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भूली-बिसरी यादें : मैंने कभी हिम्मत नहीं हारी !

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उ.प्र. में रहते हुये जनपद चमोली, पिथौरागढ़, उत्तरकाशी को ही उत्तराखंड कहा जाता था। 1989 में स्व. चन्द्र मोहन सिंह नेगी शेरे-गढ़वाल द्वारा 1989 में मुझे कर्णप्रयाग विधानसभा क्षैत्र से ( तत्समय कर्णप्रयाग विधानसभा क्षैत्र में गैरसेंण, कर्णप्रयाग रुद्रप्रयाग, थलीसैण) विकासखण्ड सम्मलित थे , जनता दल का प्रत्यासी बनाया गया था परन्तु कांग्रेस के शक्तिशाली उमीदवार डा. शिवानन्द नौटियाल से मात्र 3 हजार वोटों से पराजित होने के बावजूद मैंने कभी हिम्मत नहीं हारी और यथासम्भव पर्वतीय जनों के विकास के लिये प्रयासरत रहा हूँ ।

 

1990 में पुरादेश मण्डल आयोग के आरक्षण के चलते आरक्षण के पक्ष व विपक्ष के आंदोलन में जलने लगा , युवा आत्मदाह करने लगे तो दूसरे दल भाजपा ने कमण्डल की राजनीति इसके जवाब में(शुरू कर दी) हर जगह राम नाम का जाप होने लगा , मोदी जी ने रथयात्रा ऐसे में स्व. चन्द्रमोहन सिंह नेगी के नेतृत्व में सुदर्शन कठैत, पत्रकार राजपाल बिष्ट, शेखर रावत व क्रांति भट्ट पत्रकार व मैंने पर्वतवासियों को भी आरक्षण की मांग को लेकर केंद्र व प्रदेश सरकार के सामने कार्य योजना रखी ।

 

हमारा मुख्य तर्क था कि उ. प्र. के उत्तराखंड व पर्वतीय क्षेत्र के लोग भी पिछड़े हैं और उन्हैं भी आरक्षण की परिधि में लिया जाना चाहिए। पर्वतीय नव जवानों की सेना में शारिरिक माप व सीमांत तहसीलों जोशीमठ, ऊखीमठ, पिथौरागढ़ व उत्तरकाशी तहसीलें जो चीन की सीमा से जुड़े हैं उन्हें फौज की भर्ती में भी आरक्षण दिया जाता है( तब फौज में भर्ती के लिए न्यूनतम शिक्षा हाई स्कूल पास थी परन्तु इन तहसीलों के निवासियों को मिडिल तक कि छूट थी।

 

इसी दौरान सुप्रीम कोर्ट के एक महत्वपूर्ण निर्णय “प्रदीप टण्डन बनाम उ. प्र. सरकार ” की प्रति हमें हांसिल हुई जिसमें तत्समय के मुख्य न्यायाधीश श्री ए.एन.रे.की पीठ ने निर्णय दिया था कि उत्तराखंड के निवासी आर्थिक सामाजिक एवं शैक्षणिक व स्वयं से पिछड़े हैं और उन्हें इंजनियरिंग एवं मेडिकल कालेजों में दिया जाने वाला आरक्षण न्याय संगत है (A.I.R. 1975 page 555 सुप्रीम कोर्ट )। इस महत्वपूर्ण निर्णय के बारे में जानकारी हुयी कि स्व. हेमवती नन्दनं बहुगुणा ने उ.प्र. के मुख्यमंत्री रहते हुये उत्तराखंड के तीनों सीमांत जनपदों के अलावा पौड़ी, अल्मोड़ा, नैनीताल, टिहरी, देहरादून( मैदानी क्षैत्र को छोड़कर ) के छात्र छात्राओं को अलग से उच्च शिक्षा के छेत्रों में 5% आरक्षण के लिये राजाज्ञा जारी की थी उसे उच्च याचिका में चुनौती दी गई थी ।

 

ज्ञात हुआ कि जब सुप्रीम कोर्ट याचिका की सुनवाई का दिन था तो उ.प्र. सरकार के वकीलों को बहुगुणा द्वारा एक सप्ताह के लिए हेलीकॉप्टर 1974-75 में उपलब्ध करवाया गया ताकि वे उत्तराखंड के पहाड़ी छेत्रों का हवाई सर्वेक्षण के फोटो लेकर सुप्रीम कोर्ट को बताएं कि निम्न प्रकार पहाड़ के लोग विषम परिस्थितियों में वहां निवास करते हैं और अधिकांश हिमाच्छादित छेत्र होने के बावजूद चीन सीमा पर मुस्तैदी से डटे हुए हैं।

