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विशाल देहधारी देव  भैरव हैं भय के देवता  !

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भैरवः पूर्णरूपेहि शंकरस्य परात्मनः, मूढ़ास्तेवै न जानन्ति मोहिताः शिवमायया 

भारतीय संस्कृति प्रारंभ से ही प्रतीकवादी रही है और यहाँ की परम्परा में प्रत्येक पदार्थ तथा भाव के प्रतीक उपलब्ध हैं। यह प्रतीक उभयात्मक हैं – अर्थात स्थूल भी हैं और सूक्ष्म भी। सूक्ष्म भावनात्मक प्रतीक को ही कहा जाता है -देवता। चूँकि भय भी एक भाव है, अत: उसका भी प्रतीक है – उसका भी एक देवता है और उसी भय का हमारा देवता हैं- महाभैरव।

उत्तराखंड सदा से अलग ही पहचान रखता है अब हालांकि राज्य अलग बन गया, लेकिन यूपी के समय भी इस भू-भाग के बारे में देश ही नहीं बल्कि विदेश में भी अलग पहचान रही। सकारात्मक और नकारात्मक दोनों की प्रकार की। यहां प्रकृति के अकूत खजाने की खोज के लिए प्रतिवर्ष लाखों लोग आते-जाते है तो यहां की कुछ खास खासियते भी लोगों को यहां खीच लाती थी और है। कोई माने या न माने लेकिन यह सत्य है कि आज भी पहाड में अगर किसी से दुष्मनी है तो उस पर भैरव लगाने और उसके बर्बाद करने के लिए सिर्फ अपने अराध्य का आहवान ही काफी है। यह हकीकत है।

इस आलेख के माध्यम से हमारा उदृदेश्य किसी को डराने का नहीं बल्कि उस सत्य से आपको रूवरू करवाना है कि उत्तराखंड में आज भ साक्षात रूप में भगवान वास करते है और अगर जो इस धरती पर कदम भी रखता है वह भी सच्चे मन से तो उसकी सारी समस्याएं दूर हो जाती है। यहां बात भैरव की कर रहे है। सनातन धर्म में भैरव को भगवान शिव के क्रोध रूप को माना गया है और कहते है कि भगवान शिव आज भी क्राधित रूप में यहां साक्षात वास करते है।

यही कारण है कि पहाड में आज भी आपसी झगडों में एक दूसरे पर भैरव लगाने की प्रथा है जो तत्काल अपना प्रभाव दिखते है एसे भैरव नाथ जी के वारे में कुछ जानकारी आप तक पहुंचा रहे है।अब आप समझ गए होंगे कि यहां क्यो भैरव को भय का देवता कह रहे है। चलिए कुछ जानते है भैरव के बार में।

कहा जाता है कि उत्तराखंड के हर कंकड पत्थर में शिव का वास है और यहां के हर पत्थर में भी शिव के भैरव का रूप है यही कारण है कि उत्तराखंड के हर गांव हर मोहल्ले हर खेत और हर बाडे में भैरव नाथ का वास स्थानीय लोग मानते पूजते है। यहां के हर गांव में भगवान शिव की पूजा अलग-अलग रूपों में की जाती है। हिमालय किसी तिलिस्म से कम नहीं इसका प्रत्यक्ष साक्षात्कार करना है तो आइए हिमालय उत्तराखंड के गांवों में और कीजिए भगवान शिव के अनेक रूपों का दर्शन। यहां हम भैरव नाथ जो शिव के क्रोध से उत्पन्न माने जाते है के बारे में कुछ जानकारी देना चाहते है।आठों भैरवों के पौराणिक एवं स्थानिक नाम दे दिए गए हैं।यही भैरव समस्त केदारखण्ड के मुख्य भैरव तथा अधिपति माने जाते हैं।शिवमहापुराण में भैरव को परमात्मा शंकर का ही पूर्णरूप बताते हुए कहा है :-शिव और भौरव का उत्तराखंड के हिमालय से गहरा नाता पुराणों में कहा गया है।

