सरकार जी! थोडा गुरूजी की भी तो सूनें !

आये-दिन शिक्षक संगठनों की हडताल से राज्य के नौंनीहालों की शिक्षण व्यवस्था का बूरी तरह से प्रभावित हों जाना स्वाभाविक है, जिसका सबसे बडा असर पहाड के उन दूर-दराज इलाकों के सैकडों-हजारों ग्रामीण बच्चों को झेलना पड रहा है जिनका एकमात्र, शिक्षा का साधन ये सरकारी विद्यालय ही हैं,( अथवा जिनके पास इसके अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं), तमाम कोशिशों के बाद राज्य सरकार नें इन विद्यालय को स्थापित तो कर दिया, पर समुचित प्रबंधन के अभाव में ये स्कूल जैसे-तैसे चल रहे हैं। चुकीं अब बाजार-कस्बों में सरकारी विद्यालयों का अस्तित्व घट रहा है, या वे पूरी तरह से बंद होंनें की कगार पर हैं। अतः इसी बहानें इन विद्यालयों को शिक्षक ’नसीब’ तो ही हों रहे हैं, परन्तु बार-बार की हडताल से इन बच्चों के भविष्य के साथ जो खिलवाड हो रहा है वह चिंता का विषय है। आर्थिक रूप से संपन्न लोग तो वैसे भी पहाडों में नहीं हैं, जो बचे-खुचे हैं, वे भी किसी खास परिस्थितियों के चलते गॉवों में हैं, लेकिन गरीब के लिए यही शिक्षण संस्थान सब कुछ हैं, बार-बार शिक्षकों का शिक्षण कार्यों से विरत होंना व अपनीं मॉगों को लेकर सडकों पर उतरकर, हरदम सरकार से दो-दो हाथ करनें के मुढ में रहनें से, राज्य की शिक्षा व्यवस्था लगभग चौपटाये नमः है, खास तौर से जब से राज्य अस्तित्व में आया है, तब से लेकर आज तक किसी न किसी बहानें राज्यभर के स्कूलीं शिक्षक, स्कूलों में कम, देहरादून राजधानी स्थित सचिवालय, विधान भवन और मुख्यमंत्री आवास जैसे बडे से बडे गलियारों की शोभा बढाते/इर्द-गिर्द चक्कर लगाते, ऑदोलित होते हुए ज्यादा नजर आते हैं।
लेकिन राज्यभर के गॉव-गलियों से लेकर आम बाजार-कस्बों में इस बात की चर्चा है, कि गुरूजी लोगों की असली दिक्कत क्या है ? वे बार-बार शिक्षण जैसे महत्वपूर्ण काम को त्यागकर हडताल पर जानें को क्यों अभिसप्त हैं, अर्थात उनका टारगेट भी ये गुरू लोग ही होते हैं, एक आम आदमी के लिए वैसे भी सरकार और उसकी नीतियों से बहुत ज्यादा वास्ता नहीं होता, इसलिए वे किसी भी रूकावट के लिए शिक्षकों को ही दोषी मानते हैं/मानते रहे हैं, जबकी सच्चाई ये भी है की हर बार शिक्षक ही दोषी नहीं है, अगर हमारे शिक्षकों का अतीत, और वर्तमान खंगालें तो सच्चाई कुछ और होगी। सीधी बात कहें तो सरकार की रीति-नीतियॉ ही ढुलमूल हैं, जो राज्य की शिक्षा व्यवस्था के लिए अवरोध का काम कर रही है, वरना शिक्षकों का आचरण ऐसा नहीं है/रहा है ? उन्होंनें हमेशा से ही एक शिक्षक के दायित्वों का निर्वहन पूर्ण ईमानदारी और जबावदेही के साथ किया है, आज भी ऐसा नहीं है, कि हमारे शिक्षक/शिक्षिकाओं में अपनें कार्यों के प्रति कोई उदासीनता अथवा लापरवाह हो, स्कूल-विद्यालयों में शिक्षक गणों से जिस सृजनात्मक वातावरण की अपेक्षा थी वे उसके प्रति पूर्ण समर्पित हैं।