 

सुप्रीम कोर्ट में जब इन उ.प्र. के सरकारी वकीलों ने पर्वतवासियों की परेशानियों से लेकर सड़कों, अस्पतालों, व स्कूलों के अभाव के बारे में कोर्ट को बताया तो सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश महोदय की पीठ ने पहाड़ के लोगों को आर्थिक, सामाजिक एवं शेक्षणिक रूप से पिछड़ा इस निर्णय में धोषित कर दिया । सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का लाभ 1990 तक पहाड़ के छात्र छात्राओं को मिला परन्तु ततपश्चात मुलायम सरकार ने इसे रद्द का दिया ।

 

प्रथक राज्य आंदोलन 1993-94 में वास्तव में आरक्षण के प्रश्न पर दुख हुआ जब मुलायम सरकार ने 27% आरक्षण ओ.वी.सी. को नौकरियों के अलावा स्कूल , कालेजों में भी लागू कर दिया, धीरे-धीरे यह आंदोलन प्रथक उत्तराखंड राज्य का आंदोलन बन गया , उस वक़्त सतपाल महाराज ने भी उत्तराखंड के छात्र छात्राओं को आरक्षण प्रदान करने के लिये जन आंदोलन में भाग लिया। पुनः आंदोलन में भाग लेने वाले श्री जगदीश नेगी अध्यक्ष उत्तराखंड जन मोर्चा ने उत्तराखंड के विद्यार्थियों को को शिक्षण संस्थानों में 27% आरक्षण के प्रश्न पर सुप्रीम कोर्ट में याचिका प्रदान की जिस पर पुनः सुप्रीम कोर्ट ने प्रदीप टण्डन मामले पर मुहर लगा कर आरक्षण दिए जाने का निर्णय दिया ।

 

तत्समय गढ़वाल सांसद भुवन चन्द्र खण्डूड़ी के प्रयासों से उ. प्र. में कल्याण सिंह सरकार ने राजज्ञा स. – 1927/28.10.98-15(22)95, 1 july 1198 जारी कर उ.प्र. के समस्त उच्च शिक्षण संस्थानों जिनमे मेडिकल, इंजिनियरिंग,फार्मेसी, एम. एड. डिप्लोमा आदि शामिल थे उत्तराखंड के छात्रों को भी 27% आरक्षण देने की घोषणा की जिसके चलते वर्ष 2000 तक हजारों लाखों छात्रों ने इसका लाभ यहां उठाया । यह व्यवस्था नवंबर 2000 तक चली परन्तु उत्तराखंड राज्य बनते ही यह आरक्षण समाप्त हो गया ।

 

बहुगुणा विचार मंच वर्ष 2000 से लगातार इस आरक्षण को पुनः लागू करने की मांग करता आ रहा है परन्तु प्रदेश सरकार ने इस पर आजतक कोई निर्णय नहीं लिया, यही नही जनरल खण्डूड़ी द्वारा घोसित 10% आरक्षण जो राज्य आंदोलनकारियों को दिया जा रहा था वह भी ठंडे बस्ते में चला गया है। 2004 में तिवारी जी की सरकार में जब उत्तराखंड की आरक्षण नीति तैयार की जा रही थी तब भी विषम हिमाच्छादित पर्वतीय छेत्र के सभी वर्गों के लिए समांतर आरक्षण का प्रारूप सुप्रीम कोर्ट की नजीरों के साथ उत्तराखंड सरकार को सौंपा गया था जो हुआ ।

 

नतीजतन आज सीमांत पर्वतीय जनपदों से कोई भी छात् फ्री सीट कोटे से न तो मेडिकल कालेजों में प्रवेश पा सका है न किसी अन्य शिक्षण संस्थानों में । आज सथिति यह है कि उत्तराखंड के पर्वतीय छेत्रों में निवास करने वाले चाहे वे किसी भी वर्ग के हों उन्हें न तो आरक्षण की सुविधा मिल पा रही है न उनके बच्चे उच्च शिक्षण सस्थानों में प्रवेश पा रहे हैं , यह स्थिति अत्यंत विस्फोटक है यदि इसी प्रकार सीमांत क्षैत्र के निवासियों के साथ यह अन्याय होता रहा है तो यह क्षेत्र भी अराजकता की ओर चला जायेगा।।

हरीश पुजारी

संयोजक बहुगुणा विचार मंच(गढ़वाल कुमाऊँ) मुख्यालय – गोपेश्वर

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