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भगवान शंकर के प्रिय पुष्प ब्रह्मकमल के अस्तित्व पर संकट के बादल

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रुद्रप्रयाग। भगवान शंकर के प्रिय पुष्प ब्रह्मकमल के अस्तित्व पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। इसको लेकर जहां वन महकमे को कोई चिंता नहीं है, वहीं सरकार की हिमालय नीति भी इस ओर कोई ध्यान नहीं दे रही है। ऐसे में वैज्ञानिक इस पुष्प के संरक्षण को लेकर खासे चिंतित नजर आ रहे हैं। उनकी मानें तो अगले कुछ सालों में ब्रह्मकमल का नामोनिशान ही हिमालय से मिट जायेगा, जिसके लिए साफ तौर पर मानवीय गतिविधियां दोषी हैं।

 

दुर्लभ पुष्प है ब्रह्मकमल
ब्रह्मकमल ऊंचाई वाले क्षेत्रों का एक दुर्लभ पुष्प है, जो सिर्फ हिमालय, उत्तरी और दक्षिण-पश्चिम चीन में पाया जाता है। धार्मिक और प्राचीन मान्यता के अनुसार ब्रह्मकमल को इसका नाम उत्पत्ति के देवता ब्रह्मा के नाम पर मिला है। सामान्य तौर पर ब्रह्मकमल हिमालय की पहाड़ी ढलानों और तीन से पांच हजार मीटर की ऊंचाई पर पाया जाता है।

 

अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है ब्रह्मकमल
इसकी सुंदरता और दैवीय गुणों से प्रभावित होकर ब्रह्मकमल को उत्तराखंड का राज्य पुष्प भी घोषित किया गया है, मगर आज यह पुष्प अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। भगवान शंकर को चढ़ाये जाने वाले इस पुष्प की संख्या कम होती जा रही है। ऊंचाले वाले क्षेत्रों में मानवीय गतिविधियां ज्यादा होने से इसका दोहन किया जा रहा है। रही-सही कसर पर्यटक यहां प्लास्टिक-कचरा छोडक़र कर रहे हैं।

 

ब्रह्मकमल में कई दुर्लभ गुण
ब्रह्मकमल के पौधे में एक साल में केवल एक बार ही फूल आता है, जो कि सिर्फ रात्रि में ही खिलता है। दुर्लभता के इस गुण के कारण से ब्रह्मकमल को शुभ माना जाता है। इस पुष्प की मादक सुगंध का उल्लेख महाभारत में भी मिलता है, जिसने द्रौपदी को इसे पाने के लिए व्याकुल कर दिया था।

 

संरक्षण के अभाव में दम तोड़ रहा ये फूल
ब्रह्मकमल की महत्ता से कोई अनजान नहीं है। देश-विदेश से पर्यटक और श्रद्धालु इसे देखने के लिए हिमालय की ओर कूच करते हैं, मगर आज स्थिति यह आ गई है कि संरक्षण के अभाव में बह्मकमल दम तोड़ रहा है। यह पुष्प बदरीनाथ-केदारनाथ के साथ ही फूलों की घाटी, हेमकुंड साहिब, वासुकीताल, वेदनी बुग्याल, मद्महेश्वर, रूप कुंड, तुंगनाथ के इलाकों में पाया जाता है।

 

घटती जा रही है ब्रह्मकमल की संख्या
हर साल ब्रह्मकमल की संख्या घटती जा रही है, जिसका मुख्य कारण हिमालय क्षेत्रों में मानवीय गतिविधियों का अत्यधिक बढऩा है। पर्यटक और स्थानीय लोग हिमालय में जाकर ब्रह्मकमल का दोहन कर रहे हैं। साथ ही इन क्षेत्रों में प्लास्टिक, कूड़ा-कचरा फेंक रहे हैं। इस कूड़े-कचरे और प्लास्टिक के कारण ब्रह्मकमल का फूल सही तरीके से भी नहीं खिल पा रहा है, जबकि इसकी जड़ें भी खराब हो रही हैं। ब्रह्मकमल के बढऩे की क्षमता समाप्त हो रही है। पर्यावरण पर भी बुरा बसर पड़ा है।

 

