उत्तराखंड में हुक्कमरानों का शराब प्रेम, बदल दिए मानक ! अब गाँव में खुलेंगे ठेके!

राज्य में नयी सरकार की पहली कैबिनेट में फैसला! शराब के लिए 64 स्टेट हाईवे जिला हाईवे बनेंगे। अब शहर से गाँव में खुलेंगे ठेके।

शराब के लिये बदल दिये सडक़ो के मानक! पीढ़ियां यों ही तबाह होंगी। लेकिन  जारी है। डेनिस का विरोध हमज चुनावी जुमला साबित हुआ।

संतोष बेंजवाल
देहरादून। उत्तराखंड की जनता ने देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर इस समय जो जनादेश दिया था उसके बाद लोगों को उम्मीद थी कि राज्य का गठन जिस उदृदेश्य के लिए किया गया था वह जल्द साकार होगा, लेकिन राज्य सरकार की कैबिनेट के फैसले ने उत्तराखंड के आमजन मानस को अपने फैसले पर सोचने को मजबूर कर दिया है कि क्या उसने सही किया या गलत! क्योंकि खासकर पिछली सरकार ने राज्य में कोदा झंगोरा और गाड गदेरों की बात तो की थी लेकिन वह सिर्फ भाषणों तक की सीमित रही और वर्तमान सरकार के प्रथम फैसले से ही उत्तराखंड के हजारों लोगों का दिल टूटना स्वाभाविक है। क्योंकि जहहां हमारी मातृशक्ति जिस शराब का विरोध करने के लिए रात न दिन देख रही और शराब के खिफ आंदोलन को तेज करने में लगी है वही सरकार ने अब बाजारों के बजाय गांवों में शराब के ठेके खुलवाने की पहल की है तो फिर कैसे कोई सोचेगा नहीं और अपने फैसले पर पछतावा नहीं करेगा!

 

सत्ता चाहे कांग्रेस ती हो या भाजपा की वह माफिया हितों की संरक्षक रही है पिछली कांग्रेस सरकार में यह बात साबित हो चुकी थी और अब भाजपा सरकार ने भी उसी प्रेम को उजागर कर दिया है। प्रदेश की महिलाओं के आंदोलन को कूचलने के जिए जो तरीका खोजा गया है वह काबिले तारीफ है या फिर न्यायालय के खिलाफ यह सोचना वाला विषय है। क्योंकि माननीय न्यायालय ने जो फैसला दिया था उस फैसले के बाद उत्तराखंड सरकार द्वारा जो निर्णय लिया गया है वह राज्य हित है या नहीं यह तो पता नहीं, लेकिन यह जरूर है कि शराब से अब तक जितनी पीढिया बर्वाद हो रही थी अब उसके दोगुने पर आंकडा पहुंच जागएा।

 

उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद बंदी की कगार पर पहुंचे ठेके अब फिर से गुलजार हो जायेंगे। सरकार ने इन शराब के ठेकों को गुलजार रखने के लिए राज मार्गों को राज्य मार्ग बना दिया।इस समय पूरे पहाड़ में मातृशक्ति शराब के खिलाफ आन्दोलन कर रही है। यह वहीं मातृशक्ति है जिसने उत्तराखण्ड राज्य के आन्दोलन में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी और राज्य के गठन तक अपना संधर्ष जारी रखा। आज वही मातृशक्ति शराब के खिलाफ आन्दोलन कर रही है और सरकार के इस निर्णय के बाद इस शक्ति को बड़ा आघात पहुंचा है। पहाड़ शराब के खिलाफ खड़ा है और जिस मातृशक्ति ने इस राज्य को पाने में अपना सब कुछ कुर्वान कर दिया वह इस समय एक बार फिर से शराब के खिलाफ सडक़ों पर है लेकिन शुक्रवार को राज्य की कैबिनेट ने एक ऐसा फैसला दे दिया जो कि यहां के आम जनमानस के गले में नहीं पा रहा है। सरकार के इस फैसले के पीछे तरह तरह के कयास लगाये जा रहे हैं। एक ओर सरकार राजस्व का रोना रो रही है वहीं दूसरी ओर आम आदमी इसको लेकर कई तरह के कयास लगा रहा है।

