एक लाइन सुनकर फिल्म के लिए राजी हो गई: आलिया

आलिया भट्ट ने साल 2012 में स्टूडेंट ऑफ द इयर से बॉलिवुड में कदम रखा। पिछले 5 साल में वह अपने शानदार अभिनय से सफलता के हाइवे पर इतनी आगे बढ़ गई हैं कि सिर्फ 2 स्टेट्स ही नहीं बल्कि पूरा देश उनका दीवाना है। वह इतनी जहीन अदाकारा बन चुकी हैं कि जितनी आसानी से बद्रीनाथ की दुल्हनिया बनती हैं, उतनी ही सहजता से कश्मीरी जासूस बनने के लिए भी राजी हो जाती हैं। मेघना गुलजार के डायरेक्शन में बनी फिल्म राजी के ट्रेलर लॉन्च के मौके पर आलिया ने हमसे बात की:

हमने सिर्फ फिल्म की झलक देखी है और अभी से फिल्म का इंतजार कर रहे हैं। आपने जब यह कहानी और किरदार सुना, तो आपके मन में क्या भाव थे?
मैंने यह कहानी शूटिंग से एक-डेढ़ साल पहले सुनी थी। तब मेघना के पास कोई स्क्रिप्ट नहीं थी। सिर्फ एक लाइन की कहानी थी कि एक कश्मीरी लडक़ी है सहमत। उसकी पाकिस्तान में शादी हो जाती है। उसे वहां जासूसी करनी पड़ती है और आखिर में यह होता है। मैंने इतना ही सुना और मैं हैरान हो गई। अमूमन, मैं ऐसा करती नहीं हूं कि एक लाइन सुनकर फिल्म को हां कह दूं, लेकिन यह कहानी सुनकर मुझे लगा कि यह एक जबरदस्त फिल्म बन सकती है। तब मैंने मेघना से कहा कि आप जब भी यह फिल्म बनाना, प्लीज मुझे फोन करना। मैं इसमें बहुत इंट्रेस्टेड हूं। फिर एक दिन फोन आ गया। अच्छी बात यह रही कि जंगली पिक्चर्स के साथ धर्मा प्रॉडक्शन मिलकर यह फिल्म बना रहे हैं, तो यह मेरे लिए और भी स्पेशल हो गया।

सहमत के किरदार में बहुत सी परतें हैं। एक ओर वह मासूस सी शादीशुदा लडक़ी है, दूसरी ओर जासूस भी है। आपके लिए यह रोल कितना चुनौतीपूर्ण था और इसके लिए क्या तैयारियां करनी पड़ी?
चुनौतीपूर्ण तो था, लेकिन मुझे सबसे अच्छी बात यह लगी कि वह बेशक एक जासूस है लेकिन ऐसा नहीं है कि अचानक वह जीआईजो जैसी बन गई है या ऐक्शन फाइटर बन गई है। जासूस होने के बावजूद वह सहमी सी नाजुक लडक़ी है। उसमें अचानक सुपरपावर नहीं आ जाती। उसके लिए अपने देश के प्रति प्यार सबसे बढक़र है। इस फिल्म में ऐसा है कि जैसे मैं सहमत का किरदार निभा रही हूं, वैसे ही सहमत भी एक किरदार निभा रही है। वह असल में एक जासूस है, लेकिन पत्नी का रोल निभा रही है, तो मेरे लिए चुनौती यह थी कि मैं उसकी यह असल पहचान छिपा सकूं। उसे एक सामान्य लडक़ी बनाए रखना बहुत जरूरी था। तैयारियां ज्यातार टेक्निकल रहीं। मुझे भाषा पर फोकस करना था। मोर्स कोड, जिसके जरिए उस दौर में मेसेज भेजे जाते थे, मैंने वह सीखा, वे कोड याद किए, क्योंकि मैं चाहती थी कि स्क्रीन पर जब वह दिखें, तो सही दिखें। ऐसा न लगे कि मैं फालतू में टकटक टकटकज् कर रही हूं। बाकी, शूटिंग के वक्त कोई तैयारी नहीं की जा सकती। तब आपको उस सफर पर ही निकलना पड़ता है और सीन को पकडक़र चलना पड़ता है।

कहते हैं कि एक कलाकार जब एक किरदार निभाता है, तो उसे अपना कुछ देता है और उससे कुछ सीखता है। आपने सहमत को क्या दिया और उससे क्या सीखा?
मेरा मानना है कि मैं जब कोई भी किरदार निभाती हूं, तो उसे जो मैं दे सकती हूं, वह है अपना टाइम, अपना ध्यान, अपना प्यार और अपना दिल। इसके अलावा, मैं उसमें अपना कुछ और डाल ही नहीं सकती, क्योंकि वह मैं हूं नहीं। वह कोई और है। इसीलिए, मैं जो भी किरदार निभाती हूं, उसे अपना लेती हूं। खुद को घर पर छोड़ देती हूं। यह इतना आसान नहीं होता, लेकिन कोशिश करती हूं कि मैं वही किरदार बन जाऊं। वैसे, यह मैं अकेले नहीं कर सकती हूं। मेरे निर्देशक मेरे लिए इसमें वही काम करते हैं, जो शरीर के लिए हड्डियां करती हैं। उनके मार्गदर्शन के बिना मैं एक पलक भी नहीं झपका सकती।

 

