देवभूमि उत्तराखंड में पानी मिले या ना मिले शराब जरूर मिलेगी !

उदय दिनमान डेस्कः पीने का पानी मिले या ना मिले शराब जरूर मिलेगी। यह हाल है उत्तराखंड का ! राज्य बने इतना लंबा समय हो गया और आज भी यहां की जनता अपने मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रही है और सूबे के सत्तासीन है कि जनता को पानी मिले या ना मिले शराब जरूर मिलनी चाहिए कि रणनीति पर प्रदेश को चला रहे है शायद! यहां हम शराब और उसके इतिहास पर कुछ ध्यान केंद्रित करेंगे जिससे स्पष्ट हो जाएगा कि शराब आम व्यक्ति की आवश्यकता नहीं बल्कि सत्ताधीसों की आवश्यकता है। इसी पर केंद्रित पडिंत मदन मोहन जी की वाल से साभार यह अंश।

 
यदि राजस्व प्राप्ति के लिए, समाज की भावनाओं को दर किनार करके ,गरीबों और अपहाइज समाज का कोई भी शासकवर्ग प्रयोग करता है, तो महान समाज शास्त्री अरस्तू के अनुसार-इस प्रकार निष्कर्ष निकाला गया है -“किसी समाज को बर्बाद करना है तो- उस समाज के नागरिकों को नशेड़ी बना दो और मुफ्त की आरक्षण जैसी आदतें उस समाज में डाल दो ,वह समाज खुद ही अपनी पहचान खो का अस्तित्वबिहीन हो जायेगा।”

 
यही हाल उत्तराखण्ड का होने वाला है। शराब की सुनामी ने देवभूमि उत्तराखण्ड में पहली दस्तक सं 1803 ई के बाद देनी आरम्भ कर दी थी। इससे पहले उत्तराखंड के समाज में राजा महाराजा , राजा के मंत्री ,बड़े बड़े जमीदार / थोकदार , पधान , और कुछ गिने चुने शासकीय अधिकारी ही शराब पीने का अधिकार रखते थे। शराब को प्रतिबन्धित करने का समकालीन उद्देश्य राज्य की जनता का उत्तम स्वास्थ्य और सामाजिक बिघटन पर प्रतिबन्ध लगाना होता था।

 

उत्तराखंड के राजा राज्य की तिजोरी भरने के लिए कभी भी जनता के स्वास्थ्य से खिलवाड़ नहीं करते थे। लेकिन पहली तारीख सं 1803 ई की मध्य रात्रि के नौ रिचर पैमाने वाले भूकम्प ने उत्तराखण्ड के इतिहास की दशा और दिशा ही बदल डाली। ७०% से ऊपर जानमाल का नुक्सान महाभारतकालीन सभ्यता को बर्बादी के चौराहे पर खड़ा कर गया। उत्तराखण्ड की आर्थिक रीढ़ की हड्डी समझे जाने वाले मवेशी पशु निवासों और गोशालाओं में दब कर मर गए।

 

देवभूमि में महामारी फ़ैल गयी , सुसंगठित सुरक्षा ब्यवस्था चरमरा गयी और देवभूमि में सामाजिक बिघटन की स्थिति पैदा हो गयी। समय और मौके की तलाश में नेपाल का राजा , गढ़वाल के राजा से बदला लेना चाहता था और यही नेपाल नरेश को आसान मौका मिला। उसने कुमाऊं पर आक्रमण कर डाला क्योंकि गढ़वाल तक पहुंचने के लिए पडोसी कुमाऊं पर विजय प्राप्त करनी उसके लिए जरूरी थी। प्राकृतिक आपदा से घायल , कभी हार नहीं मानने वाले गढ़वाल के राजा को सं १८०४ ई में खुरबुरा (देहरादून के पास ) की लड़ाई में हार हाथ लगी।

 

सं १८०४ ई से सं १८१५ ई की सगोली की संधि तक ( जो कि अंग्रेजों और गोरखाओं के बीच हुई थी ) , शराब की पहली सुनामी का पहला युग उत्तराखण्ड के इतिहास में जाना जाता है। गोरखा शासन ने शराब बनाने वाले विशेषज्ञों को नेपाल से ला कर अपनी सेना की जरूरतें तो पूरी की ही , साथ साथ स्थानीय लोगो को शराब पीने और बनाने का प्रारम्भिक ज्ञान भी दिया। गोरखों को अल्प शासन काल के बाद गढ़वाल के राजा ने अंग्रेजों की मदद से गढ़वाल और कुमाऊँ छोड़ने को मजबूर कर दिया था। जब अंग्रेजों ने युद्ध का खर्चा दिखाया तो गढ़वाल के राजा के हाथों सिर्फ टिहरी गढ़वाल लगा।

