udaydinmaan, News Jagran, Danik Uttarakhand, Khabar Aaj Tak,Hindi News, Online hindi news भारत: भारतीय दर्शन शिक्षा, संस्कृति और सभ्यता का गौरवशाली केंद्र कण्वाश्रम

hist…भारतीय दर्शन शिक्षा, संस्कृति और सभ्यता का गौरवशाली केंद्र कण्वाश्रम

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कहते है कि इतिहास अपने को दोहराता जरूर है ,जब इन्सान अपने इतिहास को स्वीकार नहीं करता तो कुदरत कभी न कभी बीते हुए इतिहास को सच को प्रमाणों के साथ सामने ले आती है। जिस चक्रवर्ती सम्राट भरत के नाम से हमारे देश का नाम भारतवर्ष पड़ा, उनकी जन्म स्थली कण्वाश्रम आजादी के 65 साल का कालखण्ड बीत जाने के बाद भी गुमनामी के अंधेरे में खोया हुआ है। इसी पर केंद्रित यह खास रिपोर्टः-विजयपाल सिंह रावत
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नागाधिराज हिमालय की तलहटी कोटद्वार भाबर में मालिनी नदी के तट पर स्थित कण्वाश्रम अतीत में भारतीय दर्शन संस्कृति, आध्यात्म और सभ्यता का अत्यन्त महत्वपूर्ण माना जाता है। इसके सबूत पहले 1993 और फिर अब यहां एक नाले की बाढ़ में निकले शिलाखण्डों और खंडित भवनों के अवशेषों से मिलते हैं। कण्वाश्रम के पास से गुजर रहे एक बरसाती नाले में बहकर निकले पौराणिक शिलाखण्डों और मूर्तियों से साबित होता है कि अतीत में कण्वाश्रम अध्ययन-अध्यापन, चिंतन, शोध और संस्कृति का केंद्र रहा होगा। यहां निकली मूर्तियों और शिलाखण्ड़ों को देखने के लिए दूर-दूर से आ रहे लोगों के कौतूहल का विषय बना हुआ है।

मान्यता है कि प्राचीन काल में नालंदा की भांति भारतीय दर्शन शिक्षा, संस्कृति और सभ्यता के गौरवशाली केंद्र कण्वाश्रम को दुश्यंत-शकंुतला की प्रणय स्थली और उनके पुत्र चक्रवर्ती सम्राट भरत का जन्म स्थान रहा है। महाकवि कालिदास द्वारा रचित अभिज्ञान शाकंुतलम और पुराणों में भी इसका उल्लेख मिलता है। देश का गौरव यही वह कण्वाश्रम है जहां कुलपति महर्षि कण्व के संरक्षण में सहस्रों विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करते थे। लेकिन इसे विड़म्बना ही कहा जायेगा कि पुरातत्व एवं ऐतिहासिक महत्व का कण्वाश्रम आज भी घोर उपेक्षित है।

सन् 1993 में इसी नाले में आई बाढ़ में सैकड़ों की तादाद में शिलाखण्ड और मूर्तियांे के बहकर आने से तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार और गढ़वाल विश्वविद्यालय के पुरातत्व विभाग ने इन मूर्तियों और शिलाखण्डों पर शोध की बात कही थी, लेकिन समय गुजरने के बाद न तो शोधकर्ता इस पर गंभीर दिखाई दिये दिये और न ही उत्तर प्रदेश सरकार ने इसकी सुध ली। एक बार फिर इसी बरसाती नाले से निकले इन शिलाखण्डों और मूर्तियांे के साथ ही सीढि़यों और दीवारों ने यह साबित कर दिया कि कण्वाश्रम में कभी फलती फूलती एक समृ( संस्कृति और सभ्यता रही थी। पुरातत्व विभाग और सरकार ने भले ही कण्वाश्रम के अतीत की खोज की दिशा में कोई गंभीर कदम कभी न उठाया हो लेकिन कुदरत ने जरूर इस ओर इशारा किया है। पहले 1993 और फिर अब की बरसात में इस नाले में आई बाढ़ से निकली प्राचीन सभ्यता के अवशेष कण्वाश्रम के समृ( अतीत की स्थापत्य एवं भवन निर्माण कला के दर्शन होते है।

