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बदरीनाथ धाम के आखरी गांव में भी लौटने लगी है रौनक

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चमोली। बदरीनाथ धाम के कपाट खुलने की तैयारियों के साथ ही धाम के आसपास बसे गांवों में भी रौनक लौटने लगी है। देश के अंतिम गांव माणा के साथ ही बामणी व अन्य गांवों के लोग अपने मवेशियों के साथ धीरे धीरे वापस लौटने शुरू हो गए हैं।

 

बदरीनाथ धाम के कपाट खुलने के बाद ये ग्रामीण नकदी फसलों के अलावा तुलसी माला व अन्य पूजन सामग्री की बिक्री से रोजगार प्राप्त करते हैं। शीतकाल के दौरान इन गांवों के लोग छह माह के प्रवास पर गोपेश्वर, नैग्वाड़, ङ्क्षघघराण समेत अन्य स्थानों पर चले जाते हैं।

 

इस वर्ष बदरीनाथ धाम के कपाट 30 अप्रैल को खुलने हैं। इसके लिए श्री बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति, प्रशासन व विभागीय अधिकारी तैयारियों में जुटे हैं। इसी गहमागहमी के बीच बदरीनाथ धाम के आसपास के माणा, बामणी, हनुमानचट्टी, बेनाकुली, पट््या, धनतोली, इंद्रधारा, गजकोटी, डुमका आदि गांव भी आबाद होने लगे हैं। इन गांवों के ग्रामीण आलू, गोभी, राई, मटर, मूली आदि उत्पादों के साथ तुलसी की माला यात्रियों को बेचकर रोजगार प्राप्त करते हैं।

 

बताते चलें कि तुलसी भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है। बदरीनाथ धाम में यात्री भगवान विष्णु को तुलसी की माला, तुलसी के पत्ते व फूल चढ़ाते हैं। स्थानीय लोग जंगलों से लाए गए तुलसी के पत्तों व फूलों की माला बनाकर यात्रियों को बेचते हैं। इससे इनकी अच्छी-खासी कमाई हो जाती है।

 

बदरी-केदार मंदिर समिति के मुख्य कार्याधिकारी बीडी सिंह ने बताया कि बदरीनाथ धाम में मंदिर समिति की तैयारियां अंतिम चरण में हैं। धाम में व्यवसायी भी पहुंच चुके हैं। इसके आसपास के गांवों के लोग भी अपने-अपने गांवों में व्यवस्थाएं जुटा रहे हैं। इस बार मौसम जिस प्रकार साथ दे रहा है, उससे बेहतर यात्रा की उम्मीद की जा रही है।

 

देश के अंतिम गांव माणा के अलावा आसपास के अधिकतर गांवों में भोटिया जनजाति के लोग निवास करते हैं। इनका पुश्तैनी पेशा ऊनी व्यवसाय है। बदरीनाथ धाम के कपाट खुलने के बाद अधिकतर ग्रामीण ऊन से पंखी, शाल, मोजे, टोपी, मफलर आदि बनाकर यात्रियों को बेचते हैं। इन उत्पादों को ये ग्रामीण अपने शीतकालीन प्रवास के दौरान तैयार कर लेते हैं।

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