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अर्थव्यवस्था: सब्सिडी का बोझ बढऩे देगी मोदी सरकार !

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नई दिल्ली। आगामी चुनावों के दबाव में मोदी सरकार में अर्थव्यवस्था में सुधारों के फ्रंट पर समझौता साफ दिखने लगा है। मोदी सरकार ने चुनावों के दबाव में देश के बढ़ते सब्सिडी बिल को भी न केवल उसके हाल पर छोड़ दिया है बल्कि सरकार अपने कदमों से इस बिल को और बड़ा भी बना रही है।

 

हालांकि पीएम मोदी की पहचान भारत पर बढ़ते सब्सिडी बोझ को कम करने वाले नेतृत्व के रूप में बनी है लेकिन आंकड़े बताते हैं कि मोदी सरकार ने इसपर लगाम लगाने का मौका खो दिया है। एक्सपर्ट का कहना है कि मोदी सरकार भी पुरानी सरकारों जैसे कड़े फैसले लेने में नाकाम है।

चुनावी तैयारियों में मोदी सरकार द्वारा किए जा रहे समझौतों की वजह से भारत की इकॉनमी के लिए बेहद संवेदनशील इस मुद्दे से निपटना और भी कठिन हो जाएगा। एक अप्रैल से शुरू होने जा रहे वित्तीय वर्ष में भारत की फूड सब्सिडी पांच साल पहले के स्तर से दोगुना होने वाली है।

 

कच्चे तेल की कीमतों में इजाफे की वजह से गिरती तेल सब्सिडी फिर से ऊपर चढऩे लगी है। फर्टिलाइजर सब्सिडी भी जस की तस वाली स्थिति में है। वर्ष 2018-19 के लिए मोदी सरकार का कुल खर्च तो 10 फीसदी बढ़ा है लेकिन इन तीन प्रमुख सब्सिडियों के लिए आवंटन 15 फीसदी बढ़ा है।

 

पिछले साल में की तुलना में (12.6 फीसदी) इस साल यह करीब 2.4 फीसदी बढ़ा ही है। सेंटर फॉर पॉलिसी अल्टरनेटिव के चेयरमैन और वित्त मंत्रालय के पूर्व अधिकारी मोहन गुरुस्वामी का कहना है कि मोदी सरकार भी पहले के सरकरों जैसी है। मोदी सरकार भी कड़े फैसले करने में सक्षम नहीं है। उनका कहना है कि जब तक आपके पास पूंजीगत व्यय नहीं होगा आप ग्रोथ या रोजगार हासिल नहीं कर सके। पूंजीगत व्यय बढ़ाने के लिए आपको सब्सिडी घटानी पड़ेंगी।

 

मोदी सरकार की मौद्रिक चुनौतियां
2014 में प्रचंड बहुमत की लहर पर सवार होकर बनी मोदी सरकार ने संकेत दिए थे कि इकॉनमी को बूस्ट करने के लिए सब्सिडी बिल घटाया जाएगा और निवेश आकर्षित किए जाएंगे। सरकार बनने के दो महीने बाद ही वित्त मंत्री अरुण जेटली ने राजकोषीय घाटा कम करने के लिए फूड और फ्यूल सब्सिडी में ओवरहॉलिंग का प्रस्ताव दिया था।

 

जनवरी 2016 में मोदी ने कहा कि सरकार सब्सिडियों को खत्म करने की बजाय उन्हें तर्कसंगत करने की योजना बना ही है। हालांकि दिसंबर में जब मोदी के गृहराज्य गुजरात में बीजेपी को एक कठिन चुनाव लडऩा पड़ा तब सब्सिडी कटौती को लेकर सरकार का उत्साह मद्धम पड़ते दिखने लगा। इस साल मोदी के नेतृत्व में बीजेपी को आठ विधानसभा चुनाव लडऩे हैं और 2019 के शुरुआत में ही लोकसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में सब्सिडी खत्म करने के मुद्दे पर मोदी सरकार ने मौन धारण कर लिया है।

 

सीयूटीएस इंस्टिट्यूट फॉर रेग्युलेशन ऐंड कंपिटीशन के चेयरमैन और वित्त मंत्रालय के पूर्व टॉप अधिकारी अरविंद मायाराम का कहना है कि राजकोषीय घाटे का खतरा साफ और आसन्न दिख रहा है। उनका कहना है कि राजकोषीय घाटे की सीमा पहले ही पार की जा चुकी है। उनके मुताबिक बजट में सरकार ने जितना प्रस्ताव रखा उससे कहीं अधिक उसे उधार लेना पड़ सकता है।

सेफ खेल रही सरकार
जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें गिर रही थीं तब मोदी सरकार ने इस मौके को पहचाना और डीजल की कीमत को बाजार से जोड़ दिया। मोदी सरकार ने बायोमिट्रिक रजिस्ट्रेशन और डायरेक्ट कैश ट्रांसफर जैसी स्कीमों से सब्सिडी में लीकेज को कम कर 8.86 अऱब रुपये भी बचाए। इसके बावजूद सरकार का कुल सब्सिडी बिल कम नहीं हो रहा है। ग्रामीण इलाकों में एलपीजी के इस्तेमाल को बढ़ाने की स्कीम और सब्सिडी पर सस्ता खाना देने की योजनाओं से बढ़ती सब्सिडी के दबाव के और बढऩे की ही आशंका है।

 

ऑस्ट्रेलियन नैशनल यूनिवर्सिटी के अर्थशास्त्र के प्रफेसर राघवेंद्र झा का कहना है कि वस्तुओं की कीमत ऊपर जा रही है और इसका खतरा है कि तेल का बिल तेजी से बढ़ेगा। उन्होंने कहा कि सरकार से पहले सरकार सेफ खेलेगी और बढ़ती सब्सिडी एक बार फिर राजकोषीय घाटे की परीक्षा लेगी। पहले भी सरकारें सब्सिडी बढ़ाकर चुनाव जीतती रहीं हैं। यूपीए सरकार 2009 में सब्सिडी ढ़ाकर और छोटे किसानों का लोन माफकर सरकार में वापस लौटी थी। जैसा कि गुरुस्वामी कहते हैं कि चुनावी साल में मुख्य लक्ष्य चुनाव जीतना होता है न कि बजट में बैलेंस स्थापित करना।

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