udaydinmaan, News Jagran, Danik Uttarakhand, Khabar Aaj Tak,Hindi News, Online hindi news खोट धर्म में नहीं, उसे तोडऩे मरोडऩे वाले लोगों में है: सोनाक्षी सिन्हा

खोट धर्म में नहीं, उसे तोडऩे मरोडऩे वाले लोगों में है: सोनाक्षी सिन्हा

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सोनाक्षी सिन्हा अपनी पीढ़ी की इकलौती ऐसी ऐक्ट्रेस हैं, जो फिल्मों के साथ-साथ टीवी पर भी लगातार सक्रिय हैं। इन दिनों वे भक्ति गीतों पर आधारित सिंगिंग रिऐलिटी शो ओम शांति ओम में जज की कुर्सी पर नजर आ रही हैं। ऐसे में हमने उनसे धर्म और आस्था के जुड़े कुछ सवालों के जवाब जानने की कोशिश की…

 

ओम शांति ओम आपका तीसरा टीवी शो है। आप अपनी पीढ़ी की इकलौती ऐक्ट्रेस हैं, जो टीवी पर इतनी सक्रिय हैं। इसकी वजह क्या है?
टेलिविजन की पहुंच बहुत है। हर घर में टीवी होता है। लोग बिना थिअटर जाए, बिना टिकट खरीदे घर में शोज देखते हैं। मेरे हिसाब से टीवी की पहुंच फिल्मों से कहीं ज्यादा है, तो ऑडियंस से एक कनेक्ट होता है।

 

मुझे बहुत मजा आता है, जिस तरह के शोज मैंने अब तक किए हैं, सिंगिंग शोज, डांसिंग शोज, क्योंकि वे मेरे प्रफेशन का बहुत बड़ा हिस्सा हैं। फिर इतना टैलंट भी देखने को मिलता है। ओम शांति ओम में भी इतना नया कॉन्सेप्ट लेकर आए हैं कि हमारी पीढ़ी, जो दिव्य गानों से, भक्ति के गानों से, संस्कृति से भटक गई हैं, उन्हें दोबारा उस ओर मोड़ रहे हैं। ये वे पुराने गानें हैं, जो हमारे पैरंट्स सुनते आ रहे हैं, हम बचपन में सुनते थे, तो उन्हें री-पैकेज करके पेश करना काफी इंट्रेस्टिंग है।

 

आपके हिसाब से युवा पीढ़ी का इन भक्ति गीतों से जुड़ाव क्यों जरूरी है?
मेरा मानना है कि हमें अपनी जड़ों को भूलना नहीं चाहिए। चाहे अफ्रीकन हों, चाइनीज हों या फिर जापान में देख लीजिए, वे सभी अपनी भाषा से, अपनी जड़ों से, अपनी संस्कृति से इतने जुड़े रहते हैं, तो हम क्यों न जुड़ें? और क्योंकि हमारे देश में इतनी विविधता है, इतनी सारी संस्कृतियों का मेल है, इतना खूबसूरत इतिहास है, तो उसे बचाना बहुत जरूरी है, ताकि हम आने वाली पीढ़ी को भी ये विरासत सौंप पाएं। मुझे खुशी है कि आज के यूथ के तौर पर मैं इसमें अपनी तरफ से थोड़ा सा ही सही, योगदान दे रही हूं।

 

युवा पीढ़ी के हमारी संस्कृति से दूर होने की क्या वजह मानती हैं आप?
आज की पीढ़ी के पास विकल्प बहुत हैं। बहुत सारी चीजों में दिमाग भटक जाता है, वह चाहे टेक्नॉलजी हो, सोशल मीडिया हो या और दूसरी बहुत सारी चीजें हैं। ढेरों विकल्प हैं आजकल की पीढ़ी के पास, जिसकी ओर वे जा रही हैं। पश्चिमी सभ्यता का प्रभाव भी है।

 

आप खुद आस्था और भक्ति में कितना यकीन रखती हैं?
मैं स्पीरिचुअल हूं। मैं यकीन करती हूं कि एक शक्ति है, जिसका हाथ हमारे सिर पर है, जिसकी वजह से हम सक्सेसफुल बनते हैं, जिसकी वजह से हम आगे बढ़ते हैं। खुशकिस्मती से मेरे साथ सब बहुत अच्छा रहा है, करियर के लिहाज से भी और पर्सनली भी। मैं मानती हूं कि भगवान हमारे अंदर होता है। मेरी मां बहुत आस्तिक हैं। वे बहुत मंदिरों में जाती हैं, तीर्थ करती हैं। मैं एक आर्य समाज स्कूल में पढ़ी हूं तो मुझे इन दिव्य गीतों, श्लोकों की थोड़ी-बहुत जानकारी भी है।

 