ऊखीमठ  में अष्टरूपी भैरव का अवतरण

वीरशैवागमों के अनुसार :- धरती के सर्वाधिक प्राचीन तीर्थों में सम्मिलित श्री आसमातीर्थ ( ऊखीमठ ) में अष्टरूपी भैरव का अवतरण उस समय हुआ जब भगवान् शिव आसमाद्वीप, जो कि आसमा समुद्र में बसा हुआ था तथा भगवान् उस द्वीप में लिङ्गवास धारण ( ओंकार लिङ्ग ) करके समाधि में लीन थे।किन्तु उसी समय अंधकासुर नामक दैत्य अपने घमण्ड में उन्मत्त होकर आसमा द्वीप की ओर बढ़ा और भगवान् शिव के तीर्थ के ऊपर से युद्ध करने का दुःसाहस करने लगा। किन्तु जैसे ही वो भगवान् शिव के निकट पहुंचा और उनका तिरस्कार करने लगा तो समाधि में स्थित भगवान् शिव के शरीर से रक्तवर्ण एवं तामसी कुल की एक भीषण एवं करालाकृति वाली छाया निकली । इस छाया को देख दैत्यों ने एक समय तो इसका उपहास उड़ाया किन्तु जैसे ही यह छाया स्पष्ट हुई तो इस छाया ने भीषण एवं कराल आकृति वाली विशालकाय देह धारण की. भगवान् शिव ने इस विशाल देहधारी देव को भैरव के नाम से सम्बोधित किया जो कि उनके ही शरीर के अंश से उत्पन्न हुआ था । महाभैरव के नाम से जाना जाने लगा ।

भैरव को काल भैरव के नाम से जाना जाने लगा

और इसके पश्चात इस भैरव ने उन दैत्यों का भीषण रूप से संहार करना प्रारम्भ किया और इसी कारण दैत्यों की अत्यंत तीव्र गति से संहार करने के कारण इसे संहार भैरव के नाम से जाना जाने लगा और दैत्यों के संहार के पश्चात इस भैरव के शरीर का वर्ण अति कृष्ण हो गया और देवी पार्वती ने इसे असितांग नाम से सम्बोधित किया ( असितांग का अर्थ होता है :- काले अंगों वाला ) और तब से इसे असितांग के नाम से जाना जाने लगा। और भगवान् शिव के अंश से उत्पन्न होने के कारण इस भैरव ने शिव के समान स्वरुप धारण किया तथा शिव स्वरुप होने के कारण देवी लक्ष्मी ने इसे रूद्र भैरव के नाम से सम्बोधित किया तथा तब से इसे रूद्र भैरव के नाम से भी जाना जाने लगा। इस प्रकार दैत्यों द्वारा शिव के अपमान को होता देख इस भैरव ने अपनी दाढ़ काल से समान खोल दी और इन दैत्यों का भक्षण कर दिया और अपने प्रचण्ड स्वरुप को धारण किया ।इस कारण इस भैरव को काल भैरव के नाम से जाना जाने लगा।

आठों स्वरूपों का अवलोकन

और दैत्यों के दुःसाहस के कारण इस भैरव का अंग क्रोध के कारण कम्पायमान होने लगा और क्रोधवश उस भैरव ने अपने पादों को भूमि पर पटक दिया जिससे भूमि में भयानक कम्पन्न हुआ और अनेकों दैत्य उस कम्पन्न से चेतनाशून्य होकर भूमि पर गिर पड़े। भैरव के इस क्रोधित स्वरूप के कारण ही अग्निदेव ने इसे क्रोध भैरव के नाम से पुकारा। और अत्यंत क्रोध में आने से उस भैरव के केश तथा नेत्र अग्नि तथा ताम्र के समान वर्ण के हो गए और उनसे अग्नि के समान लपटें निकल रही थी। इस कारण भैरव को ताम्रचूड़ / ताम्रनेत्र के नाम से जाना जाने लगा। तथा समस्त दैत्य भैरव के इन सातों भीषण रूपों को देखकर भयभीत हो गए।और तत्काल उस स्थान से पलायन कर गए। दैत्यों के जाने के पश्चात उस भैरव ने अंत में अपनी जटायें बाँध दी। और क्योंकि उस भैरव की उत्पत्ति शिव के अंश से ही हुई थी ।इसलिए वह भैरव भी शिव स्वरुप में उपस्थित हो गया ।और उस भैरव के मुण्ड में चन्द्र भी सुशोभित होने लगा और इस कारण इस भैरव को चंद्रचूड़ भैरव के नाम से भी जाना जाने लगा ।सभी देवताओं ने इस भैरव के दर्शन किये और इसके आठों स्वरूपों का अवलोकन किया।

