गैरसैण:उत्तराखंड के राजकीय अतिथियों की सालाना सैर स्थल बना भराड़ीसैण

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गैरसैण में विधानसभा का सत्र एक बार फिर होने जा रहा है.यह सत्र विगत दो वर्षों से राज्य की कांग्रेस सरकार द्वारा शुरू की गयी,उस वार्षिक रस्म अदायगी का हिस्सा है,जिसके जरिये न केवल मंत्री-विधायक बल्कि प्रदेश का सारा प्रशासनिक अमला गैरसैण की वार्षिक सैर-सपाटे पर आता है.यह जनता को भ्रम में रखने का कांग्रेस सरकार का प्रयास है. उत्तराखंड राज्य आन्दोलन के समय से ही जनता गैरसैण को उत्तराखंड की राजधानी के रूप में देखना चाहती थी.लेकिन राज्य में सत्तासीन होने वाली कांग्रेस-भाजपा की सरकारों ने स्थायी राजधानी के मसले को लटकाए रखा.
राज्य में सत्तासीन कांग्रेस की हरीश रावत के नेतृत्व वाली सरकार गैरसैण में विधानसभा के एक सत्र का झुनझुना थमा कर देहरादून को अप्रत्यक्ष तरीके से राजधानी बनाए रखने का इंतजाम कर रही है. यह बात, इस तथ्य से समझी जा सकती है कि भराडीसैण में विधानसभा भवन का निर्माण पूरा होते-होते देहरादून के रायपुर में भी विधानसभा और सचिवालय के निर्माण के टेंडर हो चुके हैं. सूचना अधिकार से प्राप्त दस्तावेज बताते हैं कि इस कार्यवाही को विधानसभा अध्यक्ष और विपक्षी भाजपा की सहमति प्राप्त है.यदि सरकार गैरसैण को स्थायी राजधानी बनाने का इरादा रखती है तो वह देहरादून में एक और विधानसभा भवन निर्माण क्यूँ करवा रही है ?बात यहीं पर नहीं रुकती.पिछले वर्ष गैरसैण में विधानसभा सत्र होने के बाद सरकार की तरफ से यह सूचना, समाचारपत्रों में प्रकाशित हुई थी कि भराड़ीसैण स्थित विधनासभा परिसर,सत्र के अलावा अन्य समयों में राज्य अतिथि गृह होगा.देश का कौन सा और विधानसभा परिसर है जो कि सत्र समाप्त होने के बाद राज्य अतिथि गृह में तब्दील कर दिया जाता है?वास्तविकता तो यह है कि भराड़ीसैण में हरीश रावत की सरकार ने राजकीय अतिथि गृह ही बनाया है,जो साल में एक बार देहरादून से आये राजकीय अतिथियों से गुलजार होगा और फिर वर्ष भर वीरान रहेगा !
क्या गैरसैण राजधानी की सारी लड़ाई, इस साल में एक बार गुलजार होने वाले राजकीय अतिथिगृह के लिए थी?निश्चित तौर पर नहीं.हम गैरसैण को राजधानी इस लिए बनाना चाहते थे कि सत्ता पर जनता की निगाह और नियंत्रण रहे.जनता दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों की विकटता से जूझती रहे और सत्ता,पहले से विकसित शहर- देहरादून को अपनी ऐशगाह में तब्दील कर ले,यह तो अलग राज्य के संघर्ष की अवधारणा को ही मटियामेट कर देने जैसा है.
गैरसैण में राजधानी चाहिए और राज्य के सामने मुंह बाए खड़े सवालों के जवाब के साथ चाहिए.आज संघर्ष इन दोनों ही मोर्चों पर जरुरी है.उत्तराखंड राज्य का आन्दोलन पलायन से निजात पाने के लिए था.लेकिन राज्य निर्माण के 16 सालों में पलायन की गति ही है,जो सर्वाधिक बढ़ी है.हज़ारों गाँव खाली हो चुके हैं.पर्वतीय क्षेत्रों को ऐसे बीहड़ इलाकों के रूप में प्रचारित किया जा रहा है,जहाँ न साधन सम्पन्न लोग रहना चाहते हैं,न अफसर आना चाहते हैं.पर्वतीय कृषि बदहाल है.उसको उन्नत करने और निवेश करने के बजाय उसे सूअर,बन्दर आदि जंगली जानवरों के रहमोकरम पर छोड़ दिया गया है.पहाड़ी क्षेत्रों में मनुष्य की भी यही हालत है.
बेरोजगारी निरंतर बढ़ी है. सरकार सिर्फ ठेके के रोजगार देना चाहती है और स्थायी व नियमित रोजगार की मांग करने वाले निरंतर सडको पर पीटे जा रहे हैं.चिकित्सा व्यवस्था लड़खड़ा चुकी है.अस्पतालों के नाम पर बड़े-बड़े भवन तो हैं पर उनमे न डाक्टर हैं,न इलाज. राज्य में माफिया ताकतें हावी हैं.शराब,खनन के माफिया की पौ बारह है.राज्य सरकार के निर्णयों में उनके हितों की छाया देखी जा सकती है.जमीन बचाने के बजाय बेचने के रास्ते हरीश रावत की सरकार सुगम बना रही है.सरकार का इरादा है कि बाहरी लोगों के लिए राज्य में भूमि खरीद की सीमा को 250 वर्ग मीटर से बढ़ा कर 500 वर्ग मीटर कर दिया जाए.यह कदम साफ़ तौर पर जमीन के माफिया के हक़ में है.आपदा प्रभावितों के पुनर्वास की योजना नहीं है,एक पुल सरकार नहीं बना पायी है.पर अपने संगीत करियर के उतार की ओर बढ़ रहे एक गायक का खाता, जरुर सरकार आपदा मद के करोड़ों रुपयों से भर रही है.
पुनर्वास और रोजगार यदि किसी को प्राप्त हो रहा है तो वह नौकरशाहों को.इस फेरहिस्त में सबसे ताजातरीन नाम राज्य के मुख्य सचिव शत्रुघ्न सिंह का है.वे रिटायर होने से पहले ही मुख्य सूचना आयुक्त के पद से नवाज दिए गए हैं.यह भी सत्ता और विपक्ष यानि कांग्रेस और भाजपा का संयुक्त उपक्रम है.
गैरसैण राजधानी का सवाल किसी स्थान मात्र का आन्दोलन नहीं है.बल्कि यह राज्य की अवधारणा से जुड़े सवालों का भी आन्दोलन है.इसलिए गैरसैण राजधानी की मांग करते हुए राज्य के तमाम सवालों को उठाया जाना बहुत जरुरी है.राजकीय अतिथियों की सालाना सैर हमें स्वीकार नहीं,उत्तराखंड के हितों के साथ खिलवाड़ हमें बर्दाश्त नहीं.
आईये सालाना सैर पर आये अतिथियों के समक्ष गैरसैण स्थायी राजधानी और उत्तराखंड के तमाम सवालों को बुलंद किया जाए.
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दीपक बेंजवाल

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