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ढोल दमाऊं कार्यशाला में गूँजेगी पहाड़ की लोकसंस्कृति

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देहरादून । ढोल दमाऊं हमारी सांस्कृतिक विरासत की पहचान है। इसके बिना हमारे लोकजीवन का कोई भी शुभ कार्य, उत्सव, त्यौहार पूर्ण नहीं हो सकता है। ढोल दमाऊं हर्ष, उल्लास और ख़ुशी का प्रतीक है।

 

यह उत्तराखंडी संस्कृति का संवाहक व सामाजिक समरसता का अग्रदूत है। ढोल से 600 से 1000 तक ताल निकलते हैं। जबकि तबले पर 300 ही बजते हैं। लेकिन उचित संरक्षण और संवर्धन के आभाव में धीरे धीरे हजारों सालों की पौराणिक विरासत गुम हो रही है। क्योंकि इसके जानकार और कलाकार बहुत ही कम रह गएँ हैं।

 

इस विधा को बचाने के लिए युद्धस्तर पर काम करना होगा। ताकि आने वाली पीढ़ी इस विधा को आत्मसात कर सकें। ढोल दमाऊं पर रास्ट्रीय स्तर और अंतरास्ट्रीय स्तर का एक कार्य्रकम तैयार किया जाना है। जिसके लिए उत्तराखंड संस्कृति विभाग द्वारा देहरादून में 6 अगस्त से 10 अगस्त तक 5 दिवसीय ढोल दमाऊं की बृहद कार्यशाला का आयोजन किया जायेगा।

 

इसमें उत्तराखंड के लोक पारम्परिक कलाकार जो ढोल दमाऊं वादन में दक्ष हो और जिनकी अधिकतम आयु 62 वर्ष हो इस कार्यशाला में भाग ले सकतें हैं। और अपना आवेदन 20 जुलाई तक संस्कृति निदेशालय, एमडीडीए कालोनी, चंद्रनगर देहरादून को भेज सकतें हैं। ढोल वादन से जुडी लोकसंस्कृति कर्मी माधुरी बर्त्वाल कहतीं हैं की ढोल हमारी लोकसंस्कृति का अहम् हिस्सा है।

 

ढोल हमारे लोक जीवन में इस कदर रचा बसा है की इसके बिना शुभ कार्य की कल्पना तक नहीं की जा सकती है। जहाँ लोग विदेशों से ढोल सागर सीखने उत्तराखंड आ रहें है वहीँ हम अपनी इस पौराणिक विरासत को खोते जा रहे हैं। ऐसे में हमें इसके संरक्षण और संवर्धन के लिए आगे आना होगा।

 

इसलिए ढोल सागर को जानने वाले कलाकारों के लिए ये एक बेहतरीन अवसर है। अपनी कला को पहचान दिलानें के लिए। आशा है की जरुर काफी संख्या में लोग इस आयोजन में शरीक होंगे। वास्तव मे ढोल दमाऊं बरसों से हमारी लोकसंस्कृति का द्योतक रहा है।

 

हेमवंती नंदन गढवाल केंद्रीय विश्वविद्यालय के लोकसंस्कृति एवं निष्पांदन कला केंद्र के निदेशक डॉक्टर दाताराम पुरोहित नें तो कई ढोल कलाकारों की कला को लिपिबद्ध और रिकार्डडिंग की है। यदि हमारे ढोल को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तरों पर नई पहचान दिलाई जानी हैं तो इस तरह के प्रयासों की सराहना की जानी चाहिए।

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