आसमाद्वीप के रक्षक के रूप में नियुक्त

इसी कारण इस भैरव को तब से अष्टरूपी भैरव के नाम से जाना जाने लगा। किन्तु उसी समय ब्रह्माजी ने भी भगवान् शिव की वेशभूषा को देखकर अहंकार के वशीभूत होकर उनका उपहास उड़ाना प्रारम्भ किया ।किन्तु जैसे ही उन्होंने शिव का तिरस्कार किया उसी समय भगवान् शिव के गात्र से पुनः उस महाभैरव ( अष्टरूपी ) की उत्पत्ति हुई और वह ब्रह्माजी का संहार करने के लिए आगे बढ़ने लगा और उसके रूप से भयभीत होकर सृष्टि रचियता के मुख से एकाएक चीख निकल पड़ी और उनकी चीख सुनकर ही भगवान् शिव ने उस भैरव को शांत होने का आदेश दिया।और भगवान् शिव के आदेश को श्रवण करने के पश्चात वह भैरव शांत हुआ ।इसके पश्चात ब्रह्मा जी ने भगवान् शिव से क्षमा मांगी और उनका अहंकार भी तत्काल नष्ट हो गया।मार्गशीष मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी के दिन से ही ब्रह्माजी का अहंकार नष्ट हुआ था। इसीलिए इस दिन को भैरव अष्टमी के नाम से जाना जाता है।आसमा द्वीप में हीभगवान् शिव ने इस भैरव को अपनी पुरी अर्थात काशी का नगरपालक नियुक्त किया और आसमाद्वीप के रक्षक के रूप में नियुक्त किया था।

आठों भैरवों के पौराणिक एवं लोक प्रचलित नाम निम्न हैं :

  • 1:- महाभैरव ( स्थानीय भाषा में भुकुण्ड भैरव )
  • 2:- संहार भैरव ( स्थानीय भाषा में धवल भैरव )
  • 3:- असितांग भैरव ( स्थानीय भाषा में ज्वलंत भैरव )
  • 4:- रूद्र भैरव ( स्थानीय भाषा में आकाश भैरव )
  • 5:- काल भैरव ( स्थानीय भाषा में पाताल भैरव )
  • 6:- क्रोध भैरव ( स्थानीय भाषा में मार्तण्ड भैरव )
  • 7:- ताम्रचूड़ भैरव ( स्थानीय भाषा में उन्मत्त भैरव )
  • 8:- चंद्रचूड़ भैरव ( स्थानीय भाषा में कपाल भैरव )

 

भगवान शिव के १५ अवतरों में भैरवगढ़ी

भगवान शिव के १५ अवतरों में भैरवगढ़ी का नाम भी आता है। और इन्ही कालभैरव का सुप्रसिद्ध धाम भैरवगढ़ी है। लैन्सडाऊन से लगभग १७ किलोमीटर दूर राजखील गांव की पहाड़ी पर यह देवस्थल स्थित है। इस स्थल पर कालनाथ भैरव की नियमित पूजा होती है। कालनाथ भैरव को सभी चीजें काली पसंद होती हैं यही कारण है कि कालनाथ भैरव के लिये मण्डवे के आटे का रोट प्रसाद के रूप में बनाते हैं।

