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दुनिया का अकेला स्थान: यहां स्वयं मृत्यु के देवता यमराज ने की थी शिव की तपस्या !

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यमकेश्वर में है स्वयंभू शिवलिंग, यहां यमराज ने अपने प्राणों की रक्षा के लिये की थी भगवान शंकर की तपस्या

रेनू बिष्ट
यमकेश्वर, उत्तराखण्ड:  दुनिया का अकेला स्थान: यहां स्वयं मृत्यु के देवता यमराज ने की थी शिव की तपस्या ! कहते हैं कि यमकेश्वर में है स्वयंभू शिवलिंग स्थित है और यहां यमराज ने अपने प्राणों की रक्षा के लिये की थी भगवान शंकर की तपस्या कर भगवान भेले नाथ को प्रसन्न कर अपने प्राणों की रक्षा की थी और आज भी यह तीर्थ प्राण रक्षा के लिए विश्व प्रसिद्ध है।

 

उत्तराखण्ड के पौड़ी जनपद के यमकेश्वर विधानसभा क्षेत्र के अन्तर्गत शतरुद्रा (सतेड़ी) नदी के तट पर स्थित प्राचीन यमकेश्वर महादेव मंदिर में भोलेनाथ शिवलिंग के रूप में विराजमान हैं, इस मन्दिर के विषय में पुराणों में एक कथा का वर्णन है, कहते हैं कि सन्तान हीन महर्षि मृकण्ड ने सपत्नीक भगवान शंकर की कठिन तपस्या की जिससे प्रसन्न होकर भोलेनाथ ने महर्षि मृकण्ड को वर मांगने को कहा तब महर्षि मृकण्ड ने सन्तान प्राप्ति का वर मांगा, भगवान शंकर ने कहा की तुम्हारे भाग्य में संतान नही है

 

किन्तु तुमने इतनी कठिन तपस्या की है तो मैं तुम्हें सन्तान प्राप्ति का वर देता हूँ किन्तु वह सन्तान अल्पायु होगी केवल ग्यारह वर्ष तक जीवित रहेगी क्या तुम्हें स्वीकार है, महर्षि ने सहर्ष स्वीकार कर लिया, शीघ्र ही उनके घर एक तेजस्वी बालक का जन्म हुआ जिसका नाम मार्कण्डेय रखा गया, खुशी-खुशी ग्यारह वर्ष व्यतीत हुए फिर वह समय निकट आया जब उनके पुत्र के प्राण जाने को थे, पिता चिन्तित थे जिसे देख बालक मार्कण्डेय ने कारण पूछा, जब पिता ने कारण बताया तो बालक मार्कण्डेय ने पुछा कि पिताजी क्या इसका कोई उपाय है,

 

तब महर्षि मृकण्ड ने कहा कि केवल भगवान शंकर की कठिन तपस्या से ही कोई हल निकल सकता है, पिता के बताये अनुसार बालक मार्कण्डेय मणीकूट पर्वत के निकट शतरुद्रा (सतेड़ी) नदी के तट पर भगवान की रेत की मूर्ति बनाकर महामृत्युंजय मंत्र का जाप करने लगा, समय व्यतीत होता रहा निर्धारित समय पर यमराज वहाँ आये जिन्हें देख बालक मार्कण्डेय ने यमराज से विनती करी कि उनकी महामृत्युंजय स्तुति ठोड़ी अधूरी रह गयी है

 

अतः कृपा कर बस वह पूर्ण होने दें, यमराज ने उनकी बात न मानी और अपना शस्त्र कालपास तपस्वी मार्कण्डेय के ऊपर फेंका, जिससे भयभीत तपस्वी मार्कण्डेय ने रेत की प्रभू प्रतिमा को अपने दोनो हाथो से पकड़ लिया जिससे मूर्ति टूट गयी और स्वयं महामृत्युंजय भगवान रुद्र रूप में प्रकट हुए, हाथ में त्रिशूल लिये शिव के विकराल रूप को देख यमराज भयभीत होकर वहाँ से भागने लगे और जहाँ आज यमकेश्‍वर मन्दिर स्थित है वहाँ रुक कर भगवान शंकर की स्तुति करने लगे,

 

यमराज से शिव ने कहा कि जहाँ महामृत्युंजय मंत्र जाप होता हो वहाँ तुम्हें अपने शस्त्र का प्रयोग नही करना चाहिये, यमराज ने जहाँ शिवजी की स्तुति की थी वहाँ स्वयंभू शिवलिंग उत्पन्न हुआ जो यमराज के नाम से प्रसिद्ध होकर यमकेश्वर कहलाया ।

रेनू बिष्ट यमकेश्वर, उत्तराखण्ड की फेसबुक वाल से साभार

 

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