हिमालय नीति नहीं साबित हो रही कारगर
एक ओर राज्य सरकार हिमालय नीति बनाने की बात कर रही है, वहीं दूसरी ओर राज्य पुष्प विलुप्त की कगार पर है। जिसका कुप्रभाव सबसे अधिक पर्यावरण पर पड़ेगा और इसके दुष्परिणाम भी भुगतने पड़ेंगे। पुष्प के संरक्षण को लेकर ना ही वन महकमा सजग दिखाई दे रहा है और ना ही सरकार कोई ठोस कदम उठा रही है। ऐसे में वैज्ञानिकों की चिंता बढऩा लाजमी ही है। अगर समय से इस पुष्प की सुरक्षा को लेकर ठोस कदम नहीं उठाये गये तो वो दिन भी दूर नहीं होगा, जब राज्य पुष्प सिर्फ नाममात्र का रह जायेगा।

 

वैज्ञानिक भी इस पुष्प को लेकर चिंतित
उच्च शिखरीय पादप कार्यिकी शोध केन्द्र (हैप्रेक) के वैज्ञानिक भी राज्य पुष्प के संरक्षण को लेकर चिंतित हैं। ऊंचाई वाले इलाकों में यह पुष्प अत्यधिक संख्या में पाया जाता है, लेकिन धीरे-धीरे यह विलुप्त होता जा रहा है। ब्रह्मकमल राज्य पुष्प है। यह भगवान शंकर का प्रिय पुष्प है। मेडिशन प्लांट के रूप में भी इस पुष्प की डिमांड ज्यादा है।

 

ऐसा भी माना जा रहा है कि जिस घर में ब्रह्मकमल रखा जाता है, वहां आपदाएं नहीं आती हैं। इस पुष्प को पांच से दस रूपये में खरीदा जा रहा है। क्लाइमेंट चैंज होने से भी पुष्प की प्रजाति कम होती जा रही
दूर-दूर से विदेशी पर्यटक इस पुष्प को देखने पहुंचते हैं

 

ऑस्ट्रेलिया से गु्रप के साथ आई जानकी सोमया का कहना है कि वो यहां ब्रह्मकमल को देखने आये थे। बहुत सुना था ब्रह्मकमल के बारे में। यहां आकर ब्रह्मकमल की स्थिति को देखकर बहुत बुरा लगा। इस पुष्प के आस-पास कूड़ा-कचरा पड़ा है। गंदगी फैलाकर पुष्प को नष्ट करने का प्रयास किया जा रहा है। वन विभाग को इसकी सुरक्षा की ओर ध्यान देना चाहिए।

 

आस्था के नाम पर हो रहा दोहन
ब्रह्मकमल की घटती संख्या से पर्यावरणविद् भी खासे परेशान हैं। देव राघवेन्द्र चौधरी की मानें तो ब्रह्मकमल औषधीय प्लांट है। हिमालय में आकर पर्यटक एवं श्रद्धालु अपशिष्ट छोड़ रहे हैं। प्लास्टिक सड़ता नहीं है और ब्रह्मकमल की जड़ों में गर्मी पैदा करता है। इसके साथ ही आस्था के नाम पर ब्रह्मकमल का अधिक दोहन होने के कारण इसके बीजों से नयी पीढ़ी का भी विकास नहीं हो पा रहा है।

 

अस्तित्व को बचाने की करनी होगी पहल
पुष्प के अंदर ही बीजपुंज पाया जाता है, जिसे तोडक़र लगाया जाता है। यदि यही स्थिति रही तो ब्रह्मकमल की प्रजाति विलुप्ति हो जायेगी। सरकार को भी इसे ओर सोचने की जरूरत है। हिमालय नीति की बात करने वाली सरकार को ब्रह्मकमल के अस्तित्व को बचाने की पहल करनी होगी।

 

ब्रह्मपुष्प के अस्तित्व पर संकट के बादल
हिमालय क्षेत्रों में सैलानियों की बढ़ती संख्या से ब्रह्मपुष्प के अस्तित्व पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। अगर समय से इसके बचाव के तरीके नहीं ढूंढे गये तो ब्रह्मकमल को बचाना बहुत मुश्किल हो जायेगा। वन विभाग को ब्रह्मकमल की सुरक्षा को लेकर ध्यान देने की आवश्यकता है।

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