भाजपा, कांग्रेस के साथ उक्रांद भी है उत्तराखंड का खलनायक !

पुरुषोत्तम असनोडा़

गैरसैंण :  गैरसैंण स्थाई राजधानी की मांग पर विधानसभा घेराव/कूच सफल कहा जा सकता है। भराडीसैंण में वर्तमान सत्र सहित तीन सत्रों में पहली बार आन्दोलनकारी कालीमाटी कोराली के तीन बैरीकेट पार करने में सफल रहे। दिवालीखाल में तो सुबह से ही जद्दोजहद रही लेकिन वह बैरीकेट पार नहीं हुआ अलवत्ता कुछ आन्दोलनकारी पैदल मार्गों विधानसभा के निकट पहुंचने में सफल रहे और उन्होंने वहां नारेबाजी के साथ गिरफ्तारी दी।

प्रदर्शन में निश्चित रुप से उत्तराखंड क्रांति दल के नेताओं कार्यकर्ताओं की संख्या अधिक थी, काशीसिंह ऐरी के अलावा पार्टी का हर बडा नेता वहाँ पहुंचा था और गुंजी पिथौरागढ से लेकर लक्सर हरिद्वार और उधमसिंहनगर से लेकर जोशीमठ तक की उपस्थिति बताती है कि कार्यकर्ताऔं में अभी भी उत्साह है।

गैरसैंण राजधानी संघर्ष समिति तिरंगे के साथ प्रदर्शन में थी और उसके साथ उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी के नेता कार्यकर्ता भी थे। कांग्रेस के कार्यकर्ता भी बडी संख्या में थे जबकि माकपा कम संख्या के बावजूद मालसी बैरियर पार कर दिवालीखाल पहुंच गयीं जबकि उक्रांद कार्यकर्ता मालसी बैरियर पर अटके रहे।

उत्तराखंड की 17-18 सालों की जिम्मेदारी तय किये विना शायद ही आगे बढा जा सकेगा। यह मात्र और मात्र गैरसैंण राजधानी का सवाल नहीं है। सवाल उत्तराखंड के जल, जंगल जमीन का है, सवाल उत्तराखंड की शिक्षा चिकित्सा, रोजगार, पलायन से खाली होते गाँवो का है, सवाल 42 शहादत व राज्य बनने के बाद भी तीन शहादतों का है और  है

राज्य परिकल्पना-अवधारणा का , रात दिन आन्दोलन में जूझी लाखों लाख जनता की आशा अपेक्षाओं का, सवाल शराब और खनन का भी और यह भी कि इतने सालों में राजधानी तय कर पाने वाली कौन पार्टियां और लोग हैं। डबल इंजन वाली भाजपा और कांग्रेस निश्चित रुप से इसकी जिम्मेदार हैं और उत्तराखंड को गर्त में ले जाने की सबसे अधिक जिम्मेदारी यदि है तो वह उत्तराखंड क्रांति दल है।

उत्तराखंड राज्य की अलख जगाने वाले उक्रांद का राज्य गठन और मुख्य रुप से राज्य के पहले चुनाव के बाद के बाद इतना पतन हुआ कि वह सत्ता का दलाल हो गया। चुनाव परिणाम आते ही उसने काग्रेस को समर्थन की घोषणा कर दी और पांच साल तक काग्रेंस के नारायण दत्त तिवारी सरकार की पत्तल चाटता रहा। ये वहीं तिवारी थे जो अपनी लाश पर उत्तराखंड चाहते थे।

दूसरे चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी और उक्रांद भाजपा के साथ। इस बार ड्रामा हुआ कि आठ सूत्री कार्यक्रम पर समर्थन दिया है लेकिन पांच साल सत्ता की मलाई चाटते मंत्री और एक विधायक पार्टी को अंगूठा दिखाते भाजपा के हो गये।तीसरे चुनाव में चुना विधायक मंत्री बना तो उसे ही पार्टी से निकालना पडा और आज पार्टी की एकता के नाम पर सत्ता की पत्तल और मलाई चाटने वाले लोग काबिज हैं।

उक्रांद ने राज्य स्थापना के बाद न केवल राज्य हितों को नुकसान पहुंचाया है बल्कि राज्य में तीसरे विकल्प की संभावना और क्षेत्रीय दलों की विश्वसनीय को तार तार किया है। आज विधानसभा में शून्य पा सत्ता से बाहर उत्तराखण्डी मुद्दों का ढोंगी कब सत्ता की चौखट पर सलामी बजा दे कहा नहीं जा सकता है। उक्रांद ,भाजपा और कांग्रेस के बराबर का खलनायक है। जिन्होंने उत्तराखंड की बरबादी को स्वीकार किया।

उत्तराखंड राज्य निर्माण अलख जगाने वाले उक्रांद का यह पतन राजनीति और क्षेत्रीय राजनीति के अध्येताओं के लिए यह दिलचस्प विषय तो है, उत्तराखंड की जनता द्वारा ठुकरा दिये गये उक्रांद के लिए जनता को समझना होगा कि राष्ट्रीय दलों का बधुवा उकांद्र पतन की सीमाएं पार कर चुका है और उससे कोई भी आश मृगमरीचिका से अधिक नहीं है। क्षेत्रीय राजनीति के आकांक्षियों के लिये उक्रांद दुखद अध्याय है।

पुरूषोतम असनोडा वरिष्ठ पत्रकार की वाल से साभार

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