण भी हो चुका है और नारी की शक्ति का बखान किया जा चुका है। इसके बाद भी हमारे समाज में महिलाओं के साथ जो व्यवहार किया जाता है वह शर्मनाक होने के साथ-साथ हमारे लिए कलंक के समान है। आज नवभारत टाइंस डाट काम में प्रकाशित यह कहानी दिल को छू गयी तो इसे साभार लेने और इस पर दो शब्द लिखने का मन किया। कि कैसे हमारे समाज में पुरूषों का एक खास वर्ग महिलाओं को अपने पांव की जमती समझता है।

 

जबकि हकीकत यह है कि महिला ही सवोपरि है और महिला के बिना इस मानव समाज का न तो भला हो सकता है और न ही इस समाज का उत्थान। यहां सभार लिया गया यह आलेख हमारे एक खास वर्ग को सीख देने के साथ उनकी आंखे खोलने के लिए वैसे तो काफी है, लेकिन ऐसी कई कहानियों के बाद भी आज एक खास वर्ग महिलाओं को अपने पांच की जमती ही समझता है।जो उनके हित में नहीं है यह वह भी जानते हैं इसके बाद भी आज दिन तक नहीं सुधर पा रहे हैं जबकि आज के समय में आधुनिकता की चकाचौंध में वह खुद के अस्तित्व को नष्ट करने का काम कर रहे हैं।

 

यहां साभार ली गयी यह कहानी मूल दी जा रही है। यहां से पढे़

आधा दिन ढल चुका है और दिल्ली के संजय गांधी ट्रांसपॉर्ट नगर (SGTN) में रोज की तरह आज भी चारों तरफ ट्रक ही ट्रक नजर आ रहे हैं। एशिया के सबसे बड़े ट्रांसपॉर्ट हॉल्ट के तौर पर पहचानी जाने वाली ट्रकों की इस दुनिया में घुसते ही टायर पंक्चर लगाने की एक दुकान दिखती है। दुकान के बोर्ड पर एक महिला के नाम के साथ उनका फोटो भी लगा है। शांति देवी नाम की यह बुजुर्ग महिला शायद दुकान की मालकिन हो।

 

मगर यह क्या? यहां तो शांति देवी कुछ ऐसा करती दिखती हैं, जिसे देख कोई भी हैरत में पड़ जाए। दरअसल वह करीब 45 किलोग्राम के ट्रक टायर को उठाकर उसका पंक्चर लगाती हुई दिख रही हैं। ऐसा लगता है मानो वह समाज के उस बड़े हिस्से को जवाब दे रही हैं, जो महिलाओं को पुरुषों से कम आंकता है। शांति देवी से बात करके पता चलता है कि उन्होंने छोटी सी उम्र में ही हर चुनौती से हिम्मत के साथ लड़ना और जिम्मेदारियां निभाना सीख लिया था। उनकी कहानी एक आम भारतीय महिला की ताकत के तमाम पहलुओं को बखूबी बयां करती है।

शांति देवी के अब तक के जीवन का शुरुआती आधा हिस्सा मध्य प्रदेश के ग्वालियर जिले में बीता। वहां शांति देवी माता-पिता, दो भाइयों और दो बहनों के साथ रहती थीं। उन्हें आज भी याद है कि उनकी मां, बेटियों को पराई संपत्ति मानकर अपने बेटों का ज्यादा ख्याल रखती थीं। उनके परिवार में जहां बेटों को खाने में दूध और मेवा तक दी जाती थी वहीं बेटियों को कई बार बासी रोटियां खिला दी जाती थीं। शांति और उनकी बहनों को पढ़ाई भी नसीब नहीं हुई।

 

