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बैंकों के पास फंड की भरमार पर कर्ज लेने वालों का टोटा

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नई दिल्ली। वैसे तो देश का बैंकिंग क्षेत्र एक नहीं कई समस्याओं से दो-चार है। लेकिन इसमें एक ऐसी समस्या है जो कभी कभार ही सामने आती है। एक तरफ तो बैंकों के पास फंड बेशुमार हैं, लेकिन दूसरी तरफ कर्ज लेने वालों का टोटा पड़ा हुआ है। देश के 19 बड़े उद्योगों में से 10 ने एक तरह से नए कर्ज लेना ही बंद कर दिया है।

 

आंकड़े बताते हैं कि इन दस उद्योग क्षेत्रों में पिछले वित्त वर्ष के दौरान कर्ज की रफ्तार 63 फीसद तक घटी है। ऐसे में इन उद्योगों की नजर भी अगले बुधवार को पेश होने वाली मौद्रिक नीति की समीक्षा पर है। देश के बैंकिंग क्षेत्र पर कैग की नई रिपोर्ट बताती है कि दिसंबर, 2016 तक खाद्य प्रसंस्करण उद्योग में कर्ज की रफ्तार में 21.67 फीसद, कपड़ा उद्योग में छह फीसद, कागज व कागज से जुड़े उद्योगों में 63 फीसद, रसायन उद्योग में 17.35 फीसद, सीसा व सीसा से जुड़े उत्पादों में 13.75 फीसद, इंजीनियरिंग में 5.05 फीसद, रत्न व आभूषण उद्योग में 33.63 फीसद की गिरावट आई है।

 

ये सारे उद्योग ऐसे हैं जो न सिर्फ देश की अर्थव्यवस्था में बेहद महत्वपूर्ण है बल्कि रत्न व आभूषण, कपड़ा व खाद्य प्रसंस्करण उद्योग सबसे ज्यादा रोजगार देने वाले औद्योगिक क्षेत्र हैं। अगर इनकी तुलना आरबीआइ की तरफ से जारी होने वाली मासिक रिपोर्ट से करें तो साफ हो जाता है कि अभी भी कर्ज देने की रफ्तार यूं ही सुस्त बनी हुई है क्योंकि पूरे वर्ष के दौरान बैंकों की तरफ से दिए जाने वाले कर्ज की रफ्तार में महज 1.7 फीसद का इजाफा हुआ है।

 

अप्रैल के बाद इसमें मामूली सुधार के संकेत हैं। आरबीआइ ने जून, 2017 में जब मौद्रिक नीति की समीक्षा की थी तब भी कर्ज की बेहद धीमी रफ्तार का जिक्र किया था। आरबीआइ के गवर्नर उर्जित पटेल ने कहा था कि नोटबंदी के बाद वैसे ही बैंकों जमाराशियां काफी ज्यादा हैं। इसे निवेशित करना बहुत जरूरी है। इसके एक हिस्से को केंद्रीय बैंक ने रिवर्स रेपो रेट (वाणिज्यिक बैंक जब अपनी अतिरिक्त फंड आरबीआइ में जमा कराते हैं तो उस पर मिलने वाले ब्याज की दर) को बढ़ाकर खपाने की कोशिश की है लेकिन वह नाकाफी है।

 

ताजे आंकड़े बता रहे हैं कि आरबीआइ के पास नई जमा स्कीमों की रफ्तार भी 10 फीसद को फिर से पार कर गई है। यानी बैंकों के पास और ज्यादा अतिरिक्त फंड होगा। ऐसे में अगर बैंक इस राशि को कर्ज देकर नहीं खपाते हैं तो आगे चलकर उनके मुनाफे को चपत लग सकती है। जमा राशि पर ब्याज देने की जिम्मेदारी से वे नहीं बच सकते।

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