वरिष्ठ पत्रकार पुरूषोतम असनोडा लिखते हैं कि प्रदेश सरकार द्वारा 64 स्टेट हाई वे जिला सडक में बदलने का नोटीफिकेशन सर्वोच्च न्यायालय की आखों में धूल झौंकना तो है ही प्रत्यक्षरुप से शराब माफिया के हितों का संरक्षण और जनता की जेब में डाका डालने, स्वास्थ्य को जानबूझ कर बिगाडने, सामाजिक माहौल खराब होने को दावत देना है. जिन चिंताओं को लेकर माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने नेशनल व स्टेट हाई वे से शराब की दुकानें हटाने का निर्देश दिया था उन चिन्ताओं को नजर अंदाज करने का काम उत्तराखण्ड सरकार ने किया है.
उत्तराखण्ड में राजस्व का रोना रोकर शराब को प्रोत्साहन ही बल्कि राजस्व पर अर्थ व्यवस्था की निर्भरता बताने वाली निर्लज्ज सत्ता को आधी आवादी के सरोकारों से कुछ लेना देना नहीं है.

 

नोटीफिकेशन के यथावत रहने वाली 155 शराब ठेकों से 300 करोड  राजस्व की बात कही जा रही है, ये मान लिया जाय कि 300 करोड सरकार को राजस्व देने वाले शराब माफिया को उन होने वाली दुर्घटनाओं, बिमारियों, सामाजिक व आर्थिकी को नुकसान करने का पूरा लाइसेंस नहीं मिल गया. सरकार को दिये जाने वाले राजस्व के बदले माफुया क्या 10 गुना नही कमायेगा और यह लूट परिवार के उन दुश्मनों की जेब से ही आयेगी जिस जेब घर-परिवार, बच्चों के खान-पान, चिकित्सा, स्वास्थ्य, मनोरंजन, शिक्षा- दीक्षा पर खर्च करना था.
सत्ता चाहे कांग्रेस ती हो या भाजपा की वह माफिया हितों की संरक्षक रही है.

 

क्या कारण है कि उत्तराखण्ड हाईकोर्ट द्वारा चमोली, रुद्रप्रयाग व उत्तरकाशी जिलों में शराब की दुकान बन्द करने के निर्णय के विरुद्ध सरकार सर्वोच्च न्यायालय जाकर स्थगनादेश लाती है लेकिन विद्यालयों में शिक्षकों की नियुक्ति व अस्पतालों में चिकित्सकों की नियुक्ति पर मौन साध लेती है? अतिथि शिक्षकों की नियुक्ति से लेकर वे फुटवांल बने हैं लेकिन सरकार आश्वासन की घुट्टी के अलावा कुछ नहीं करना चाहती. बच्चों की पढाई और शिक्षण माहौल की चिन्ता नहीं है.


उत्तराखण्ड को देवभूमि कहा जाता है और रिकार्ड तोड से बहमुत से आयी भाजपा को उसे अच्छा प्रदेश बनाने से यदि कोई रोकता है तो उसके निहित स्वार्थ हो सकते हैं, उसकी जनता के प्रति प्रतिबद्धताओं का आभाव हो सकता है और सबसे अधिक उस जनता को ठेंगा दिखाने का दु:साहस है जिसके बूते सत्ता मिली है.

 


सरकारों के भरोसे रहने के बजाय जनता को अपने बूते शराब के खिलाफ कमर कसनी होगी और वर्तमान आन्दलन को संगठित आन्दोलन में तब्दील करना होगा. शाराब के खिलाफ जो भी आन्दोलन हुए वे सरकार के निर्णयों के खिलाफ रहे हैं और आन्दोलन के दबाव ने कई बार शराबबन्दी करने को बाध्य किया है. एक बार फिर सरकार जन आन्दोलन को आमंत्रण दे रही है जनता को शराब से मुक्ति के लिए यह चुनौती स्वीकारनी होगी.