गढ़वाल के रक्षक के रूप में अर्थात द्वारपाल के रूप में भैरव (भैरों) का बहुत बड़ा महत्व माना गया है। भैरव के अनुयायी पुजारी और साधक भैरवगढ़ी की चोटी पर जाकर साधना कर आज भी सिद्धि प्राप्त करते हैं ।इस स्थान का अपना एक एतिहासिक महत्व भी है। भैरवगढ़ गढ़वाल के ५२ गढ़ों में से एक है और इसका वास्तविक नाम लंगूरगढ़ है। संभवतया लांगूल पर्वत पर स्थित होने के कारण इसे लंगूरगढ़ कहा गया है। लंगूरगढ़ सन १७९१ तक बहुत शक्तिशाली गढ़ था ।

दो वर्ष तक गोरखों की फौज ने इसे जीतने के लिये घेराबन्दी की थी २८ दिनों तक निरंतर संघर्ष के उपरान्त भी गोरखा पराजित हुये और वापस चले गये थे । थापा नामक एक गोरखे ने लंगूरगढ़ में भैरव की महिमा को देखते हुये वहां ताम्रपत्र चढ़ाया था इस ताम्रपत्र का वजन एक मन (४० किलो) का बताया जाता है ।यहां भैरव की गुमटी पर ही मन्दिर बना हुआ है। गुमटी के बाहर बायें हिस्से में शक्तिकुण्ड है। यहां भक्तों के द्वारा चांदी के छत्र चढ़ाये जाते हैं। यहां श्रद्धालु भक्तजन नित्य ही पहुंचते हैं। यहां नवविवाहित वर वधु भी मनौतियां मांगने पहुंचते हैं

कालभैरव की पूजा पूरे देश में होती है

कालभैरव की पूजा पूरे देश में होती है और अलग-अलग अंचलों में अलग-अलग नामों से वह जाने-पहचाने जाते हैं। महाराष्ट्र में खण्डोबा उन्हीं का एक रूप है और खण्डोबा की पूजा-अर्चना वहाँ ग्राम-ग्राम में की जाती है। दक्षिण भारत में भैरव का नाम शास्ता है। वैसे हर जगह एक भयदायी और उग्र देवता के रूप में ही उनको मान्यता मिली हुई है और उनकी अनेक प्रकार की मनौतियां भी स्थान-स्थान पर प्रचलित हैं। भूत, प्रेत, पिशाच, पूतना, कोटरा और रेवती आदि की गणना भगवान शिव के अन्यतम गणों में की जाती है। दूसरे शब्दों में कहें तो विविध रोगों और आपत्तियों विपत्तियों के वह अधिदेवता हैं। शिव प्रलय के देवता भी हैं, अत: विपत्ति, रोग एवं मृत्यु के समस्त दूत और देवता उनके अपने सैनिक हैं। इन सब गणों के अधिपति या सेनानायक हैं महाभैरव। सीधी भाषा में कहें तो भय वह सेनापति है जो बीमारी, विपत्ति और विनाश के पार्श्व में उनके संचालक के रूप में सर्वत्र ही उपस्थित दिखायी देता है।

भगवान शंकर के अंश

‘शिवपुराण’ के अनुसार मार्गशीर्ष मास के कृष्णपक्ष की अष्टमी को मध्यान्ह में भगवान शंकर के अंश से भैरव की उत्पत्ति हुई थी, अतः इस तिथि को काल-भैरवाष्टमी के नाम से भी जाना जाता है। पौराणिक आख्यानों के अनुसार अंधकासुर नामक दैत्य अपने कृत्यों से अनीति व अत्याचार की सीमाएं पार कर रहा था, यहाँ तक कि एक बार घमंड में चूर होकर वह भगवान शिव तक के ऊपर आक्रमण करने का दुस्साहस कर बैठा. तब उसके संहार के लिए शिव के रुधिर से भैरव की उत्पत्ति हुई।