पूरा कुमाऊं और आधे से अधिक गढ़वाल का भाग ब्रिटिश शासन के आधीन आ गया था। अंग्रेजों के शासन काल को उत्तराखण्ड के इतिहास में शराब की दूसरी सुनामी के नाम से जाना जाता है। उत्तखण्ड की जनशक्ति और देवभूमि की बन उपज अंग्रेजों ने अपने काम की चीज समझी। प्रथम विश्वयुद्ध और द्वितीय विश्वयुद्ध में अंग्रेजों ने उत्तराखण्ड के युवाओं का सेना में प्रयोग किया। दीखने में अति सुन्दर अच्छे डील डौल वाले पहाड़ी युवाओं के काम ने अंग्रेजों के मन में विशेष जगह बना ली थी।

 

कई पहाड़ी युवा विदेशी युवतियों से विवाह करके अंग्रेजों के साथ योरोप और अमेरिका में बस गए थे। बाकी उत्तराखंड की युवा पीढ़ी को अंग्रेज शराब का प्रेमी बना गए। प्रत्येक ब्रिटिश सेना के भारतीय सैनिक को शराब और सिगरेट का एक निश्चित कोटा निश्चित करके अंग्रेजों ने शराब को भारत में खूब बढ़ावा दिया , जिसकी अधिकांश हानि उत्तराखंड के लोगों ने उठाई। उस समय ब्रिटिश सेना में उत्तराखंड की बड़ी जनसँख्या सेवारत थी।

 

लगभग १३२ वर्ष उत्तराखंड में शासन के दौरान अंग्रेजों ने अपनी नीति के तहत उत्तराखंड देवभूमि को शराब प्रेमी बना दिया था। शराब की तीसरी वर्तमान सुनामी , जब भारत आज़ाद हुआ तो काले अंग्रेजों के शासन काल में शराब के ठेके , शराब की तस्करी , और माफियावाद अच्छी तरह अस्तित्व में आ गए थे। सैनिक बाहुल्य सीमान्त पर्वतीय राज्य में सेवारत सैनिकों तथा भूतपूर्व सैनिकों के शराब के कोटे को इन ठेकों में नहीं गिना जाता है।

 

जब शराब के ठेके प्रचुर मात्रा में शासन की स्वीकृति से पड़ते हैं तो , देवभूमि की आत्मा दुखी हो कर तड़पती है। इन ठेकों का शुद्ध लाभ वे लोग उठाते आये हैं , जो पहले से अति संपन्न हैं , लेकिन आज इसका खामियाजा देवभूमि की महिलाएं और बच्चे उठा रहे हैं। बात यह भी नहीं कि इस विषय में उत्तराखंड के जनप्रतिनिधियों को कुछ भी पता नहीं है। सबको शराब के लाभ और हानि पता हैं , लेकिन बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधेगा !

 

राज्य बने इतना लंबा समय हो गया और राज्य के सत्ताधीशों को राज्य के लिए मूलभूत सुविधाओं को दिलाने की याद तो नहीं आती लेकिन शराब के ठेकों पर अभी तक की सभी सरकारों के सामने संकट खडा हुआ और आंदोलन भी हुए इसके बाद भी शराब के ठेके पहाड हो या मैदान हमेशा खुले और इसका फायदा सिर्फ सत्ता में बैठे लोगों और अधिकारियों ने उठाया।

 

आम जनता विरोध करने के बाद भी ठगी सी रह जाती है।  आज के समय में पहाड हो या मैदान हर कदम पर शराब के ठेके दिख जाते हैं। इससे यहां के आमजन की आत्मा तो दुखती है ही इस देवभूमि में सदियों से तपस्या रत देवों की आत्मा भी अब दुखने लगी है और वह समय समय पर अपना गुस्ससा प्राक2तिक आपदा और अन्य भीषण कष्टनीय हादसों से करवा रहे हैं। लेकिन इसकी सत्यता कोई नहीं जान पा रहा ळै। क्योंकि देवभूमि के देवाओ और यहां निवास कर रहे लोगों की आत्मा दुखी है!

 

by –Pandit Madan Mohan Dhoundiyal की फेसबुक वाल से साभार लेकर इसमें कुछ शब्दों को जोडा गया है।

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