साल भर पहले कुछ समय के लिए नियुक्त किये गये ’अतिथि शिक्षकों’ के मामले में सरकार की हीलहवाली नीति सरेआम हुई है, सरकार और हुक्मरानों नें इनके साथ ऐसा खेल-खेला जैसे मानों ’कोई अपना दिल बहला रहा हो’ जबकी इन शिक्षकों के नियुक्ति होंनें से राज्य की शिक्षा व्यवस्था को ढर्रे पर लानें में बडी मदद मिली, धार-खालों के इण्टर कालेजों में लोंगों नें वर्षों बाद गणित, रसायन, फिजिक्स और अंग्रेजी जैसे कठिन विषयों के अध्यापकों के दीदार किये और अभिवाहकों नें राहत की सांस ली। दूसरी तरफ ’अतिथि शिक्षक’ के रूप में नौकरी पाये इन नौजवान युवक/युवतियों नें अपनी शिक्षा ग्रहण के दौरान कभी ऐसा संघर्ष नहीं देखा होगा जो उन्हे सरकार नें ’पुर्ननियुक्ति’ के दौरान दिखाये। अब आधी-अधुरी नियुक्ति के बाद ये शिक्षक फिर असमंजस में हैं अतएव वे आगामी दिनों में सडकों पर नहीं उतरगें ! पुख्ता तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता पर अपनें बाजिब हकों के लिए यह उनका अपना अधिकार भी होगा और कर्तव्य भी। वर्षों से अनशन पर बैठे शिक्षा आचार्यों को लेकर सरकार की कोई स्पष्ट नीति अभी उजागर नहीं हो पाई है, 2012 से राज्यभर के 910 शिक्षा आचार्यों का कहना है की उन्हें शिक्षा मित्रों की श्रेणी में रखा जाय। सालों से ये लोग भी राज्य के सरकारी स्कूलों में बतौर शिक्षक अपना योगदान दे रहें हैं, क्या सरकार का ये दायित्व नहीं हैं कि उनके काम और योगदान को देखते हुए उन्हें उनकीं मॉगों का उचित समाधान दिया जाय ? वे वर्षों से सरकार के आगे हाथ फैलाकर अपनें जायज अधिकारों की मॉग कर रहे हैं। दूसरी राज्य हजारों-लाखों की तादात में शिक्षित-प्रशिक्षित युवा अपनीं नौकरी के लिए दर-दर की ठोंकरें खानें को मजबूर हैं,उनके सामनें उनका अंधकार होता भविष्य उन्हें अवसाद के गर्त में धकेल रहा है, यह राज्य की दोतरफा क्षति है एक तरफ हमारी बौद्विक क्षमता क्षरण हो रहा है तो दूसरी तरफ इन युवाओं की ऊर्जा नकारात्मक रूप से व्यय हो रही है। सेवारत शिक्षकों की कोई ठोस नीति न होंनें से भी हडताल को बढावा मिल रहा है, मौसम के साथ-साथ बदलनें वाली रीति-नीतियो से शिक्षा का भला कैसे हो सकता है ? ट्रॉसफर, पोंस्टिंग और प्रमोशन व वेतन भत्तों में तमाम तरह की विंसगति व्याप्त है, तरक्की की बाट जोह रहे वरिष्ठ शिक्षक कब सेवानिवृत्त हो गये, उन्हें पता ही नहीं चला ? इससे शेष शिक्षक कर्मियों के मनोबल को आघात पहुॅच रहा है। अभी हाल में प्राथमिक, जुनियर और माध्यमिक शिक्षक संगठन हडताल पर थे, हालांकि प्राथमिक और जुनियर स्कूलों के शिक्षकों की हडताल महज चेतावनी के लहजे में बीच-बीच में होती रहीं, पर माध्यमिक शिक्षकों की लम्बी हडताल के चलते छात्रों का जो नुकसान हुआ उसकी भरपाई होंना बेहद मुश्किल है ? सवाल ये भी है की इन शिक्षकों की मॅागों में कुछ भी ऐसा नहीं है, कि जिससे सरकार को कोई आपत्ति होती ? ये मॉगें सभी संवैधानिक दायरे में ही हैं, जिनका समाधान सरकार चाहे तो तत्काल संभव है। राजकीय माध्यमिक शिक्षक संगठन की मॉग पर गौर करें तो उनकी मॉगें हैं कि उन्हें तीन विशेष अवकाश मिलें, प्रोन्नत वेतनमान के तहत वेतनवृद्वि हो, पेंशन प्रकरण से वंचित शिक्षकों को पारिवारिक पेंशन का लाभ दिया जाय, विद्यालयों में कोटिकरण के लिए कमेटी गठित की जाय, शारीरिक शिक्षा को पाठ्यक्रम में शामिल किया जाय आदि-आदि, माना की इनमें से कुछ मॉगे सरकार और शासन स्तर से तत्काल संभव न भी हो किन्तु ज्यादातर मॉगे जायज होंनें के साथ-साथ जनोपयोगी भी हैं, जिनका समाधान संभव है, तथापि इन मॉगों को महज एक प्रार्थना पत्र/मॉग पत्र के जरिये ही मान लेंना संभव है। लेकिन ये शासन में बैठे उच्चाधिकारियों का निकम्मापन ही है, कि उन्हे बार-बार की चेतावनीं देंनें के बावजूद वे अपनीं ऑखें खोलनें को तैयार नहीं है।
