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रीता बहुगुणा जोशी का पार्टी छोडऩा, कांगे्रस के लिए बड़ा झटका

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देहरादून,। कांगे्रस पार्टी पूरी तरह दो धड़ों में बंटी नजर आ रही है। एक धड़ा जहां पार्टी अध्यक्षा सोनिया गांधी अथवा प्रियंका के हाथों में पार्टी का नेतृत्व की बागडोर चाहता है। वहीं दूसरा धड़ा राहुल गांधी के नेतृत्व में कार्य करने की बेताबी जाहिर करता रहा है। राष्ट्रीय राजनीति की धुरी रहे यूपी में भी कांगे्रस के भीतर हलचल तेज है। पार्टी की खांटी मानी जाने वाली नेत्री रीता बहुगुणा जोशी का कांगे्रस पार्टी छोड़कर भाजपा का दामन थामना कांगे्रस के लिए किसी झटके से कम नहीं माना जा रहा। यूपी में करीब चौबीस सालों से कांग्रेस पार्टी की सेवा कर रही रीता बहुगुणा जोशी का भाजपा में शामिल होना राष्ट्रीय नेतृत्व के साथसाथ यूपी कांगे्रस के लिए किसी ‘सदमेंÓ कम नहीं माना जा सकता। और इसका सीधा असर उत्तराखंड की राजनीति में भी पडऩा लाजिमी है।
रीता बहुगुणा जोशी को भाजपा में शामिल कराकर अब भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व मानों उत्तराखंड में हेमवती नंदन बहुगुणा के नाम की विरासत को भुनाने की कोशिश में है। रीता बहुगुणा जोशी पहाड़ की बेटी हैं, ऐसे में कांग्रेस का दामन छोड़कर उनका अपने बेटे के साथ भाजपा पार्टी में आना आगे आने वाले समय में उत्तराखंड की राजनीति पर बड़े फेरबदल की आहट भी माना जा रहा है। प्रदेश के भाजपा के कुछ नेता तो अभी से दबी जुबां में मानने लगे हैं कि केंद्रीय नेतृत्व जल्द ही रीता बहुगुणा जोशी के कांधे पर उत्तराखंड की बड़ी जिम्मेदारी भी डाल सकता है। हालांकि यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा, मगर अटकलों का दौर तेज हो गया है।
सूत्रों की माने तो पार्टी नेताओं में एकमत होने की दशा में आलाकमान रीता बहुगुणा जोशी को उत्तराखंड में सीएम के चेहरे के रूप में प्रोजेक्ट भी कर सकता है। हालांकि फिलहाल यह सभी कयासों तक ही सीमित है। बहरहाल जिस तरह उत्तराखंड में जल्द ही होने जा रहे विधानसभा चुनाव के लिए सीएम का चेहरा सामने करने में आलाकमान उलझन में है। वहीं माना जा रहा कि उत्तराखंड में चुनावी वैतरणी में भाजपा की नैया पार लगाने में रीता बहुगुणा जोशी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। उल्लेखनीय रहे कि उत्तराखंड में 18 मार्च के बाद के जिस तरह कांगे्रस के लिए दुरूह हालात पैदा हुए, और भाई विजय बहुगुणा ने कांगे्रस छोड़कर भाजपा की सदस्यता ग्रहण कर ली उसके बाद से ही यूपी में रीता बहुगुणा जोशी को कोई बड़ी जिम्मेदारी देने से राष्ट्रीय नेतृत्व कदम पीछे खींचता आ रहा था। उधर कांगे्रसी सूत्रों का कहना कि ढाई दशक का समय पार्टी के लिए पूरी शिद्दत के साथ कार्य करने पर भी हाईकमान ने यूपी के लिए शीला दीक्षित को सीएम का चेहरा बनाने का जो निर्णय लिया, उससे आहत होकर रीता बहुगुणा जोशी ने कांगे्रस छोडऩे का आखिरकार कठोर मगर सही निर्णय कर ही लिया।
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