udaydinmaan, News Jagran, Danik Uttarakhand, Khabar Aaj Tak,Hindi News, Online hindi news चिंतनीयः काली नदी का सहायक सदाबहार गुरजी नाला सूखा !

चिंतनीयः काली नदी का सहायक सदाबहार गुरजी नाला सूखा !

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पिथौरागढ़। नारायणनगर से लेकर तल्लाबगड़ तक अपनी तीव्र वेग के साथ बहकर खौफ पैदा करने वाला सदाबहार गुरजी नाला सूख गया है। गुरजी नाले के सूखने से क्षेत्रवासी हतप्रद हैं। वहीं अस्कोट, गर्खा और तल्लाबगड़ क्षेत्र के पर्यावरण पर संकट के बादल छा गए हैं। इस क्षेत्र में काली नदी की सबसे बड़ी सहायक नदी के सूखने के साथ ही विभिन्न प्रजाति की मछलियां समाप्त हो गई हैं। विगत छह दशकों से सांवलीसेरा , बगड़ीहाट की हजारों नाली भूमि को सिंचाई के लिए मिलने वाला पानी अब इतिहास बन चुका है।

नारायणनगर की पहाडिय़ों के स्रोतों से निकल कर गर्खा और अस्कोट के मध्य 14 किमी तक बहने के बाद नेपाल सीमा पर काली नदी में मिलने वाला सदाबहार गुरजी नाला अचानक सूख चुका है। इस नाले के सूखने से बड़ी संख्या में मछलियां मर गई। इस नाले के पानी से चलने वाले घराट बंद हो चुके हैं। लबालब पानी से भरे रहने वाले नाले के सूखने से क्षेत्र की जनता स्तब्ध है।

काली नदी का सहायक गुरजी नाला इस क्षेत्र का सबसे बड़ा नाला था। निकट में काली और गोरी जैसी बड़ी नदियों के चलते जनता इसे नदी नहीं मानती थी , परंतु इस नाले का इतिहास क्षेत्र के लोक से जुड़ा है। इस नाले को लेकर तमाम तरह की किं वदंतियां क्षेत्र के हर गांव में मशहूर हैं। नाले को लेकर कहीं इसे राक्षस तो कहीं पर देवता की संज्ञा मिली थी। मानसून काल से लेकर दिसंबर तक यह नाला पूरे ऊफान पर रहता था। दिसंबर से लेकर जून तक नाले में इतना अधिक पानी रहता था कि इससे नाले में आधा दर्जन घराट चलते थे और छह दशक पूर्व बनी सिंचाई नहर से सांवलीसेरा और बगड़ीहाट के खेतों की सिंचाई होती थी।

एक दशक पूर्व से गुरजी के जलस्तर में कमी आने लगी थी। इस दौरान इस नाले में काली नदी किनारे से लेकर लगभग हजार मीटर ऊपर खनन का धंधा जोरों पर था। जनता विरोध कर रही थी। खनन केबाद नाले ने विकराल रू प भी लिया। इस कदर कटान किया कि बगड़ीहाट और तीतरी के मध्य दो सौ मीटर चौड़ी खाई बन गई। ऐसा जख्म देने के बाद अब नाला इतिहास बन गया है। केवल मानसून काल में बरसात होने पर ही पानी नजर आएगा।

अब नहीं नजर आएंगी मछलियां
काली नदी में जब ग्लेशियर पिघलने या फिर मानसून काल में नदी का जलस्तर बढ़ जाता था तो मछलियां उथले पानी वाले गुरजी नाले में शरण लेती थीं। काली नदी की प्रसिद्ध मछली जिसे स्थानीय भाषा में सौर या सूस कहा जाता है और जिसे पानी का टाइगर माना जाता है वह जलस्तर बढऩे पर इसी सहायक नाले गुरजी में शरण लेती थी। लोग भी इसके दीदार करते थे अब यह इतिहास के पन्नों में जा चुका है ।

सदाबहार गुरजी नाला सूखना किसी खतरे से कम नहीं है। इसे ग्लोबल वार्मिंग का असर ही कहा जाएगा। इसके अलावा इस नाले में हुआ खनन भी कारण हो सकता है। खनन के चलते स्रोत प्रभावित होते हैं। इस नाले के सूखने से नाले के आसपास के क्षेत्र में पर्यावरण प्रभावित होगा ।
डॉ. धीरेंद्र जोशी, पर्यावरणविद्

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