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अर एक विस्वा प्लाट का बाना देहरादून छाला पड़ियाँ

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सी बुना छा हम गढ़वाली बिसर गए बल
हम भी अब देशी हो गए
ओधा पोधा पुंगडा तोंका, डेरा मु बांजा धरियां
अर एक विस्वा प्लाट का बाना देहरादून छाला पड़ियाँ
वल्तर बे अंग्रेजी टॉयलेट, पल्तर तोंका देवता धरियां ।

देहरादून (उत्तराखंड):महिलाओं की युवा पीढ़ी की प्रतिनिधि लेखिका, कवियत्री और जागर गायिका बाबा केदार की धरती के ह्यूण गांव (गुप्तकाशी) की उपासना सेमवाल पुरोहित आज किसी परिख्य की मोहताज नहीं है.महिला सशक्तिकरण एवं बाल बिकास में कार्यरत उपासना सेमवाल आज युवा पीढ़ी की महिलाओं का प्रतिनिधित्व कर रही जो की एक सुखद अहसास है। अपनी धारधार कविताओं, जागरों के माध्यम से बेहद कम समय में उपासना ने अपनी अलग पहचान बना ली है। प्रसिद्ध साहित्यकार बीना बेंजवाल, उमा भट्ट, से प्रेरित होकर उनकी विरासत को आगे बढा रही नवोदित कवियत्रि – उपासना सेमवाल, कुसुम भट्ट, रचना सती, कविता भट्ट, रीना रावत के साथ बाबा केदार की धरती से अपनी प्रतिभा की चमक बिखेरनी की ओर अग्रसर है।

 

मूल रूप से उपसना सेमवाल पुरोहित का गाँव तल्ला नागुपर के सणगु पाली है। आजादी से पहले इनके दादा और दादी यहाँ से शिमला जाकर बस गए थे। जिसके बाद वे वहीँ के होकर रह गए। वहीँ नौकरी की जिसके बाद अपने बेटे की शादी भी वहीँ की। नौकरी के लिए उपासना के पिताजी कानपुर चले गए। उपासना और उनके सभी भाई बहिनों का जन्म कानपुर में ही हुआ और शिक्षा दीक्षा भी वहीँ हुई। इसी बीच उनके सणगु पाली गांव का पुश्तैनी मकान जीर्ण शीर्ण होने के कारण टूट गया था। मकान टूटने की खबर पाकर इनके दादा जी अपनी जड़ों को नहीं भूले और अपने पुस्तैनी मकान फिर से बनाया जिसके बाद ये अक्सर अपने घर आने लगे।

 

अपने दादा के साथ उपसना भी अपने गांव आने लगी थी। जिसके बाद इनका परिवार यंही का होकर रह गया।उपासना को बचपन से ही अपने गांव की बेहद सुंदर लगता था। यहाँ की आबोहवा, लोकसंस्कृति, खेत खलियान, गांव, महिलाओं के संघर्ष अक्सर उन्हें कुछ लिखने के लिए प्रेरित करती थी। लेकिन हमेशा कुछ न कुछ कमी रह जाती। जिस कारण उपासना सृजनात्मक पहल नहीं कर पाई।
इसी बीच इनकी शादी गुप्तकाशी के ह्यूण गांव के बिपिन सेमवाल Bipin Semwal से हुई जो पेशे से पत्रकारिता और सामाजिक गतिविधियों से जुड़े हुए थे। शादी के बाद उपासना गृहस्थ में रम गई। लेकिन अपने मन के अंदर बसे सृजनात्मक पहल उपसना को हमेशा कचोटती रहती थी। लिहाजा एक दिन उपासना से न रहा गया और डरते डरते अपने पति से उन्होंने इस बारे में बात की। जब इनके पति ने इनकी बात सुनी तो उन्हें सहसा विश्वास ही नहीं हुआ की उपासना में ऐसी प्रतिभा भी है।
पति ने उपासना को सृजनात्मक पहल के लिए प्रेरित किया और हर तरह का अपेक्षित सहयोग दिया। अपने पति और परिवार से मिली हरी झंडी के बाद उपासना के सपनो को मानो पंख लग गए। इसलिए जब भी समय मिलता उपासना को तो वो आपने शब्दों को कविता से लेकर, गजल, शायर, गीत, जागर, नाटक, में पिरोती, जिसके बाद वो सबसे पहले अपने पति को अवलोकन के लिए देती। एक हिसाब से देखा जाय तो उपासना के पति ही उसके गुरु और मार्गदर्शक हैं।