अपनी इस फिल्म की निर्देशक मेघना गुलजार के साथ कैसा तालमेल रहा? आपने 3 महिला निर्देशकों के साथ काम किया है। आपको लगता है कि उनकी संवेदशनशीलता पुरुष निर्देशकों से अलग होती है?
नहीं, मुझे ऐसा नहीं लगता। निर्देशक तो निर्देशक होता है। लोगों को ऐसा लगता है कि वे ज्यादा फेमिनीन होंगी, लेकिन मुझे कोई ऐसा अंतर नहीं दिखाई दिया। मेघना उतनी ही सशक्त हैं, बल्कि मुझे लगता है कि सेट पर लोग उनसे ज्यादा डरते हैं। लोगों को लगता है कि फीमेल डायरेक्टर्स को ज्यादा पता है। मेघना के साथ मेरी ट्यूनिंग बहुत सहज थी। वह मुझे समझती हैं। वह किरदार को समझती हैं। मुझे ऐसा कभी नहीं लगा कि वह इंतजार कर रही हैं कि मैं अच्छा टेक दूं या बुरा टेक दूं। वह सेटिंग और सीन्स को लेकर बहुत सेंसिटिव थी। उनका यह कहना था कि मैं जैसा महसूस कर रही हूं, वैसे किरदार को निभाऊं।

 

यह फिल्म 1971 के दौर में है और इसमें हिंदुस्तान-पाकिस्तान का जो रिश्ता दिखाया गया है, वह कमोबेश अब भी वैसा ही है। आपकी इस बारे में क्या राय है?
यह कॉमेंट करने के लिए एक कठिन मुद्दा है। हमारी फिल्म के ट्रेलर में एक लाइन है, वतन के आगे कुछ भी नहीं, खुद भी नहीं। जैसे मेरा वतन है, वैसे उनका भी वतन है। मेरे हिसाब से देश के लिए प्यार का भाव सबके लिए एक है। आप चाहे जिस भी देश में यह फिल्म देखो। ये कोई मेरा देश, तेरा देश वाली बात नहीं है। यह एक ऐसा इमोशन है, जो हर देश के लिए एक है।

 

कश्मीर में आपने अपनी एक और अहम फिल्म हाइवे शूट की थी। दोबारा वहां जाने पर कुछ यादें ताजा हुईं?
बिल्कुल, जब मैं पहलगाम की तरफ बढ़ कर रही थी, तब सिर्फ हाइवे के बारे में सोच रही थी कि इस नदी के किनारे मैं चली थी, यहां ऐसा किया था। इसीलिए, मेरे लिए यह बहुत अच्छा एक्सपीरियंस था। मैं वापस कश्मीर जाकर बहुत खुश थी। मुझे यह जानकर बहुत बुरा लगा कि लोग अब कश्मीर नहीं जाते। उन्हें लगता है कि वह सुरक्षित नहीं है, लेकिन वहां जाकर पता चला कि ऐसा कुछ नहीं है। वह बिल्कुल सुरक्षित है और लोग इंतजार कर रहे हैं कि लोग आएं, क्योंकि लोगों ने आना बंद कर दिया है। फिर, कश्मीर इतनी खूबसूरत जगह है कि वहां शूटिंग करते वक्त लगता ही नहीं कि शूटिंग कर रहे हैं, क्योंकि मौसम इतना अच्छा है, खाना इतना अच्छा है। वह वाकई जन्नत है।
इस फिल्म में आप अपनी मां के साथ भी काम कर रही हैं। वह अनुभव कैसा रहा?

 

बहुत ही अच्छा अनुभव था। मैं पहले थोड़ी सी नर्वस थी कि पता नहीं कैसे होगा? मैं चाहती थी कि अगर हम मां-बेटी एक साथ काम कर रहे हैं, तो स्क्रीन पर हमारे बीच वह केमिस्ट्री भी दिखनी चाहिए, लेकिन वह बिल्कुल मजे में थी। इस वजह से हमारी खूब जम गई।

 

कई युवा ऐक्ट्रेसेज ऐसा कहती हैं कि वह अपने उम्र के हिसाब से सॉन्ग-डांस वाले किरदार निभाना चाहती हैं। जबकि आप खुद को लगातार चैलेंज कर रही हैं। राजी का किरदार भी आपकी काफी मैच्योर है?
मैं बैलेंस करती हूं। मैं बद्रीनाथ की दुल्हनिया भी करती हूं और राजी भी करती हूं। मुझे भी डांस करना है, लेकिन मुझे जासूस भी बनना है। मुझे लगता है कि एक कलाकार का सफर ऐसा ही होना चाहिए। मैं एक ऐक्टर हूं, तो अलग-अलग किरदार निभाना ही चाहिए। यह बेसिक होता है। जैसे, अगर मैं एक शेफ हूं, तो मैं सिर्फ सैंडविच तो नहीं बनाऊंगी न। मुझे दूसरी डिशेज बनाना भी तो आना चाहिए था, वरना कोई खाना खाएगा ही नहीं।

 

यह फिल्म आईपीएल के दौरान रिलीज हो रही है। आपको लगता है कि इससे कुछ फर्क पड़ेगा?
देखिए, यह मेरा फैसला नहीं है। मैं फिल्म की प्रड्यूसर नहीं हूं। प्रड्यूसर्स ने यह फैसला लिया है, तो सोच-समझकर लिया होगा। मेरा मानना है कि आईपीएल हो या दिवाली हो। कोई हॉलिडे हो या न हो, एक अच्छी फिल्म हमेशा अपना रास्ता ढूंढ लेती है।

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