इसी बीच जब शांति के बड़े भाई ने परिवार से अलग होकर अपना घर बसा लिया तो उन्होंने कई-कई घंटे कपड़े सिलकर परिवार की मदद की। यहां तक कि सिलाई करके कमाए गए रुपयों से ही उन्होंने अपनी शादी भी की।शादी के बाद शांति देवी के 4 बच्चे हुए। वह अपने नए परिवार के साथ कुछ खुशनुमा वक्त और बिता पातीं, इससे पहले ही उनके पति उनका साथ छोड़कर चले गए। अपने बच्चों को परिवरिश की जिम्मेदारी अब पूरी तरह शांति देवी के कंधों पर थी।

 

इसके लिए उन्होंने घर पर ही कपड़ों की सिलाई की, बीड़ियां बनाईं। मगर फिर भी इतनी कमाई न हो सकी कि सब कुछ सही से चल सके। शांति देवी ने हार नहीं मानी और वह अपने बच्चों को लेकर काम की तलाश में दिल्ली आ गईं।दिल्ली आने के बाद शांति देवी ने SGTN में चाय की दुकान खोल ली। इसी जगह राम बहादुर नाम के एक शख्स रिक्शे से माल ढोले का काम करते थे। राम बहादुर की पत्नी 6 बच्चों की जिम्मेदारी उनपर छोड़कर लापता थीं। शांति देवी और राम बहादुर के आसपास काम करने वाले लोगों को इन दोनों में एक समानता नजर आई,

 

दरअसल ये दोनों ही अपने-अपने बच्चों की परिवरिश के लिए जद्दोजहद कर रहे थे। ऐसे में लोगों ने इन्हें सुझाव दिया कि अगर ये शादी कर लें तो इनके बच्चों की परिवरिश में थोड़ी आसानी होगी। दोनों को यह सुझाव सही लगा और उन्होंने तीस हजारी कोर्ट में जाकर कोर्ट मैरेज कर ली।शांति देवी के साथ अब उनके पति राम बहादुर भी चाय बेचने लगे। करीब तीन साल चाय बेचने के बाद शांति देवी और उनके पति के पास खुद का मकान था।

 

मगर दिन में 10 बच्चों की जिम्मेदारी संभालने और रात में चाय बेचने वाली शांति देवी को सोने तक का वक्त नहीं मिल रहा था। ऐसे में उन्होंने किसी ऐसे काम को करने की ठानी, जिससे दिन में ही अच्छी कमाई हो सकी। शांति देवी ने जगह (SGTN) को ध्यान में रखते हुए टायर पंक्चर की दुकान खोलने का विचार दिया, जो उनके पति को पसंद आया। दुकान खुलने के तीन महीने तक शांति देवी और उनके पति ने एक श्रमिक रख उससे इस काम को सीखा और फिर ये दोनों ही पंक्चर बनाने लग गए।

जब शांति देवी अपनी दुकान पर ट्रक टायर का पंक्चर लगाने के लिए आगे बढ़तीं तो लोग कहते, ‘आंटी आप रहने दो, आपसे नहीं होगा। अंकल को करने दो।’ इसी बीच राम बहादुर आते और कहते, ‘चिंता न करो, जो काम मुझसे नहीं होगा, उसे यह कर देंगी।’ बस फिर शांति देवी टायर के पंक्चर लगाने से लेकर उसे ट्रक में कसने तक का सारा काम खुद ही कर देतीं।

जो खुद की मदद करने में कोई कसर नहीं छोड़ते, जिंदगी से हार नहीं मानते, समाज भी उनकी मदद करने में पीछे नहीं रहता। ऐसा ही शांति देवी के साथ है। शांति देवी को अब कई सामाजिक संगठन अपने कार्यक्रमों में बुलाकर उनका सम्मान करते हैं, कई बार आर्थिक मदद भी दी जाती है। शांति देवी अब 65 साल की हो चुकी हैं। वह मानती हैं कि पति-पत्नी के रिश्ते में गाड़ी के दो पहियों जैसा तालमेल होना चाहिए, दोनों को एक दूसरे की जरूरतों और तकलीफों को समझना चाहिए।

अक्षय प्रताप/गौरी शंकर नवभारतटाइम्स.कॉम से साभार व आंशिक संसोधित

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