सबसे बड़ा खलनायक है तो शिक्षक

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12 सितम्बर से शुरू हुई राजकीय शिक्षक संघ की प्रदेशव्यापी हड़ताल आज समाप्त होने की खबर है.इस हड़ताल के पहले दिन से राज्य सरकार और उसके हर कथन को वेदवाक्य मानने वाले मुख्यधारा के मीडिया ने जिस तरह का माहौल बनाया,उससे बीते 6 दिनों में ऐसा लगने लगा कि इस प्रदेश में यदि कोई सबसे बड़ा खलनायक है तो ये शिक्षक लोग ही हैं,जो हड़ताल पर बैठे हैं.

पर क्या वाकई शिक्षक गणों की मांग इतनी गैरवाजिब थी कि सभी को एक भ्रष्ट और माफिया परस्त सत्ता के मुखिया की शाब्दिक लफ्फाजी में फंस कर, ख़म ठोक कर उनके खिलाफ उतर पड़ना चाहिए था और भाषाई मर्यादा तक खोते हुए शिक्षकों को पीटने की गुहार सरकार से लगानी चाहिए थी?मैं खुले तौर पर कहना चाहता हूँ कि मैं राजकीय शिक्षक संघ की हड़ताल को कर्णप्रयाग में समर्थन देने गया.इसलिए क्यूंकि उनकी बहुतेरी मांगों से मेरी सहमति थी.इस हड़ताल में शिक्षकों की जो सबसे पहली मांग थी,वह थी कि प्रदेश में ट्रान्सफर एक्ट बने. राज्य बनने से लेकर आज तक शिक्षा विभाग में यदि कोई सर्वाधिक चर्चित गतिविधि है तो वो ट्रान्सफर ही है.हर साल यही चर्चा कि कौन जुगाड़ से ट्रान्सफर करवा करके,मनचाही जगह पहुँच गया और कौन बीसियों बरस से दुर्गम क्षेत्रों में ही पड़ा हुआ है.अपने कई शिक्षक मित्रों को गंभीर रोगों से जूझते हुए भी,सिफारिश न होने की वजह से, दुरूह स्थानों पर नौकरी करते हुए मैंने भी देखा है.फिर कौन सा विद्यालय सुगम है,कौन दुर्गम,यह भी एक अंतहीन बहस शिक्षा विभाग की भीतर चलती ही रहती है. दुर्गम-सुगम की श्रेणी के सन्दर्भ में तो यह सोचे जाने की आवश्यकता है कि कोई जगह आजादी के 70 साल बाद और राज्य बनने के 15 साल बाद भी दुर्गम ही क्यूँ बनी हुई है?उसे दुर्गम बनाए रखने के लिए कौन उत्तरदायी है?यदि शिक्षक समुदाय खुद ही यह मांग कर रहा है कि पारदर्शी तरीके से स्थानान्तरण के लिए कानून बनना चाहिए तो इसके लिए शिक्षकों की लानत-मलामत नहीं बल्कि उनका तो स्वागत किया जाना चाहिए था.आखिर जब वे पारदर्शी ट्रान्सफर एक्ट की मांग कर रहे थे तो एक तरह से वे अपने ही उन शिक्षक साथियों(जिनमे उनके शिक्षक संघ के कतिपय नेता भी शामिल हैं) के खिलाफ भी तो लड़ रहे थे जो ऊँची पहुँच-पहचान या फिर रिश्वत देकर मनचाही जगहों पर ट्रान्सफर पा जा रहे हैं. शिक्षकों की मांगों से सरकारी खजाने पर बोझ पड़ने का रोना रोने वाले मुख्यमंत्री हरीश रावत से तो पूछा  जाना चाहिए कि ट्रान्सफर एक्ट बनाने से कौन से खजाने पर बोझ पड़ने वाला है? स्थानान्तरण की पारदर्शी प्रक्रिया के लिए यदि कानून बन जाएगा तो इससे राज्य के खजाने पर तो बोझ नहीं पड़ेगा.परन्तु ट्रान्सफर-पोस्टिंग का धंधा चलाने वालों का खजाना जरुर खाली रह जाएगा.मुख्यमंत्री जी, क्या आपको इन धंधेबाजों के धंधे की चिंता सता रही थी,जो आपने इस मांग पर मुंह खोलने के बजाय शिक्षकों के विरुद्ध दुष्प्रचार करने को ज्यादा मुफीद समझा ?