 

उपासना की अब तक दो दर्जन से भी अधिक कवितायें और रचनाएँ विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकीं हैं। इसके साथ ही वो कई मंचो पर काव्य पाठ भी कर चुकी है। विगत दिनों भगवान श्रीक्रष्ण की बाललीलाओं पर आधारित इनके पहले जागर — बल गोंविदा ने इन दिनों यूट्यूब पर धमाल मचाया हुआ है। इसके अलावा इनकी कविताये … बेटी बिराणी बणाई किले …, मेरा देश का रज्जा मोदी, त्वीन कोणु सोणु बै सोदी …., जैसी कवितायें आज सोशियल मीडिया से लेकर यूट्यूब सहित हर किसी की जुबान पर है।

 


इसके अलावा उपासना अपने पति के साथ साथ सामजिक कार्यों में भाग लेती हैं और हाथ बटाती हैं। कलश साहित्यक संस्था के संयोजक और गढ़वाली कवि सम्मेलनों के जरिये लोकभाषा बचाओ आन्दोलन की अलख जगा रहे ओम प्रकाश सेमवाल के सम्पर्क में आना उपसना के जीवन की सबसे महत्वपूर्ण घटना साबित हुई। जिनकी प्रेरणा से उपासना के जीवन की दिशा और दशा बदल गई। ओमप्रकाश सेमवाल ने उपासना को न केवल पहली बार उखीमठ के मद्महेश्वर मेले में मंच प्रदान किया अपितु सदैव होंसला बढ़ाया और प्रोत्साहित किया। जिसके बाद उपासना ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
विगत दिनों देहरादून के ओनजीसी के सभागार में प्रसिद्ध साहित्यकार Madan Duklanकी पुस्तक ‘‘हुंगरा’’ के विमोचन में आयोजित कवि सम्मलेन में नरेंद्र सिंह नेगी जी, बीना बेंजवाल जी, जैसे बड़े बड़े साहित्यकारों के साथ पहली दफा उपासना ने काव्य पाठ किया तो सबकी नजर इस नवोदित कवियत्री के ऊपर ही लगी थी। जैसे ही उपासना ने कविता पाठ शुरू किया तो हर कोई हतप्रभ रह गया। पूरा सभागार तालियों की गडगढ़ाहट से गूंज उठा। उपासना के —- फेसबुक से लेकर पलायन और बेटियों पर प्रस्तुत कविताओं ने हर किसी को प्रभावित किया.

