भारत में ’’आईवीएफ तकनीक’’ द्वारा हिमीकृत भ्रूण से जन्मे, प्रथम बछड़े की घोषणा

देहरादून। जे.के. बोवाजेनिक्स (जे.के. ट्रस्ट की एक पहल, जो कि देश की एक सबसे बड़ी गैर सरकारी संस्था में से एक है, तथा जो गाय एवं भैसों में कृत्रिम गर्भाधान तकनीक द्वारा नस्ल सुधार की दिशा में उल्लेखनीय कार्य कर रही है), ने आज भारत में हिमीकृत भ्रुण से आईवीएफ तकनीक द्वारा प्रथम मादा बछिया का जन्म 28 दिसम्बर 2016 को हुआ तथा प्रथम नर बछड़ा ’’कृष्णा’’ का जन्म 08 जनवरी 2017 को हुआ, एवं तीसरे नर बछड़ा जिसका भी जन्म 08 जनवरी 2017 को हुआ, ये सभीे राजस्थान राज्य के मूल गोवंश थारपारकर नस्ल के हैं, केे जन्म की पुष्टि की ।

दाता (डोनर) गाय जो थारपारकार नस्ल की हैे तथा हिमीकृत आईवीएफ भ्रुण से उत्पन्न उनके तीनो बछडे़, एवं इन भु्रणों को जिस संकर नस्ल के ग्राही (रेसिपियेन्ट) गायों में प्रत्यारोपित किया गया था वे सभी स्वस्थ हैं। इसके अतिरिक्त फ्रेश भ्रूण से दो अन्य बछडे़ (एक नर तथा दूसरा मादा) का जन्म, 23 दिसम्बर और 24 दिसम्बर 2016 को हुआ। ये बछड़े गोपालनगर स्थित ’’डा.ॅ विजयपत सिंघानिया सेन्टर आफ एक्सीलेन्स फॉर असीस्टेड रिप्रोडक्टीव टेक्नालाजिस इन लाइवस्टाक’’ केन्द्र में उत्पन्न हुए है। इस नवीन तकनीक के हस्तक्षेप से भारत के विकास के इतिहास में एक नया परिवर्तन आयेगा, जिससे बेहतर अनुवांशिक वाले देशी नस्ल के गायों के संख्या में वृद्धि होगी, फलस्वरूप हमारे देश में दुध उत्पादन में उत्तरोत्तर वृद्धि होगी।

भारत सरकार के राष्ट्रीय गोकुल मिषन के तर्ज पर, इस पहल के द्वारा देशी नस्ल के गायों में दुध उत्पादन में वृद्धि करने की दिशा में यह एक क्रांतिकारी कदम होगी। जे.के. बोवाजेनिक्स ने सन् 2020 तक लगभग 10000 गायों में आईवीएफ तकनीक के द्वारा गर्भाधारण करने का लक्ष्य रखा है। इस महत्वपूर्ण अवसर पर जे.के. ट्रस्ट के चेयरमेन डॉ. विजयपत सिंघानिया ने बताया कि जे.के. बोवाजेनिक्स का शुभारंभ भारत में पषुधन विकास की दिशा मंे एक क्रांतिकारी कदम है, जो कि उच्च अनुवांशिक एवं गुणवत्ता वाले गायों की संख्या में तेजी से वृद्धि करने मंे सहायक होगी। फलस्वरूप कम समय में अधिक से अधिक दुध उत्पादन किया जा सकेगा। जे.के. ट्रस्ट द्वारा की जा रही यह दूसरी महत्वपूर्ण पहल हैं।

प्रथम पहल, ’’गाय एवं भैंसों में नस्ल सुधार कार्यक्रम’’, जो देश के कुल 10 राज्यों के 40 हजार गॉवों में संचालित किया जा रहा है, तथा जिसके अभुतपूर्व परिणाम सामने आये हैं। इन दोनांे परियोजनाओं के द्वारा ग्रामीणों को पर्याप्त मात्रा में दुध उपलब्ध हो सकेगा, जिसे न सिर्फ बाजार में विक्रय कर अपने आय में वृद्धि कर पायेंगे बल्कि घर में स्वंय के उपयोग के लिये भी पर्याप्त मात्रा में दुध उपलब्ध हो सकेगा।

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