 

पत्रकार अनिल सती अपनी फेसबुक वाल पर इस बारे में लिखते हैं किसरकार इस समय पूरी तरह से शराब माफियाओं के चंगुल में काम कर रही है। कहा जा रहा है कि पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद से यहां कई ठेके बंदी की कगार पर पहुंच चुके थे और ऐसे में शराब की एक लाबी से जुड़े कारोबारियों को हर रोज लाखों का नुकसान हो रहा था। इस लाबी को फायदा पहुंचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का तोड़ निकाला गया और राज मार्गों को राज्य मार्ग बनाने की घोषणा कर दी गयी। यदि सूत्रों की बात को सही माने तो यह निर्णय सरकार का नहीं बल्कि शराब के कुछ ऐसे कारोबारियों का हो जो कि सरकार में उंची पहुंच रखते हैं और किसी भी निर्णय को अपने पक्ष में करवा सकते हैं। बताया जा रहा है कि पिछले दिनों इन कारोबारियों ने एक बड़ी डील इसी बात को लेकर की कि किसी तरह से सडक़ के किनारे खुले ठेकों को बंद न किया जा सके। सूत्र तो यहां तक कह रहे हैं कि आने वाले दिनों में सरकार अब गावों में भी ठेके खोलने की योजना बना रही हैं। इस सब को अब पर्यटन प्रदेश के नाम पर भुनाने का प्रयास किया जा रहा है। कहा जा रहा है कि सरकार के इस निर्णय के बाद कुछ खास लोगों को बड़ा फायदा मिलेगा।

 

 

कैबिनेट के महत्वपूर्ण निर्णय
1. राज्य के शहरी स्थानीय निकाय क्षेत्रों की सीमा के अंदर आने वाले राजमार्गाें में जनसंख्या दबाव सहित मार्ग के किनारों पर भवन निर्माण, गतिविधियों में अधिक वृद्धि होने, मार्ग में सीवर लाइन, नाली, बिजली के स्तम्भ/ट्रांसफार्मर, टेलीफोन लाइन, स्थानीय निकाय के होर्डिंग आदि होने के कारण मार्ग के इन भागों का रख-रखाव और अन्य विकास व विस्तार ‘राजमार्ग’ की विशिष्टियों के अनुरूप किये जाने में व्यवहारिक कठिनाई आ रही है।
इस लिये राज्य मार्गाें के वे भाग जो किसी भी शहरी स्थानीय निकाय यथा नगर निगम, नगर पालिका परिषद अथवा नगर पंचायत की सीमा से गुजरते हों, को राज्यमार्ग की श्रेणी से अवर्गीकृत(डिनोटीफोई) करते हुए इस भाग को अन्य जिला मार्ग में वर्गीकृत किया गया है। राज्य में 64 राज्य मार्ग हैं जिनमें 63 नगर निकाय पड़ते हैं।
2. राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण नियमावली में संशोधन-पूर्व में अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के अध्यक्ष पदेन सदस्य होंगे। अब दोनों आयोग अलग-अलग हैं, इसलिए दोनों आयोगों के अध्यक्ष पदेन सदस्य होंगे।
3. भारत सरकार की रिजनल कनेक्टिविटी स्कीम के अंतर्गत एटीएफ(एअर टरबाइन प्यूल) पर VATघटाकर एक प्रतिशत किया गया था। अभी तक सभी विमानन कम्पनियां इसका फायदा लेती थीं। अब यह लाभ कनेक्टिविटी योजना के अंतर्गत संचालित कम्पनियां से ही एक प्रतिशत VAT लिया जायेगा। शेष 20 प्रतिशतVAT दंेगी।
4. कृषि भूमि को बंधक बनाकर ऋण लेने वाले कृषकों को 05 लाख रूपये तक सीमा में स्टाम्प शुल्क में छूट अब 05 वर्षाें के लिए।
5. प्रत्येक माह के दूसरे और चैथे बुधवार को सायं 04 बजे कैबिनेट मीटिंग होगी। कैबिनेट के लिए विभागीय टिप्पणी एक हफ्ते पहले मा.मंत्रिगणों को भेजना अनिवार्य किया गया हैं
6. राजभवन संविलन नियमावली में संशोधन 30 सितम्बर 2010 की कट आॅफ डेट बढ़ाकर एक फरवरी 2012 किया गया ।
7. नामिका अधिवक्ताओं की फीस राज्य सरकार द्वारा दिया जाता था। अब राष्ट्रीय विधिक प्राधिकरण फीस देगा।

PropellerAds