udaydinmaan, News Jagran, Danik Uttarakhand, Khabar Aaj Tak,Hindi News, Online hindi news खतराः हिमालय में महाविनाशकारी प्रलय आने के संकेत ! 

खतराः हिमालय में महाविनाशकारी प्रलय आने के संकेत ! 

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30 मीटर ऊंची, 50 से 60 मीटर लंबी और करीब डेढ सौ मीटर चौड़ी झील बनने की संभावना ,धारा के मुहाने पर करीब 30 मीटर ऊंचे मलबे का ढेर दे रहा महाप्रलय को आमंत्रण

उदय दिनमान डेस्कः खतराः हिमालय में महाविनाशकारी प्रलय आने के संकेत ! जी हां, यह सत्य है और यह महाप्रलय जल्द आने वाला है और इसकी शुरूआत हो गयी है। गोमुख में झील बननी शुरू हो गयी है और भू वैज्ञानिको के अनुसार यह महाविनाशकारी होगी इसके संकेत मिल रहे हैं।

 

 

हिमालय में सुनामी आप सभी ने वर्ष 2013 में देखी जिसके जख्म आज भी हरे हैं। इस सुनामी को करीब से देखने वाले इसके गवाह है कि कैसी थी हिमालयी सुनामी। अब फिर एक महाविनाशकारी सुनामी आने वाले है वह भी हिमालय से जो आएगी तो मानव सभयता का ही अंत हो जाएगा। अगर वैज्ञानिकों की बात को मान लिया जाए तो इसके संकेत मिल गए है और अभी से हमे संभलना होगी नहीं तो वह महाविनाशकारी प्रलय क्या रूप लेगा यह कहा नहीं जा सकता है।आज आवश्यकता है ऐसे महाविनाशकारी महाप्रलय को रोकने के लिए जन जागरूकता अभियान की।

 

 

आपको बता दें कि उत्तराखंड राज्य के हिमालय क्षेत्र में भागीरथी के मुहाने गोमुख पर झील बन जाना केदारनाथ से भी बडी भीषण आपदा के संकेत दे रहा है। जानकारों की माने तो केदार आपदा से पहले चौराबाड़ी ग्लेशियर में भी झील बनी थी ठीक उसी तरह की झील गंगोत्री ग्लेशियर में बन रही है। चौराबाड़ी ग्लेशियर की झील के कारण साल 2013 में केदारनाथ में जलप्रलय के हालात बने थे।वो जख्म आज भी नहीं भर पाए हैं।इन जख्मों पर राजनीतिक रोटिया सेकने वाले आज भी रोटियों को सेंक रहे हैं।

 

 

जैसा कि आप जानते हैं कि चौराबाड़ी ग्लेशियर में बन रही झील और उसकी वजह से होने वाले नुकसान के संकेत वैज्ञानिकों ने 2004 में पहले ही दे दिए थे। उस वक्त अगर हुक्मरान हिमालय के बदलते मिजाज को हल्के में न लेते तो आज केदार पुनर्निर्माण में सियासत के कई सवाल पैदा ही नहीं होते। उस समय हिमालय की नब्ज पर नजर रखने वालों की सलाह और संकेतों पर नजरे इनायत होती तो हजारों जाने बचाई जा सकती थी और केदारघाटी के दामन पर लगे शमशान के दाग को लगने से बचाया जा सकता था।

 

 

बहरहाल एक बार फिर हिमालय पर संकट मंडरा रहा है आशंका जताई जा रही है कि गंगोत्री में बन रही झील उस झील की तुलना में चार गुना बड़ा आकार ले सकती है।भू-विज्ञानियों ने कहा है कि गोमुख में बन रही झील को बेहद गंभीरता से लिया जाना चाहिए। वाडिया हिमालय भूसंस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. पीएस नेगी ने बताया कि इसी साल जुलाई में आई बाढ़ के बाद गोमुख में झील का बनना शुरू हुआ है। बाढ़ के कारण धारा के मुहाने पर करीब 30 मीटर ऊंचे मलबे का ढेर लग जाने से ऐसा हुआ जो आने वाले समय में महाविनाश के रूप में उभरने वाला है।

 

 

ताजा हालात में गोमुख में तकरीबन चार मीटर गहरी झील बनने के साथ-साथ गंगा की दिशा में भी बदलाव आ गया है। जो धारा पहले सीधे बहती थी, वह भी अब दायीं तरफ से बहने लगी है। वैज्ञानिकों का मानना है कि बदलते हिमालय के मिजाज में कभी यह बहाव भी रुक गया तो यहां 30 मीटर ऊंची, 50 से 60 मीटर लंबी और करीब डेढ सौ मीटर चौड़ी झील बन जाएगी। ऐसे में 30 मीटर ऊंचा मलबे का ढेर, जो बोल्डर, रेत और आइस ब्लॉक से बना है, एक झटके में टूट जाएगा। जिसका नतीजा जल प्रलय के रूप में सामने आएगा। गौमुख का दौरा कर लौटे वैज्ञानिकों का अनुमान है कि जब महज सात मीटर गहरी और 100 मीटर से भी कम चौड़ी चौराबाड़ी झील के फटने से केदारघाटी तबाह हो गई थी तो गोमुख में बन रही झील का अंजाम क्या होगा।

 

 

वाडिया हिमालय भूसंस्थान के वैज्ञानिक कहते हैं कि उच्च हिमालयी क्षेत्र होने के कारण मलबे के ढेर से छेड़छाड़ करना उचित नहीं है। किया यही जा सकता है कि ऐहतिहात के तौर पर गोमुख के निचले क्षेत्रों जैसे गंगोत्री आदि में खतरे का आकलन कर सुरक्षा के सभी इंतजाम पुख्ता कर लिए जाएं। इसके साथ ही प्रकृति से छेडछाड को रोका जाए ताकी आने वाले समय में इस महाआपदा को रोका जा सके।इसके लिए सरकार और प्रशासन के साथ ही आम जन को भी जागना होगा ताकी वह अपनी सभयता और संस्कृति के साथ अपने अस्तित्व को भी बचा सके। इसके लिए पहल की आज नितांत आवश्यकता है।

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