इस कविता की हर किसी ने भूरी भूरी प्रशंशा भी की और आने वाले भविष्य के लिए महिलाओं की युवा पीढ़ी की उमीदों को पंख लगाये हैं।लोकसंस्कृति और महिलाओं की वर्तमान स्थिति पर उपासना से लम्बी गुफ्तगू करने पर उपासना कहती हैं की मेरे मम्मी पापा मेरे आदर्श रहें हैं। माँ के साथ जीवन को मुश्किल वक्तों में कैसे जिया जाता है सीखा तो पिताजी से सपनो को पूरा करने का जज्बा। शादी के बाद पति ने हर कदम पर सहयोग किया और आगे बढने की प्रेरणा दी। आज मैं जो कुछ भी अपने पति विपिन सेमवाल जी की बदौलत ही हूँ। उन्होंने मेरे सपनों को पूरा करने की हर मुमकिन कोशिस की है।अभी तो बस एक छोटी शुरुआत की है, मंजिल तो कोसों दूर है।
कहती हैं की बेटी होना समाज में गर्व की बात है। मगर बेटी के अंदर एक आदिशक्ति भी है। इसकी पहचान कराना बेटी के लिए आवश्यक है। बेटियों को जागरूक कराने के लिए माँ-पिता को आगे आना चाहिए। स्कूलों में बच्चों को सिर्फ किताबों का ही ज्ञान दिया जाता है में चाहती हूँ की स्कूलों में बालिका शिक्षा के लिए अलग से पढाई हो और बच्चों को बेटे बेटी में समानता की शिक्षा मिले ताकि आगे चलकर महिला अपराधों पर कमी लायी जा सके।
गृहस्थ, नौकरी और सृजन में तारतम्यता बैठाना बेहद मुश्किल होता है। लेकिन पति के सहयोग ने मुझे हमेशा नया होंसला प्रदान किया है। में चाहती हूँ की कविताओं के माध्यम से समाज को जागरूक किया जाय और समाज में ब्याप्त बुराइयों को मिटा सकूँ। कविताओं के लिए शब्द खोजने की जरुरत महसूस नहीं होती है बस एक बार लिखने बैठ जाओ तो शब्द अपने आप आज जाते हैं। मैं कलश के ओमप्रकाश सेमवाल जी का आजीवन ऋणी रहूंगी जिन्होंने मुझे एक पलेटफॉर्म दिया और जीवन की दिशा और दशा बदल कर रख दी।
लोग आज पहाड़ और अपनी दुधबोली भाषा को छोड़ कर गांवो से शहर की और जा रहें है। लेकिन हम शहर को छोड़ अपनी माटी में लौट आये हैं। गढ़वाल के सांस्कृतिक विरासत के पुरोधा नरेंद्र सिंह नेगी जी गढ़वाल के कण कण में सुशोभित हैं और जागर गायिका बसंती बिस्ट वीणा के हर तार में बसी है जैसे गढ़ की माटी की सोंधी सी खुशबू, दोनों महान ब्यक्तिवों का जीवन मेरे लिए प्रेरणादाई है और मेरे हृदय में दोनों की लिए अपार श्रद्दा है।

देहरादून में हुगरा पुस्तक विमोचन का अनुभव मेरे लिए एक सुखद अनुभव था। इस मौके पर नरेंद्र सिंह नेगी जी ने मुझे गीत संगीत के बारे में महत्वपूर्ण ज्ञान दिया। इसके अलावा इतने बड़े मंच पर पहली बार बड़े बड़े साहित्यकारों के साथ सम्मलित होने पर अभी तक विश्वास नहीं हो रहा है। ..ये कवि सम्मलेन जीवन भर प्रेरणा देता रहेगा।
कहती है कि बड़ा दुःख होता है कि आज हम अपनी लोकसंस्कृति, लोकभाषाओं से दूर होते जा रहे हैं।मैं युवा पीढ़ी खासतौर पर युवा महिलाओ से अनुरोध करना चाहती हूँ कि वो अपनी लोकसंस्कृति, लोकभाषा के संवर्धन और संरक्षण व महिलाओं को बराबरी का हक देने के लिए अपने अपने स्तर से आगे आये। पहाड़ की बेटियों का हौसला और जज्बा पहाड़ जैसा होता है। इसलिए अपनी ताकत पहचानिये और अपने सपनों को पूरा करने की हर मुमकिन कोशिश कीजिएगा।

वास्तव में उपासना सेमवाल पुरोहित जैसी युवा महिलाओं का आगे आना भविष्य के लिए सुखद उम्मीद का भरोसा जगाता है। आशा करते है कि वे बहुत आगे तक जायेगी।
हमारी ओर से उपासना सेमवाल को ढेरों बधाईया ।

ग्राउंड जीरो से संजय चौहान !

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