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भू-वैकुंठ श्री बदरीनाथ धाम के कपाट शीतकाल के लिए बंद

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गढ़वाल स्काउट की धर्ममयी धुनें लगातार धाम को धर्म के सागर में डुबाती रही

बदरीनाथः भूबैकुंठधाम बदरीनाथ के कपाट शीतकाल के लिए बंद कर दिए गए है अब बदरीनाथ में भगवान नारायण की पूजा शीतकाल में देवता करेंगे।इस अवसर पर हजारों श्रद्धालुओं की उपस्थिति में जय बदरीविशल के नारों से नर और नारायण पवर्त गूंजमान हुए।

भू-वैकुंठ श्री बदरीनाथ धाम के कपाट शीतकाल के लिए बंद कर दिए गए हैं। कपाट बंद करने के बाद कुबेर जी की मूर्ति को बामणी गांव के नंदा मंदिर जबकि उद्वव जी की मूर्ति को रावल निवास पर रखा गया है। कल आज दोनों मूर्तियों को उत्सव डोली के साथ पांडुकेश्वर स्थित योगध्यान बदरी मंदिर में लाया जाएगा। जहां शीतकाल में कुबेर जी एक माह योगध्यान मंदिर में निवास करने के बाद कुबेर मंदिर तथा उद्वव जी योगध्यान बदरी मंदिर में विराजित होंगे।

रविवार को बर्फबारी के बीच रात्रि को 7:28 बजे श्री बदरीनाथ धाम के कपाट बंद किए गए। इससे पहले प्रात: ब्रहममुहूर्त में मुख्य पुजारी ईश्वरी प्रसाद नंबूदरी द्वारा भगवान बदरी विशाल की अभिषेक व महाभिषेक पूजाएं संपन्न कराई गई। कपाट बंदी के अंतिम दिन भगवान का फूल श्रृंगार कराया गया। उनके शरीर से गहने शनिवार की रात्रि को सयन आरती के बाद उतारकर नियत स्थान पर रखा गया।

कपाट बंदी के दिन को फूल श्रृंगार के नाम से भी जाना जाता है। दोपहर में भगवान का बाल भोग व राजभोग लगाया गया। श्रद्धालुओं के लिए मंदिर अंतिम दिन दिनभर खुला रहा। सायं को चार बजे से कपाट बंदी की प्रक्रिया शुरू की गई। सबसे पहले भगवान की कपूर आरती व उसके बाद चांदी की आरती व विष्णु सहस्रनाम पाठ, नामावली के साथ अंत में गीत गोविंद पाठ व सयन आरती हुई। सयन आरती में भगवान के शरीर पर लगाए गए फूलों के श्रृंगार को उताकर माणा गांव की कुंआरी कन्याओं द्वारा विशेष रूप से बनाई गई घृत कंबल ऊन की चोली पहनाई गई।

भगवान के शरीर पर शीतकाल में छह माह तक यही अंगवस्त्र रहेगा। कपाट खुलने के दिन यही अंगवस्त्र प्रथम प्रसाद के रूप में श्रद्धालुओं को वितरित किया जाएगा। कपाट बंदी की प्रक्रिया के तहत मां लक्ष्मी को परिक्रमा परिसर स्थित उनके मंदिर से गर्भगृह में भगवान बदरी विशाल के साथ विराजित किया गया। इससे पहले गर्भगृह से उद्वव जी व कुबेर जी की मूर्तियों को बाहर लाया गया। कुबेर की मूर्ति को बामणी गांव के नंदा देवी मंदिर में रात्रि विश्राम के लिए रखा गया। जबकि उद्वव जी की मूर्ति को रावल निवास पर रखा गया।

सभी पूजाएं संपादित करने के बाद रावल द्वारा लक्ष्मी का रूप धारण किया गया। उनके लक्ष्मी रूप धारण करने पर श्रद्धालु भाव विभोर दिखे। सैकड़ों श्रद्धालुओं की आंखों में आंसू छलक पड़े। गढ़वाल स्काउट की धर्ममयी धुनें लगातार धाम को धर्म के सागर में डुबाती रही। अंत में प्रार्थना कक्ष के मुख्य द्वार पर परंपरा के अनुसार मंदिर समिति, मेहता थोक व भंडारी थोक के प्रतिनिधियों द्वारा अधिकारियों के समक्ष बदरीनाथ के द्वार पर तीन ताले लगाकर उन्हें शील्ड किया गया। कपाट बंद करने के बाद रावल जी उद्वव जी को लेकर उल्टी सीढ़ियों से उतरे।

कपाट बंदी के अवसर पर बदरी विशाल के जयकारों से बदरीशपुरी गुंजायमान हुई। अंतिम दिन सात हजार से अधिक यात्रियों ने दर्शन कर पुण्य लाभ अर्जित किए। इस मौके पर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत, मंदिर समिति के अध्यक्ष गणेश गोदियाल, सीईओ बीडी सिंह, टेंपल अधिकारी भूपेंद्र मैठाणी, प्रशासनिक अधिकारी राजेंद्र चौहान, मेहता थोक, भंडारी थोक व कमदी थोक के अध्यक्ष उपस्थित थे। बदरीनाथ धाम में अंतिम दिन भंडारे भी लगाए गए थे।

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