udaydinmaan, News Jagran, Danik Uttarakhand, Khabar Aaj Tak,Hindi News, Online hindi news चिपको आंदोलन : गूगल ने दिया पर्यावरण संरक्षण का संदेश,बनाया डूडल !

चिपको आंदोलन : गूगल ने दिया पर्यावरण संरक्षण का संदेश,बनाया डूडल !

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उदय दिनमान डेस्कः चिपको आंदोलन : गूगल ने दिया पर्यावरण संरक्षण का संदेश,बनाया डूडल ! इतिहास को उकेरती गूगल के डूडल की आज की तस्वीर पर्यावरण संरक्षण की दिशा में हुआ ऐतिहासक क्रांतिकारी आंदोलन आज फिर याद आ गया। गूगल ने चिपको आंदोलन की 45वीं सालगिरह पर बनाया नया डूडल और आंदोलन के प्रेरणेता को याद करने के साथ-साथ पर्यावरण को बचाने के लिए भी सभी को इस तस्वीर के माध्यम से संदेश दिया।

 

अमरीकी मल्टीनेशनल टैक्नोलॉजी कंपनी गूगल ने आज चिपको आंदोलन की 45वीं सालगिरह पर नया डूडल बनाया है। इस आंदोलन की शुरुआत 1974 में पेड़ों की रक्षा के लिए उत्तराखंड में हुई थी। इस डूडल में आंदोलन के उद्देश्य के अनुसार पेड़ के आसपास घेरा बनाकर खड़ी महिलाओं को दिखाया है। दरअसल चिपको आंदोलन की शुरुआत पर्यावरण की रक्षा के लिए की गयी थी। शांतिपूर्ण तरीके से पेड़ों को न काटने का आंदोलन पूरे गांधीवादी तरह से चलाया गया, जिसकी चर्चा दुनियाभर में हुई।

गूगल आज अपने होमपेज पर भारत के प्रसिद्ध चिपको आंदोलन को याद कर रहा है। आज चिपको आंदोलन की 45वीं वर्षगांठ भी है। इस मौके पर गूगल ने होमपेज पर एक सुंदर तस्वीर लगाई है। तस्वीर में 4 महिलाएं एक पेड़ को घेर कर खड़ी हैं। दरअसल तस्वीर में ये महिलाएं पेड़ को काटने से बचाने का सांकेतिक संदेश दे रही हैं। बता दें कि अविभाजित उत्तर प्रदेश के चमोली जिले (अब उत्तराखंड में) में 1973 में चिपको आंदोलन की शुरुआत हुई थी।

जैसा कि नाम से ही पता चलता है ‘चिपको’ का मतलब पेड़ से चिपक जाना। तब पेड़ को कटने से बचाने के लिए लोग इसे घेर कर खड़े हो जाते थे। दरअसल 1962 में भारत-चीन के बीच जंग के बाद तत्कालीन उत्तर प्रदेश के चीन से लगे इलाकों में बड़े पैमाने पर विकास की गतिविधियां शुरू हुई। इसके लिए पेड़ों की कटाई जरूरी थी। उत्तराखंड के जंगलों की लकड़ियों की उत्तम क्वालिटी ने विदेशी कंपनियों को भी यहां आकर्षित किया। जब लकड़ियों की कटाई शुरू हुई तो स्थानीय लोगों ने इसका विरोध भी करना शुरू किया।

जंगल की लकड़ियां यहां के लोगों के रोजी-रोटी का आधार थीं। यहां के लोग भोजन और ईंधन दोनों के लिए ही जंगलों पर निर्भर थे। लड़कियों की कटाई का असर पर्यावरण पर भी पड़ा। 1970 में चमोली और आसपास के इलाकों में भयानक बाढ़ आई। लोगों ने इसका दोष लकड़ियों की अंधाधुंध कटाई, पर्यावरण ह्रास को दिया। इसके बाद इस समस्या पर गांधीवादी और पर्यावरणवादी चंडी प्रसाद भट्ट की नजर पड़ी।

उन्होंने 1973 में मंडल गांव में चिपको आंदोलन की शुरुआत की। रोजी-रोटी और जमीन की समस्याओं से त्रस्त लोग जल्द ही इस आंदोलन से जुड़ गये। भट्ट गांव वालों के साथ जंगल में वहां पहुंचे जहां लकड़ियों की कटाई हो रही थी। लोग पेड़ों से लिपट गये और जंगल में पेड़ कटने बंद हो गये। आखिरकार सरकार को इस कंपनी का परमिट रद्द करना पड़ा। जल्द ही यह आंदोलन उत्तर भारत के दूसरे राज्यों में भी फैल गया।

पर्यावरणविद सुंदर लाल पटवा ने इस आंदोलन को और रफ्तार थी। उन्होंने नारा दिया कि पर्यावरण का संरक्षण ही अर्थव्यवस्था का आधार है। पटवा आजीवन वातावरण को स्वच्छ और शुद्ध बनाने के लिए काम करते रहे। उन्होंने हिमालय पवर्त श्रृंखला और वहां जंगलों को नुकसान पहुंचाने का पुरजोर विरोध किया। उन्हें अंतरराष्ट्रीय ख्याति मिली। उन्हीं की कोशिशों के बदौलत तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पेड़ों की अवैध कटाई पर रोक लगाई।

कब शुरु हुआ था चिपको आंदोलन
26 मार्च, 1974 को पेड़ों की कटाई रोकने के लिए ‘चिपको आंदोलन’ शुरू हुआ था। उस साल जब उत्तराखंड के रैंणी गांव के जंगल के लगभग ढाई हजार पेड़ों को काटने की नीलामी हुई, तो गौरा देवी नाम की महिला ने अन्य महिलाओं के साथ पेड़ों की नीलामी का विरोध किया। इसके बावजूद सरकार और ठेकेदार के निर्णय में बदलाव नहीं आया।

जब ठेकेदार के आदमी पेड़ काटने पहुंचे, तो गौरा देवी और उनके 21 साथियों ने उन लोगों को समझाने की कोशिश की। जब उन्होंने पेड़ काटने की जिद्द की तो महिलाओं ने पेड़ों से चिपक कर उन्हें ललकारा कि पहले हमें काटो फिर इन पेड़ों को भी काट लेना। महिलाओं के विरोध के आगे ठेकेदार को झुकना पड़ा. बाद में स्थानीय वन विभाग के अधिकारियों के सामने इन महिलाओं ने अपनी बात रखी। जिसके बाद रैंणी गांव का जंगल नहीं काटा गया। इस प्रकार यहीं से ‘चिपको आंदोलन’ की शुरुआत हुई।

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