udaydinmaan, News Jagran, Danik Uttarakhand, Khabar Aaj Tak,Hindi News, Online hindi news भैजी प्रणाम ! अरे भैजी ! पहचाना नहीं ! मैं हूं फातिमा !

भैजी प्रणाम ! अरे भैजी ! पहचाना नहीं ! मैं हूं फातिमा !

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 ऐसा नहीं है कि हर तरफ  अंधेरा ही अंधेरा है , उजाला भी है !

क्रांति भटृ

ये कोई कहानी नहीं है । प्रवचन नहीं है । विचारों का , शब्दों का ढेर नहीं है । हकीकत है । एक सुखद वाकये ने समझाया कि ” सचमुच हर तरफ अंधेरा ही अंधेरा ही अंधेरा नहीं है और न ही ऐसा कभी हो सकता है । उजाला भी है और रहेगा भी । पूरा वाकया , पूरी सुखद और आंखों को मीठे आंसू से तर कर देने वाली घटना को अक्षरस: बयां कर रहा हूं । भगवान साक्षी है ।

 

मैं सुबह 10 बजे आफिस के लिए निकला । और मुख्य स्टेशन की ओर बढा । तीन चार महिलाएं और बेटियां आ रहीं थीं। उनमें एक ने आगे बढ कर पहले नमस्कार किया और ठेठ गढवाली भाषा में कहा ” भैजी प्रणाम ! और हमारी पहाड़ी परम्परा के अनुसार सेवा लगाने के झुकी । उस भुली (बहिन ) ने ” भैजी ( भाई ) रिश्ते से सम्बोधित किया ।

 

स्वाभाविक ही है कि मैं पैर छूने नही देता । हमारी परम्परा में बेटी बहिन को पैर नही छूने देते । वरन उनकी शादी पर तो हम उनके पैर छूते हैं । खैर अब बात आगे । जिस भुली बहिन ने सेवा लगाई उसने कहा ” अरे भैजी ! पहचाना नहीं ! मैं ” फातिमा हूं । और उसके साथ ही आयीं एक और भुली ने भी सम्मान देते हुये कहा ” भैजी ! मैं खतीजा हूं। इनके साथ आयीं बेटियों और अन्यो ने भी ठेठ गढवाली में अपना परिचय याद दिलाया । फातिमा भी अध्यापिका है । और खतीजा भी बागेश्वर में अध्यापिका ।

 

सात आठ की संख्या में पूरा परिवार . बहिनो सहित , भतीजियो  सहित इन्हें एक साथ देख कर मै ने कहा ” सब बहिनें और परिवार एक साथ कैसे ! तो खतीजा भुली बोली ” भैजी ! बाबा ( पिता जी ,) बहुत बीमार हैं । हम सब बहिने और परिवार मिलने आये हैं । इनके पिता रमजान खान चचा हैं । जो जाने कश्मीर से कब आये । यहीं रच बस गये । यहीं शादी की और घर परिवार बना कर रह रहे हैं ।

 

फातिमा और खतीजा सहित सभी से मै ने कहा अब सब लोग कहाँ जा रहे हैं । तो उन्होने जिस पवित्र विस्वास , आस्था और श्रद्धा से हृदय की बात कही ” मेरी आंखों में सुखद और आशा तथा इस देश की गंगा जमुनी संस्कृति के संस्कार की धृढता के सुखद आंसू आ गये ।
दोनो बहिनो और उनके साथ आयीं नयी पीढी की बेटियों ने कहा ” भैजी ! मैत ( मायके ) आये हैं। गोपीनाथ मंदिर के दर्शन के बिना कैसे रह सकते हैं ।

 

सभी इतनी भाव विभोर दिखीं कि ” जब यह कह रहीं थीं ” गोपीनाथ भगवान के दर्शन के बिना कैसे रह सकतीं हैं तो उस समय सिर पर पल्लू रखते हुये बडी आस्था से हाथ भी जोडने लगीं । और फिर पूजा सामाग्री लेकर अपने मायके के मंदिर चलीं गयीं फातिमा और खतीजा व उनका परिवार ।

 

मैं इस सुखद घटना को भूल नहीं पाऊंगा । मेरी आंखों में आंसू आ गये ” हे भगवान , ये खुदा , हे मेरा देश , मुझे तुझ पर यकीन है तेरे अपने बंदो पर यकीन हो गया है कि ” हर तरफ अंधेरा ही अंधेरा नही है । उजाला है अभी । हर तरफ हिन्दू मुस्लिम , सवर्ण दलित का थोपा जा रहा अंधेरा या कटुता नहीं है । आज भी समाज में बहुत कुछ अच्छा है बस उसे समझने और उसे आगे बढाने की जरूरत है ।

 

वरिष्ठ पत्रकार की वाल से साभार

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