इस आन्दोलन के दौरान शिक्षकों की मांगों को वेतन-भत्ते से जुडी मांगें बता कर,जब उनके खिलाफ दुष्प्रचार शुरू हुआ तो शिक्षक भी रक्षात्मक होते हुए कहने लगे कि उनकी मांग वेतन-भत्ते की नहीं है.अव्वल तो यह कि वेतन-भत्ते से जुडी मांगों के लिए भी आन्दोलन करना न तो कोई पाप है,न कोई अपराध.इसलिए इस बात पर रक्षात्मक होने की भी जरुरत नहीं है.अगर नियुक्ति प्रक्रिया में किसी छेद के चलते कोई वेतन विसंगति पैदा हो जाती है तो उसे ठीक करने की मांग कैसे गैर वाजिब या नाजायज हो जाती है?इस हड़ताल में शामिल शिक्षकों में से बहुतेरे विविध स्रोतों से नियुक्त हुए थे,जैसे कोई शिक्षक मित्र से आया,कोई सीधी भर्ती से,कोई प्रमोशन से.इसके चलते उनकी सेवाओं,वेतन आदि में बहुत सारी विसंगतियाँ हैं.यदि वे मांग करते हैं कि इन विसंगतियों का हल ढूँढा जाना चाहिए तो इसमें गलत क्या है?ऐसा नहीं करना तो प्रदेश की नौकरशाही के निक्कमेपन को ही प्रदर्शित करता है.

दरअसल शिक्षा विभाग ही नहीं प्रदेश के सभी विभागों में एक ख़ास तरह की नीतिगत अराजकता सरकार चलाने वाले सत्ताधीशों और नौकरशाहों द्वारा फैलाई गयी है.आम तौर मंत्री,मुख्यमंत्री और नौकरशाहों का काम राज्य को निर्धारित,परिभाषित कानूनों के हिसाब से नीतिगत तरीके से चलाना होता है.लेकिन उत्तराखंड में इसके ठीक उलट परिपाटी है कि नीति बनाने के बजाय नीतिगत अराजकता कायम रखो ताकि अपने और अपनों का काम सरलता से हो सके और बाकियों को ठेंगा दिखाया जा सके.जाने-अनजाने शिक्षक समुदाय ने इस नीतिगत अराजकता को चुनौती दे दी.इसी का नतीजा था कि सरकार के साथ ही  सरकार की कृपा के आकांक्षी कतिपय पत्रकार भी शिक्षकों पर लट्ठ लेकर पिल पड़ने को उतारू हो गए.

आईये जरा सरकार बहादुर के खजाने पर बोज पड़ने वाले तर्क का भी परीक्षण कर लिया जाए.ऊपर स्पष्ट किया ही गया है कि शिक्षकों की हड़ताल में ज्यादातर मांगें आर्थिक प्रकृति की नहीं थी.लेकिन खजाने पर बोझ पड़ने की बात कौन कह रहा है?हरीश रावत-जिन्होंने 2014 में उत्तराखंड में कांग्रेस की लोकसभा की पाँचों सीटों पर हार के बाद अपने सभी विधायकों को मंत्री का दर्जा दे दिया? जो मुख्यमंत्री बीजापुर गेस्ट हॉउस से दून यूनिवर्सिटी या फिर जॉलीग्रांट हवाई अड्डे भी सरकारी हेलीकाप्टर में आते हैं,वो जब इस तरह खजाने की चिंता करते दिखते हैं तो बेहद नकली मालूम पड़ते हैं?शिक्षकों को तो नौकरी करने की एवज में देने के लिए खजाने में पैसा नहीं है,लेकिन सेवानिवृत्त मुख्य सचिव से लेकर डी.जी.पी., आई.ए.एस.,पी.सी.एस. से लेकर इंस्पेक्टर तक से रिटायर हो चुके अपने प्यारों को सरकारी धन पर दोबारा नियुक्त करने पर खजाने पर कोई बोझ नहीं पड़ता?

