udaydinmaan, News Jagran, Danik Uttarakhand, Khabar Aaj Tak,Hindi News, Online hindi news जुन्याळी रात स्वर्ग तारा को सुणलो तेरी मेरी बात....

जुन्याळी रात स्वर्ग तारा को सुणलो तेरी मेरी बात….

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ठेठ पहाड़ी सुरो मे लहराती इस मधुर आवाज के मुरीद लाखो दिल थे, 2004 में एक कार्यक्रम के दौरान राही जी से मिलने का सौभाग्य मिला, पहली बार अलगोजा ( विलुप्त पहाड़ी लोकवाद्य) सुनने को मिला, उस खनक की याद आज भी जेहन मे है, शायद इसिलिये राही जी को दिलो मे जिन्दा …..उत्तराखण्ड गौरव से सम्मानित उत्तराखंड के शीर्ष लोकगायक चंद्र सिंह राही जी का विगत एक साल पहले आज के ही दिन 10 जनवरी 2016 को निधन हो गया था। कुछ लोगों के लिए राही जी का जाना एक आम आदमी के जाने के समान हो सकता है लेकिन जो लोग राही जी को जानते और मानते थे उनको पता है कि राही जी के निधन के साथ ही गढ़वाली लोक संस्कृति का वट वृक्ष ढह गया है।
कोई कुछ भी कहे लेकिन यह बात सत्य है कि राही जी वास्तव सच्चे लोक साधर एवं लोक रक्षक थे। राही जी आजीवन हर मंच से अपनी संस्कृति एवं लोक मूल्यों एवं बोली-भाषाओं को बचाने के लिए अपील करते रहे।राही जी कई अन्य कई गायकों की तरह पूरी तरह से प्रोफेशनल कभी नही बन पाये। वे आजीवन अपने लोक के लिए कुछ न कुछ रचते ही रहे। राही जी ने कभी अपनी कला को पैसों के लिए नही बेचा बल्कि उन्हौंने अधिक से अधिक लेागों तक लोक की बात को पहुंचाने का प्रयास किया जिसमें वे अधिकांशतः पूरी तरह सफल भी रहे।

उत्तराखण्ड की लोक संस्कृति व बाद्य यंत्रों के मर्मज्ञ चंद्रसिंह राही दिल्ली में अपनी धर्मपत्नी व बच्चों के साथ शकरपुर में विगत चार दशक से रह रहे । वे हमेशा उत्तराखण्डी समाज से अपनी बोली, भाषा व संस्कृति को अपनाने का आवाहन करते थे। वे प्रायः गाया करते थे ‘ डांडी कांठी. जन च तन च, मनखी बदली गे……….उत्तराखण्ड रिति रिवाज ., सरगा तारा ऐ जून्येली रात, ……….। राज्य गठन के बाद उनका प्रसिद्ध गीत ‘गढ़वाली न कुमाऊॅ मी उत्तराखण्डी च …’ भी लोगों ने काफी सराहा। वे लम्बे समय से ढोल सागर सहित उत्तराखण्डी बाद्ययंत्रों पर गहन शोध कर रहे थे। वे समाज से हमेशा अपनी सांस्कृतिक धरोहर की रक्षा करने का आवाहन करते थे। वे स्वतंत्र विचारों के एक जागरूक समाजसेवी थे। वे सदा सामाजिक कुरितियों पर गहरा प्रहार करते थे। हिंदी, गढ़वाली, कुमाऊनी कविताओं के अग्रणी कवि व गायक भी थे।
28 मार्च 1942 को पौड़ी जनपद के चैंदकोट  विकासखंड एकेश्वर के अंतर्गत ग्राम गिवांली में हुआ था। उन्होंने दूरदर्शन, आकाशवाणी नजीबाबाद केन्द्र से गढ़वाली गीतों का प्रसारण किया। गरीब परिवार में जन्मे चन्द्र सिंह राही दो भाई थे। दिवंगत राही जी उत्तराखण्ड के ऐसे संगीतज्ञ थे जो यहां के हर दुर्लभ लोकवाद्य यंत्रों के मर्मज्ञ थे। उन्होने प्रदेश की कोस-कोस पर बदलने वाले लोकसंगीत पर भी उन्होंने काफी शोध भी किया। चंद्र सिंह राही को उनके पिता दिलबर सिंह ने संगीत की प्रारंभिक शिक्षा दी थी। फिर वे संगीत में ही रम गये। पूरे उत्तराखंड के पारंपरिक लोक संगीतकारों से संगीत के गुर सीखते रहे।

वे अलमस्त जीवंत कलाकार थे। वे मजदूर, गरीब, उपेक्षित व शोषित लोगों के हितों के लिए सदैव समर्पित रहे। विचारों में वे उत्तरकाशी के कॉमरेड कमलाराम नौटियाल के साथ भी जुड़े रहे और गले में हारमोनियम डाले मजदूरों की चेतना जगाने वाले गीत गाते हुए उनके साथ काफी घूमे। उत्तराखंडी संगीत के मर्मज्ञ केशव अनुरागी व आचार्य बचन सिंह से संपर्क में आने पर उनकी प्रतिभा और निखरी। जागर विद्या में वे कांसे की थाली उनकी पसंदा वाद्ययंत्र थे। चन्द्र सिंह राही जिन्होंने गढ़वाल के गीतों में समा बांधते हुये गढ़वाली भाषा को गीतों के माध्यम से देश विदेश में प्रचारित प्रसारित किया। चन्द्र सिंह राही 40 वर्षो से दिल्ली में शकरपुर में किराये के मकान में रहते थे और उनके चार पुत्र एवं एक पुत्री हैं। उन्होंने आकाशवाणी लखनऊ और नजीबाबाद से दर्जनों गीत गाये. ‘सॉली घुराघुर’ आज भी लोग नहीं भूले हैं। दर्जनों कैसेट और एल्बम में काम किया।

प्रस्तुति दीपक बेंजवाल

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