बल्कि असली सवाल शासन में उन उच्चाधिकारियों और नेताओं की ’मानसिकता’ से भी हैं जिन्हें लगता है, ’’पढनें-पढानें का काम कोई भी कर/करा सकता है’’ अथवा ’’बिना पढे भी लोग पास हो जा रहे हैं’’ इसलिए शिक्षक और शिक्षालयों के बारे में उनके खयालात लगभग ’हल्के किस्म‘‘ के ही हैं, जिसका परिणाम आज खाली होते सरकारी विद्यालयों के परिसरों से साफ दृष्टिगोचर हो रहा है। अगर शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण संसाधन के प्रति हमारे हुक्मरानों की यही नीति रही, तो यकीनन राज्य की शिक्षा व्यवस्था और गरीब अवाम् के शिक्षा पाना बेहद मुश्किल हो जायेगा। एक दिन ऐसा भी आयेगा की सरकार द्वारा संचालित शिक्षा व्यवस्था पर बनिये, मुनाफाखोरों और व्यापारियों का ही राज होगा, (शायद यही सरकार चाह भी यही रही है,) जिनमें दाखिले के लिए योग्यता नहीं, आर्थिक हैसियत के आधार पर तय किये जायेंगें ? और तब इंसानों का नहीं हैवानों की संस्कृति से संचालित होगा ? फिर राज्य के सभ्य और सूसंस्कृत होंनें की आशा करना भी व्यर्थ है, क्योंकि जब तक किसी संगठन, संस्था को चलानें के लिए कोई नीति-नियम या निर्देशन अथवा सूस्पष्ट सोच का अभाव है तो हमें उसे आगे बढते देखनें की कल्पना भी नहीं करनीं चाहिए ? शिक्षा विभाग की कारगुजारियों को देखकर तो कम से कम यही लगता है,वह जैसे मेला खत्म हो और सामान समेटनें की तैयारी में है।
अगर राज्य की शिक्षा व्यवस्था को लेकर मुख्यमंत्री/सरकार वाकई गंभीर हैं तो इसके लिए उन्हें सबसे पहले एक सूस्पष्ट और निश्चित सोच विकसित करनी होगी, शिक्षा और शिक्षक की गरिमा को पुर्नस्थापित करना होगा, अध्यापक का सम्मान और उसके कार्यों को सराहना देनीं होगी, क्योंकि राज्य के अधिसंख्यक गरीब तबके का भविष्य इन्हीं स्कूलों के अस्तित्व पर निर्भर है। शिक्षा ही एकमात्र महत्वपूर्ण संसाधन है,जो समाज में परिवर्तन ला सकता है, नागरिकांे में आत्मविश्वास जगा सकता है, इसके लिए जरूरी है पहले शिक्षक को उसका बाजिब हक दिया जाय, वह है विश्वास का। ’बायोमैट्रिक मशीन‘ लगाकर नहीं उनके रिजल्ट और स्कूल के रखरखाव के अवलोकन से। इस तरह के कृत्यों से शिक्षकों की तोहीन ही हो सकती पर सुधार नहीं, विद्यालयों में अनुपस्थित रहनें, न पढानें की प्रवृत्ति किसी ओर राज्य विशेष की हो सकती है, पर उतराखण्ड के शिक्षकों, यहॉ तक अन्य कर्मियों में भी यह दूष्प्रवृत्ति देखनें को नहीं मिलती ? खासकर उन अधिसंख्यक शिक्षकों की जो कर्तव्य के प्रति हमेशा सचेत रहे हैं, हालांकि कुछ अपवाद हो सकते हैं, लेकिन राज्य के शिक्षकों का मूल चरित्र ऐसा कभी नहीं रहा ये सोचा जाना जरूरी है। शिक्षकों को पढानें के अतिरिक्त अन्य काम न सोंपा जाय, कुछ दिन पूर्व सुप्रीम कोर्ट के निर्देश और केंद्र सरकार के आदेश कहा गया की शिक्षकों की चुनाव ड्यूटी नहीं लगाई जानीं चाहिए, लेकिन यहॉ तो हालात ये हैं की शिक्षकों को चुनाव ड्यूटी तमाम वो काम करनें पडते हैं जो एक शिक्षक के लिए कहीं से भी मुफीद नहीं हैं। अपनें यहॉ तो साल दर साल चुनावों का मेला होंना आम है, लोक सभा, विधान सभा, त्रिस्तरीय पंचायत