ऐसा भी कहा जाता है कि धर्म और आस्था हमें रूढि़वादी बनाती है, आडंबरों में उलझाती है। आपकी इस बारे में क्या राय है?
धर्म हमें रूढि़वादी नहीं बनाता है, लोग बनाते हैं। जो हमारे धर्म में लिखा है, वही मुसलमानों के धर्म में भी लिखा है, अंग्रेजों के धर्म में भी वही लिखा है लेकिन आदमी उसको तोड़-मोडक़र अपनी सहूलियत के हिसाब बिगाड़ देता है। हमें यह समझ होनी चाहिए कि मेरे धर्म में जो लिखा है, क्या मैं उसे फॉलो कर रही हूं या मैं अंधे की तरह किसी इंसान को फॉलो कर रही हूं। ये सोचने-समझने की जरूरत है, वरना आप कुरान खोल लीजिए, गीता खोल लीजिए, सबमें सीख वही है।

 

दुनिया भर की औरतों ने इन दिनों शोषण के खिलाफ प्तरूद्गञ्जशश मुहिम छेड़ी हुई है। पिछले दिनों पीरियड्स के लिए प्त॥ड्डश्चश्च4ञ्जशक्चद्यद्गद्गस्र अभियान छेड़ा गया था। एक यंग विमन के प्रतिनिधि के तौर पर आप ये देखकर क्या महसूस करती हैं?
एक लडक़ी या औरत होने के नाते बहुत जरूरी है कि हम एक-दूसरे को सपॉर्ट करें, लेकिन देखा जाता है कि हमेशा हम औरतों के बारे में ही ये नारे लगाए जाते हैं, जो अत्याचार उन पर होता है, उसके बारे में बातें की जाती हैं, लेकिन ये कर कौन रहा है, उसके बारे में बात नहीं करते। हम 50 फीसदी आबादी हैं

 

दुनिया की, फिर भी हमें क्यों अपने हक के लिए ढिंढोरा पीटना पड़ता है? हम ये क्यों नहीं सामने लाते कि वे कौन हैं, जो हमें इस स्थिति में लाकर खड़ा कर रहे हैं? वे जो भी हैं, उन्हें ये नहीं करना चाहिए। मैं एक ऐसी दुनिया चाहती हूं, जहां हमें हर तरह से बराबरी का हक मिले। चाहे वह सम्मान की बात हो, लडक़े-लडक़ी की परवरिश में जिस तरह का भेदभाव होता है, उसकी बात हो, चाहे आर्थिक स्थिति की बात हो।

 

आप किसी भी फील्ड में देख लीजिए, बिजऩस, स्पोर्ट्स या एंटरटेनमेंट, हमेशा लडक़ी को कम फीस मिलती है। मैं ऐसी दुनिया में रहना चाहती हूं, जहां बराबरी हो, लेकिन मुझे लगता है कि थोड़ा-बहुत अप्रोच औरतों को भी बदलना होगा कि हक लेना पड़ेगा, ऐसे लडऩे से बात नहीं बनेगी। लडक़े तो नहीं कहते न कि हमें हक चाहिए तो हमें भी ठान लेना चाहिए कि हम बराबर हैं।

 

आपके लिए फेमिनिज़म के क्या मायने हैं? आपको एक औरत होने के नाते कभी गैर-बराबरी झेलनी पड़ी है?
मेरे लिए फेमिनिज़म का मतलब हमेशा से बराबरी मिलना रहा है। मर्दों को कोसने को मैं फेमिनिज़म नहीं मानती हूं। फेमिनिज़म वह है, जहां हम एक-दूसरे को सपॉर्ट करें, एक-दूसरे को आगे बढ़ाएं और एक-दूसरे का सहारा बनें। ये मेरा फेमिनिज़म है। औरत होने के नाते गैर बराबरी की बात करूं, तो वह फिलहाल फीस को लेकर ही दिखती है।

 

मैं ऐसे परिवार में पैदा हुई हूं, जहां मेरे भाइयों और मेरी परवरिश में कोई भेदभाव नहीं हुआ। हालांकि मैं उस बहुत छोटे हिस्से में से हूं, जहां ऐसा होता है। वरना बहुत से घर हैं इस देश में, इस दुनिया में, जहां लड़कियों को पहले से ही समझाया-बुझाया जाता है कि आप कमतर हैं। यह भी एक बदलाव है, जो मैं देखना चाहती हूं।

 

एक भेदभाव यह भी देखने को मिलता है कि विमिन सेंट्रिक फिल्मों का बजट हीरो वाली फिल्मों से काफी कम होता है। क्या ये भी एक साइकॉलजी है?
साइकॉलजी की ही बात है, बजट की बात नहीं है। लोगों को हीरो को देखने की इतनी आदत पड़ चुकी है कि उन्हें दस बार सोचना पड़ता है कि अच्छा, ये हिरोइन की फिल्म है, तो हम देखने जाएं या नहीं, ये भी एक मानसकिता है, जिसे हमें बदलना होगा। फिर भी हम उम्मीद कभी नहीं छोड़ेंगे। हम अपना काम करते जाएंगे। अच्छी फिल्में बनाएंगे, अच्छा काम करेंगे। जिसे देखना है देखे, जिसे नहीं देखना है, न देखे।

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