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गूगल को विदेश पैसे भेजने पर देना होगा टैक्स

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मुंबई। दुनिया के सबसे बड़े इंटरनेट सर्च इंजन गूगल के लिए एक बुरी खबर है। इनकम टैक्स डिपार्टमेंट के साथ गूगल इंडिया के छह वर्ष पुराने विवाद में डिपार्टमेंट के पक्ष में फैसला आया है।यह फैसला कुछ अन्य मल्टीनैशनल कंपनियों के लिए भी एक मिसाल है।

 

यह विवाद गूगल इंडिया और उसके आयरलैंड में मौजूद ऑफिस के बीच फंड फ्लो से जुड़ा था। आयरलैंड को अपने आसान टैक्स नियमों के लिए जाना जाता है। बेंगलुरु में इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने पाया था कि गूगल इंडिया कई वर्षों से भारत में ऐडवर्टाइजिंग से मिलने वाले रेवेन्यू का एक हिस्सा गूगल आयरलैंड (जीआईएल) को भेज रही थी।

 

उसने इन ट्रांजैक्शंस पर आपत्ति जताई थी। डिपार्टमेंट के अनुसार, गूगल आयरलैंड को फंड भेजने पर कोई टैक्स नहीं काटा जा रहा था, जो टैक्स से बचने का एक स्पष्ट मामला था।गूगल इंडिया ने डिपार्टमेंट के इस दावे का विरोध किया था। यह विवाद असेसमेंट ईयर 2007-08 से 2012-13 से जुड़ा था।

 

इनकम टैक्स अपीलेट ट्राइब्यूनल (आईटीएटी) ने मंगलवार को गूगल इंडिया की अपील खारिज करते हुए कहा, असेसी (गूगल इंडिया) और जीआईएल का इरादा स्पष्ट है कि वह भारत में टैक्स का भुगतान करने से बचना चाहती थी।

 

असेसी का कर्तव्य था कि वह जीआईएल को भुगतान के समय टैक्स काटे, लेकिन कोई टैक्स नहीं काटा गया और भुगतान करने के लिए कोई अनुमति भी नहीं ली गई।

 

गूगल इंडिया को अब 1,457 करोड़ रुपये की रकम पर टैक्स डिमांड मिल सकती है। कंपनी ने यह रकम गूगल आयरलैंड को भेजी थी। गूगल इंडिया और गूगल आयरलैंड के बीच संबंध का केंद्र ऐडवर्ड्स प्रोग्राम है। यह ऐसा प्रॉडक्ट है, जिसके जरिए एक ऐडवर्टाइजर वेबसाइट पर विज्ञापन प्रकाशित कर सकता है।

 

गूगल इंडिया भारतीय ऐडवर्टाइजर्स के लिए गूगल आयरलैंड से ऐडवर्ड्स प्रोग्राम की ऑथराइज्ड डिस्ट्रिब्यूटर है। गूगल इंडिया अमेरिका की गूगल इंटरनैशनल एलएलसी की सब्सिडियरी है।

 

गूगल इंडिया ने कहा था कि गूगल आयरलैंड ने उसे इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स ट्रांसफर नहीं किए थे और वह केवल ऐडवर्टाइजिंग स्पेस की एक डिस्ट्रिब्यूटर है। उसके पास ऐडवर्ड्स प्रोग्राम को चलाने के लिए इस्तेमाल होने वाले इन्फ्रास्ट्रक्चर या प्रोसेस की कोई पहुंच या नियंत्रण नहीं है।

 

लेकिन इनकम टैक्स अपीलेट ट्राइब्यूनल के अनुसार, गूगल इंडिया ने गूगल आयरलैंड से इन्फर्मेशन और पेटेंट वाली टेक्नॉलजी का इस्तेमाल किया है और इस वजह से किसी विदेशी कंपनी को भुगतान करना रॉयल्टी की मद में आता है जिस पर कानून के तहत कॉन्ट्रैक्ट वाले देश, भारत में टैक्स चुकाना होगा।

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