हो अथवा नगर पालिका के चुनाव हों बिना शिक्षकों के मानों संभव ही नही हैं। जनगणना का कार्य तो बिना शिक्षकों के संभव ही नहीं है, ग्रामीण स्तर में शिक्षकों के और भी अनेक काम हैं, तो स्कूल में भोजन करानें से लेकर उसका हिसाब-किताब तक अनेको काम शिक्षकगणों के माध्यम से ही संम्पन्न करा लिए जाते हैं, जिसकी रिर्पोट उन्हें तत्कालिक रूप से अपनें उच्चाधिकारियों को प्रेषित भी करनीं पडती है। जिसका प्रतिफल नौंनीहालों की शिक्षा व्यवस्था को कुप्रभावित हुए बिना संभव नहीं है।
हालॉकि सरकार के पास ठोस नीतियों का अभाव नहीं है, अपितू बहुत अच्छी सोच भी है और नीति भी काम करनें वालों की फौज भी है और उत्साह भी, पर जब उसे अमली जामा पहनानें की बारी आती है तो सरकार का रवैया ढुलमूल हो जाता है, यही सबसे बडी बीमारी है, कमजोरी है। हाल शिक्षक संगठनों की हडताल में जो बातें उभर कर सामनें आई हैं, वे सभी सामान्य स्तर की हैं, जिनमें वेतन विसंगति, ट्रॉसफर, पोस्टिंग, प्रमोशन आदि को लेकर शिक्षक संगठन ऑदोलित हैं, जिनके लिए राज्य के शिक्षा विभाग के पास नीति भी है,और उसे लागू करनें के संसाधन भी। जैसे तबादला और प्रतिनियुक्ति के लिए स्पष्ट नीति है/होंनें के बावजूद अपनें चहेतों की खातिर इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है। कुछ दिन पूर्व इन नियमों को ताक पर रखकर दो तबादले प्रकाश में आये हैं, यह हैं, जी0जी0आई0सी0 चिन्यालीसौड उंत्तरकाशी में कार्यरत की एक जीव विज्ञान की शिक्षिका को नियम विरूद्व टिहरी डायट में भेजा गया है, वहीं दूसरा मामला देहरादून स्थित डायट के वरिष्ठ प्रवक्ता को बतौर हेडमास्टर हयोटगरी (कालसी) भेजा गया था परन्तु उनके आदेश को यथावत रखते हुए उन्हें वहीं रखा गया है। यहीं नहीं पिछले साल भी इस तरह के एक-दो नहीं 39 शिक्षक/शिक्षिकाओं को गुपचुप ढंग से मनचाही पोंस्टिग दे दी गई, जिसनें तमाम शिक्षकों के उत्साह प्रभावित किया, अपितू उनका शासन रीति-नीतियों से भी विश्वास उठना स्वाभाविक है। ऐसे कई शिक्षक हैं, जिन्हें इंटीरियर के विद्यालयों में पढाते-पढाते कई सालों गुजर गये पर ऊॅची पहुॅच न होंनें के कारण उन्हें सुविधाजनक स्थान अभी तक नहीं मिला, बात कोटीकरण को लेकर भी है, जिस पर लगता है सरकार नें ठीक ढंग से होंमवर्क किया ही नहीं, कई बार कोटीकरण का मामल बेहद हास्यासपद स्थिति में दिखाई पडता है। जिस विद्यालय को वास्तव में ’डी’ अथवा ’एफ’ श्रेणी का होंना चाहिए था, उसे ’ए’ अथवा ’बी’ श्रेणी में दिखाया जा रहा है, कई बार स्थिति ठीक उलट भी दिखती हैं।
पर उन गरीब नौंनीहालों का क्या, जिनका भविष्य इस नीति की अनीति में पीस रहा है ? सरकारी हाकिमों, नेताओं, बडे ठकेदारों और मालदारों के बच्चे तो मॅहगे व आधुनिक स्कूलों में अध्ययनरत हैं, इसलिए इन सरकारी स्कूलों की बदइंतजामियत पर कोई आवाज भी नहीं उठती/उठाई जाती है। समय रहते सरकार नें अपनीं शिक्षा नीति में कोई ठोस पहल नहीं की तो यकीनन समाज का बडा तबका अच्छी और उत्तम शिक्षा से महरूम हो जायेगा।

देव कृष्ण थपलियाल
राठ महाविद्यालय पैठाणी
(संबद्वता-हे0न0ब0(केन्द्रीय) गढवाल विश्वविद्यालय श्रीनगर )
पो0-पैठाणी,वि0ख0-थैलीसैंण तह0-चाकीसैंण जिला पौडी गढवाल

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