निश्चित तौर पर शिक्षा के महकमे से जुडी यदि कोई सर्वाधिक महत्व की चीज है तो वह शिक्षा है,पठन-पाठन है.लेकिन सरकारी शिक्षा यदि आज इस बदहाल अवस्था में है तो उसके लिए सर्वाधिक जिम्मेदार कौन है?उसके लिए सर्वाधिक जिम्मेदार तो सरकार ही है,जिसने सरकारी शिक्षा को तबाह करने में कोई कसर नहीं छोड़ी.विद्यालयों में न पर्याप्त शिक्षकों की व्यवस्था की,न भवनों की,न बैठने से लेकर शौचालयों की.अभी कुछ दिन पहले ही शिक्षा मंत्री के विधानसभा क्षेत्र में एक बच्ची सरकारी स्कूल का शौचालय टूटने से असमय ही काल का ग्रास बन गयी.एक तरफ सरकारी स्कूलों की उपेक्षा एवं दुर्दशा की गयी और दूसरी तरह कुकुरमुत्तों की तरह प्राइवेट स्कूलों को खुलने की छूट दे दी गयी.शिक्षा का व्यापार करने वाली इन दुकानों की गुणवत्ता का खूब प्रचार भी किया गया.इस गुणवत्ता के प्रचार का आधार सिर्फ यही था कि इनमे कोट-पेंट-टाई वाली यूनिफार्म थी और ये खूब फीस वसूलते हैं.वरना इनकी गुणवत्ता तो इसी से समझी जा सकती है कि एक महंत की अगुवाई वाले ट्रस्ट की स्कूलों की चेन में 10 स्कूलों की मान्यता पर 100 स्कूल धडल्ले से चलाये जा रहे हैं.इन ऊँची दुकानों के फीके पकवानों के उदाहरण ढूँढने निकलें तो चारों तरफ बिखरे पड़े हैं.जिन सरकारी स्कूलों में प्रशिक्षित,उच्च शिक्षा प्राप्त शिक्षक पढ़ा रहे हैं,उनके बारे में तो समाज में यह धारणा प्रसारित की गयी कि इनमे गुणवत्ता नहीं है और मोटी फीस वसूल कर बहुदा अधकचरारे, अल्प शिक्षित अध्यापकों से पढ़ाने वाले प्राइवेट स्कूल गुणवत्ता की खान बताये जा रहे हैं.इन निजी शिक्षण संस्थानों की मनमानी के खिलाफ अभिभावक गण कसमसाते रहते हैं,पर आम तौर पर उनके खिलाफ मुंह खोलने की हिम्मत तक नहीं कर पाते.जो लोग शिक्षकों की हड़ताल के दौरान पढाई चौपट होने का उलहना दे रहे थे,उनमे से कितनों के बच्चे उन सरकारी स्कूलों में पढ़ रहे हैं?इस सन्दर्भ में मुख्यमंत्री हरीश रावत से जुड़ा किस्सा पुनः याद करना समीचीन होगा.कुछ समय पहले उत्तर प्रदेश में उच्च न्यायालय ने यह फैसला दिया कि सभी सरकारी अफसरों एवं कर्मचारियों के बच्चों को सरकारी स्कूल में पढना चाहिए.बयानों के गोले दागने में महारत रखने वाले मुख्यमंत्री हरीश रावत ने इस मौके पर भी लपक कर बयान दिया- “मेरा पोता भी सरकारी स्कूल में पढ़ेगा.”लेकिन जब नीति के स्तर पर कार्यवाही करनी थी तो बयान बहादुर रावत साहब ने क्या किया? उनके मंत्रिमंडल ने प्रस्ताव पास किया कि देहरादून और नैनीताल के बड़े प्राइवेट स्कूल यदि पहाड़ में यदि स्कूल खोलना चाहेंगे तो उन्हें लैंड यूज नहीं बदलवाना पड़ेगा.साथ ही सरकार उनके स्कूल तक सडक,बिजली,पानी का इंतजाम करके देगी.इतने पर ही हरीश रावत नहीं रुके बल्कि उन्होंने यह भी बयान दिया कि सरकार यह भी सुनिश्चित करवाएगी कि 25 सरकारी कर्मचारियों के बच्चे इन प्राइवेट स्कूलों में पढ़ें.यह भी याद कर लेना चाहिए कि अल्मोड़ा जिले के नैनिसार में जिंदल के इंटरनेशनल स्कूल को ग्राम समाज की जमीन देने के लिए मुख्यमंत्री हरीश रावत किस कदर मरने-मारने की हद तक आमादा थे.दरअसल आज समाज का जो जरा भी साधन सम्पन्न हिस्सा है,उसके बच्चे तो प्राइवेट स्कूलों में ही पढ़ते हैं..समाज के सर्वाधिक विपन्न,साधनहीन,दलित तबके के बच्चे ही सरकारी स्कूलों में पढने जा रहे हैं.इसलिए उनकी कोई आवाज भी नहीं है.इस हड़ताल से भी सरकार इसी लिए ज्यादा चिंतित नहीं हुई क्यूंकि इनमे पढने वाले समाज के सबसे कमजोर तबके के बच्चे हैं.सरकारी शिक्षा को बचाए जाने की जरुरत तो इसी कमजोर तबके के लिए है ताकि वो शिक्षित हो सके.यह तो शिक्षा का सही ढांचा खड़ा करने से,सामान शिक्षा प्रणाली से मुमकिन है.

