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बच्चों के भीतर से पढ़ाई का भय निकालकर आगे बढ़ाना है: कंडवाल

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चमोली। जीवन में कुछ कर गुजरने का जुनून हो तो शारीरिक अक्षमता कोई मायने नहीं रखती। दिव्यांग शिक्षिका शशि कंडवाल इसका जीता-जागता उदाहरण हैं। वह खेल-खेल में बच्चों की प्रतिभा को निखारती हैं। इसी मेहनत को देख उन्हें शैलेश मटियानी पुरस्कार के लिए चयनित किया गया है। इससे शिक्षक जगत और क्षेत्र में खुशी का माहौल है।

 

40 वर्षीय दिव्यांग शशि कंडवाल का कहना है कि उनकी प्रेरणा स्त्रोत माता प्रेमा देवी और पिता रघुनाथ सिंह हैं। 20 मार्च 2000 को पहली बार उनकी तैनाती बतौर शिक्षिका प्रखंड कर्णप्रयाग के प्रावि जस्यारा में हुई। जहां वह नौ माह तक रहने के बाद प्रावि किमोली में तीन वर्ष व उसके बाद 2005 से 2017 तक प्रावि ग्वाड़ में प्राथमिक विद्यालय में तैनात रहीं।

 

इस दौरान विद्यालय की छात्र संख्या 20 से कम नहीं हुई। यहां अभिभावकों ने विद्यालय के शिक्षण कार्य पर संतोष जताते हुए बच्चों अन्यत्र विद्यालय में नहीं भेजा। शिक्षिका शशि कंडवाल का कहना है कि उनका लक्ष्य खेल-खेल में बच्चों के भीतर से पढ़ाई का भय निकालकर आगे बढ़ाना है।

 

अभिभावक व प्रधान ग्वाड़ रणवीर सिंह का कहना है कि अवकाश के दिनों में भी शैक्षिक व अन्य गतिविधियां संचालित रखती हैं।
28 जून 2017 के बाद बतौर प्रधानाध्यापिका प्रावि लंगासू में तैनात हुई। जहां वर्तमान में छात्र संख्या 13 से 22 हो गई है। शिक्षिका शशि कंडवाल एमए राजनीति शास्त्र व इंदिरा गांधी मुक्त विवि से बीएड में उपाधि ली है।

 

उनके कार्यकाल के दौरान प्रावि ग्वाड़ से वर्ष 2015 में अंताक्षरी व 2016 में सुलेख प्रतियोगिता के नौनिहालों ने राज्यस्तर पर प्रतिभाग किया। गणित बिजार्ड प्रतियोगिता में विद्यालय की रितिमा भी राज्य स्तर तक प्रतिभाग कर चुकी हैं।

 

खंड शिक्षाधिकारी, कर्णप्रयाग उमेश चंद्र कैलखुरा के मुताबिक शिक्षिका शशि कंडवाल ने बच्चों के लिए विद्यालय परिसर में सुरक्षा दीवार, बेंच निर्माण, चार्ट से बच्चों को खेल-खेल में अध्यापन कार्य कर विद्यालय आने के लिए प्रेरित किया। ऐसे समय में जब गांवों में पलायन जारी था। उनके प्रयास रंग लाए और छात्र संख्या 12 वर्षों में कम नही हुई।

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