जहां हैं दस लाख पंजीकृत बेरोजगार वही *बेशर्मीभरा खेल* !

दीपक आज़ाद-
उत्तराखंड की विधानसभा में हुई नियुक्तियों का मामला हाईकोर्ट पहुंच गया है। एक जनहित याचिका पर नैनीताल हाईकोर्ट ने विधानसभा सचिव को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।
पिथौरागढ़ निवासी राजेश चंदौला ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कहा कि राज्य की विधानसभा में निर्वतमान अध्यक्ष गोविन्द सिंह कुंजवाल ने डेढ़ सौ से अधिक पदों पर गैर कानूनी तरीके से भर्ती की है।

 

 

राज्य की विधानसभा में राज्य गठन के वक्त से ही चला आ रहा नियुक्ति घोटाला हाईकोर्ट पहुंचने से जुगाड़बाजी से भर्ती हुए करीब चार सौ कर्मचारियों में हड़कंप मच गया है। हांलाकि हाईकोर्ट में केवल निर्वतमान अध्यक्ष के कार्यकाल में हुई नियुक्तियों का ही मामला उठाया गया है, लेकिन जब इस मामले की सुनवाई आगे बढ़ेगी तो राज्य गठन के वक्त से ही गैरकानूनी तरीके से हुई भर्तियों का भी इसकी चपेट में आना तय है।

गोविन्द सिंह कुंजवाल ने इस घोटाले के हाईकोर्ट पहुंचने पर जिस तरह यह कहते हुए अपना बचाव करने की कोशिश की है कि उन्होंने अपने पूर्ववर्ती अध्यक्षों की ही परम्परा को आगे बढ़ाया है, वह काफी कुछ कह देता है।

 

यह उत्तराखंड में ही हो सकता है कि अब तक जितने भी विधानसभा अध्यक्ष नियुक्ति हुए उन्होंने अपने और अपनी सरकार के नेताओं के चहेतों को विधानसभा में नौकरी देेने के लिए कानून की पूरी बेशर्मी के साथ धज्जियां उड़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

 

राज्य की विधानसभा में एक बड़ी संख्या नेताओं के बेटे-बेटियों, बहुओं और रिश्तेदारों की नियुक्ति की गई है। इसमें पत्रकार भी पीछे नहीं हैं। कई पत्रकारों ने अपने सगे-संबंधियों को विधानसभा में नेताओं से मिलीभगत कर नियुक्ति दिलाई है।
नवम्बर 2000 में जब उत्तर प्रदेश से पृथक होकर उत्तराखंड एक राज्य के रूप में वजूद में आया तो तब उत्तर प्रदेश विधानसभा से मात्र 27 कर्मचारी ही नये राज्य की विधानसभा में सेवा देने के लिए आए थे।

 

आज राज्य गठन के बाद इन सत्रह सालों में विधानसभा सचिवालय में एक भी नियुक्ति सार्वजनिक तौर पर विज्ञप्ति प्रकाशित कर नहीं हुई। जबकि विधानसभा में चोर दरवाजे से बीजेपी की अंतरिम सरकार से शुरू हुआ सिलसिला यहां तक पहुंच गया है कि अब विधानसभा में कार्मिकों की संख्या चार सौ का आकड़ा पार कर गया है।


अंधेरगर्दी का आलम यह है कि विधानसभा अध्यक्षों ने अपने विशेषाधिकार का हवाला देते हुए लोक सेवा आयोग के मातहत आने वाले पदों पर भी चोर दरवाजे से नियुक्तियां कर डालीं। इस घोटाले को रचने में कांग्रेस और भाजपा दोनों ही दलों ने कोई कसर नहीं छोड़ी।

 

साल 2013 में विजय बहुगुणा की सरकार ने तो बाकायदा ऐसी नियुक्तियों को वैधानिकता का आवरण तक दे डाला। यह देखना भी कम दिलचस्प नहीं होगा कि भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टाॅलरेंस का बखान करने वाली भाजपा सरकार और विधानसभा अध्यक्ष प्रेमचंद अग्रवाल इस पूरे घोटाले पर क्या रूख अख्तियार करते हैं जब कि इस घोटाले में भाजपा का भी उतना ही योगदान है जितना कि कांग्रेसियों का।

 

अब जबकि यह मामला एक जनहित याचिका के तौर पर हाईकोर्ट पहुंच गया है तो उम्मीद की जानी चाहिए कि अदालत गैर कानूनी तरीके से राज्य गठन के वक्त से ही नियुक्ति घोटाला करने वालों के खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलाने के साथ ही अब तक चोर दरवाजे से हुई नियुक्तियों को गैरकानूनी घोषित कर नई नियुक्तियों का आदेश जारी करेगा।

 

अगर ऐसा होता है तो प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले नौजवानों को विधानसभा में नियुक्ति का रास्ता मिल पाएगा। राज्य में करीब दस लाख पंजीकृत बेरोजगार हैं।

दीपक आजाद वरिष्ठ पत्रकार है और watchdogpatrika.com/ के संपादक है

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