जिन्हें शिक्षकों की हड़ताल से शिक्षा की बर्बादी नजर आ रही है,उन्हें यह जान लेना चाहिए कि शिक्षा को बर्बाद करने की बुनियाद तो सरकार ने स्वयम रख दी है.शिक्षा में जिस तरह से विश्व बैंक की घुसपैठ हुई है,तमाम एन.जी.ओ. के लिए रास्ता बनाया जा रहा है,वह शिक्षा को तबाह करने का ही षड्यंत्र है.प्राथमिक शिक्षा में एक शिक्षक,पांच कक्षाओं को पढाये,यह विश्व बैंक का ही फार्मूला है.सर्व शिक्षा अभियान से लेकर रमसा तक सब विश्व बैंक की परियोजनाएं हैं,जिनमे शिक्षकों के सर्वाधिक प्रतिभावान हिस्से को परीक्षा लेकर बाबूगिरी के कामों पर लगाया जा रहा है. कुछ साल इन परियोजनाओं में काम करने के बाद बिरला ही शिक्षक होगा,जो शिक्षण के काम का बचेगा.सरकारी शिक्षा को बचाने के लिए तो जरुरी है कि इन बर्बादी की परियोजनाओं से शिक्षा को बचाया जाए.

शिक्षकों की हड़ताल के समर्थन करते हुए यहाँ यह कहने का कतई कोई प्रयास नहीं है कि शिक्षक समाज सब कमजोरियों से मुक्त है,वह सर्वगुण सम्पन्न है.निश्चित रूप में ऐसा नहीं है. समाज में व्याप्त बुराईयाँ और कमजोरियों शिक्षकों में भी पायी जाती हैं.कई (अव)गुण तो ऐसे हैं जो विशिष्ट तौर पर कतिपय शिक्षकों में ही पाए जाते हैं.कतिपय शिक्षकों के खिलाफ स्वयं इस लेखक ने भी अभियान चलाया है.लेकिन शिक्षकों के अवगुणों,बुराईयों के खिलाफ लड़ाई उस समय के लिए बचा कर नहीं रखी जानी चाहिए जबकि वे अपने हकों की लड़ाई लड़ रहे हों.

शिक्षकों की हड़ताल के दौरान जिस तरह से सत्ता और उसकी कृपा के आकांक्षी लोगों द्वारा शिक्षकों के खिलाफ अभियान चलाया,वह बेहद क्षोभनीय है.जिस तरह की घटिया भाषा का इस्तेमाल किया गया और यहाँ तक कि शिक्षक को डेंगू होने को भी चुटकुले की तरह सोशल मीडिया पर पेश किया गया,वह बेहद शर्मनाक और संवेदनहीन रवैया है.

हम ऐसे समय में जी रहे हैं जबकि शासन व्यवस्था से समाज अत्याधिक खिन्न हैं.पहाड़ में तो शासन व्यवस्था के अंग के रूप में जिससे हमारा रोज साबका पड़ता है,वह सरकारी शिक्षक ही है.इसलिए पूरी व्यवस्था का गुस्सा लोग शिक्षकों पर उतार कर स्वयं को हल्का कर ले रहे हैं.यह प्रक्रिया बहुत सचेत रूप से हो रही हो,ऐसा आवश्यक नहीं.जिस गुस्से को सरकार-सत्ता की काहिली के खिलाफ केन्द्रित होना चाहिए था,वह शिक्षकों पर उतर रहा है.इसका सर्वाधिक फायदा भी सत्ता को ही होता है.जनता का गुस्सा शिक्षकों पर केन्द्रित हो जायेगा तो शिक्षक भी समाज को अपना बैरी समझेगा. इसका फायदा भी उसी राजसत्ता को होगा जो शिक्षा से लेकर शासन व्यवस्था के हर क्षेत्र में बदइन्तजामी के लिए उत्तरदायी है.

एक समाज के तौर पर यह बेहद चिंताजनक है कि अपने शिक्षकों के प्रति हम इतने आक्रोश से भरे बैठे हैं.एक समाज के रूप में यह हमें कहीं नहीं पहुंचाएगा.शिक्षकों को भी समाज के हिस्से के तौर पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता तो है कि समाज से उसका इस कदर अलगाव क्यूँ है कि सत्ता आसानी से सारे आक्रोश को झूठे तथ्यों के सहारे उसके खिलाफ मोड़ने में कामयाब हो जा रही है ?

-इन्द्रेश मैखुरी

ये लेखक के निजी विचार है

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