शिव के अपमान-स्वरूप भैरव की उत्पत्ति

कुछ पुराणों के अनुसार शिव के अपमान-स्वरूप भैरव की उत्पत्ति हुई थी। यह सृष्टि के प्रारंभकाल की बात है। सृष्टिकर्ता ब्रह्मा ने भगवान शंकर की वेशभूषा और उनके गणों की रूपसज्जा देख कर शिव को तिरस्कारयुक्त वचन कहे। अपने इस अपमान पर स्वयं शिव ने तो कोई ध्यान नहीं दिया, किन्तु उनके शरीर से उसी समय क्रोध से कम्पायमान और विशाल दण्डधारी एक प्रचण्डकाय काया प्रकट हुई और वह ब्रह्मा का संहार करने के लिये आगे बढ़ आयी। स्रष्टा तो यह देख कर भय से चीख पड़े। शंकर द्वारा मध्यस्थता करने पर ही वह काया शांत हो सकी। रूद्र के शरीर से उत्पन्न उसी काया को महाभैरव का नाम मिला। बाद में शिव ने उसे अपनी पुरी, काशी का नगरपाल नियुक्त कर दिया। ऐसा कहा गया है कि भगवान शंकर ने इसी अष्टमी को ब्रह्मा के अहंकार को नष्ट किया था, इसलिए यह दिन भैरव अष्टमी व्रत के रूप में मनाया जाने लगा। भैरव अष्टमी ‘काल’ का स्मरण कराती है, इसलिए मृत्यु के भय के निवारण हेतु बहुत से लोग कालभैरव की उपासना करते हैं।

काशी का काल भैरव मंदिर सर्वप्रमुख

भारत में भैरव के प्रसिद्ध मंदिर हैं जिनमें काशी का काल भैरव मंदिर सर्वप्रमुख माना जाता है। काशी विश्वनाथ मंदिर से भैरव मंदिर कोई डेढ़-दो किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। दूसरा नई दिल्ली के विनय मार्ग पर नेहरू पार्क में बटुक भैरव का पांडवकालीन मंदिर अत्यंत प्रसिद्ध है। तीसरा उज्जैन के काल भैरव की प्रसिद्धि का कारण भी ऐतिहासिक और तांत्रिक है। नैनीताल के समीप घोड़ाखाल का बटुकभैरव मंदिर भी अत्यंत प्रसिद्ध है। यहाँ गोलू देवता के नाम से भैरव की प्रसिद्धि है। इसके अलावा शक्तिपीठों और उपपीठों के पास स्थित भैरव मंदिरों का महत्व माना गया है। जयगढ़ के प्रसिद्ध किले में काल-भैरव का बड़ा प्राचीन मंदिर है जिसमें भूतपूर्व महाराजा जयपुर के ट्रस्ट की और से दैनिक पूजा-अर्चना के लिए पारंपरिक-पुजारी नियुक्त हैं। मध्य प्रदेश के सिवनी जिले के ग्राम अदेगाव में भी श्री काल भैरव का मंदिर है जो किले के अंदर है जिसे गढ़ी ऊपर के नाम से जाना जाता है।

अचानक पागल कुत्तों का एक पूरा समूह कहीं से निकल पड़ा

कहते हैं औरंगजेब के शासन काल में जब काशी के भारत-विख्यात विश्वनाथ मंदिर का ध्वंस किया गया, तब भी कालभैरव का मंदिर पूरी तरह अछूता बना रहा था। जनश्रुतियों के अनुसार कालभैरव का मंदिर तोड़ने के लिये जब औरंगज़ेब के सैनिक वहाँ पहुँचे तो अचानक पागल कुत्तों का एक पूरा समूह कहीं से निकल पड़ा था। उन कुत्तों ने जिन सैनिकों को काटा वे तुरंत पागल हो गये और फिर स्वयं अपने ही साथियों को उन्होंने काटना शुरू कर दिया। बादशाह को भी अपनी जान बचा कर भागने के लिये विवश हो जाना पड़ा। उसने अपने अंगरक्षकों द्वारा अपने ही सैनिक सिर्फ इसलिये मरवा दिये किं पागल होते सैनिकों का सिलसिला कहीं खु़द उसके पास तक न पहुँच जाए।

प्रस्तुति और संकलन- बीना बेंजवाल

अगर आपके पास है धर्म मठ मंदिर से संबंधित कोई जानकारी तो आप भेजे

udaydinmaan@gmail.com

 

 

 

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