कण्वाश्रम को शिक्षा, शोध एवं पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करने की मांग लंबे समय से उठाई जाती रही है लेकिन अब तक की सरकारों ने लोगों की इस मांग को अमलीजामा पहनाने की दिशा में कभी कोई जहमत नहीं उठाई। भारी बरसात में नाले की बाढ़ से निकले इन प्राचीन इतिहास के गवाह शिलाखण्डों, भवनों के अवशेषों और मूर्तियों से प्रशासनिक अधिकारी इनके संरक्षण और कण्वाश्रम को फिर से उसके अतीत का गौरव दिलाने की दशा में कदम बढ़ाने की बात कर रहे हैं। महर्षि कण्व का आश्रम और उसकी शिष्य परंपरा का यह महान ऐतिहासिक केंद्र कब और कैसे उजड़ गया यह जरूर एक शोध का विषय है।

महान विचारक दार्शनिक विद्वान और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे डा. संपूर्णानंद ने यदि इसकी ढंूढ़ खोज न कराई होती तो देश का यह महानतम सभ्यता का प्रतीक और शिक्षा-संस्कृति का तीर्थ हमेशा के लिए अतीत के गर्भ में ही गुमनाम रहा होता। सन् 1956 में डा.संपूर्णानदं ने स्वयं कोटद्वार आकर कण्वाश्रम के विकास की जो नींव रखी थी एक कालखण्ड गुजर जाने के बाद भी न तो राज्य सरकार और न ही केंद्र ने कभी कोई गंभीर कदम नहीं उठाया। कण्वाश्रम में निकली ऐतिहासिक मूर्तियों और शिलाखण्डों के संरक्षण को लेकर जब उपजिलाधिकारी अनिल गर्बयाल से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि उनके संज्ञान में ऐसा मामला नहीं था यदि ऐसा है तो पुरातत्व व ऐतिहासिक महत्व की इन राष्ट्रीय धरोहरों के संरक्षण के लिए आर्कियोलोजिकल विभाग को सूचित किया जाएगा।
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कण्वाश्रम भरत की जन्मस्थली थी, यदि इस तथ्य को छोड़ भी दिया जाए तो कण्वाश्रम में नैसर्गिक प्रयासों से सामने आ रही मूर्तिया इस स्थान की महत्ता को उजागर कर रही है कि कण्वाश्रम में महर्षि कण्व का आश्रम की नहीं अपितु पूरी सभ्यता ही विद्यमान थी। बातचीत में लैंसड़ोन वन प्रभाग के प्रभागीय वनाधिकारी नरेंद्र चौधरी ने बताया कि यह एक संवेदनशील मामला है और इन मूर्तियों को अपनी कब्जे में लेकर इसके संरक्षण को लेकर संबंधित रेंज अधिकारी को निर्देशित किया जा चुका है और साथ ही पुरातत्व विभाग को भी इसकी जानकारी दे दी गई है। जिससे उम्मीद की जानी चाहिए कि आखिर अब तो उत्तराखण्ड और केंद्र सरकार देश और दुनिया की ऐतिहासिक धरोहर कण्वाश्रम के संरक्षण और संवर्द्वन के लिए कोई ठोस कदम उठायेगी।

हालांकि अब तक तक प्रशासन नें इस ओर ध्यान नहीं दिया हैं कण्वाश्रम भरत की जन्मस्थली थी, यदि इस तथ्य को छोड़ भी दिया जाए तो कण्वाश्रम में नैसर्गिक प्रयासों से सामने आ रही मूर्तियां इस स्थान की महत्ता को उजागर कर रही है कि कण्वाश्रम में महर्षि कण्व का आश्रम की नहीं अपितु पूरी सभ्यता ही विद्यमान थी।

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