udaydinmaan, News Jagran, Danik Uttarakhand, Khabar Aaj Tak,Hindi News, Online hindi news बोला-बोला सरकार लोकभाषा की बात पर भी अब कुछ बोला!

बोला-बोला सरकार लोकभाषा की बात पर भी अब कुछ बोला!

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राज्य की अपनी लोकभाषा गढ़वाली-कुमाऊँनी के लिए कोई अकादमी अस्तित्व में नही है। वोटबैंक की इस राजनीति में पहाड़ का आम आदमी खुद को ठगा महसूस कर रहा है। वर्षों से उपेक्षा झेल रहे पहाड़ के लिए अपने ही राज्य में भेदभाव होना एक यक्ष प्रश्न भी उठाने लगा है, क्या भाषाई और भौगोलिक विभिन्नता के आधार पर बने ‘उत्तराखण्ड राज्य’ में स्थानीय पहचान को न्याय न मिल पाना अंसगत नहीं है ? राज्य मंे जहां विभिन्न भाषाओं को सरकार ने दर्जा दे दिया वहीं हमारी भाषा की किसी ने सुध नहीं ली। इन्हीं बिंदुओं पर दीपक बेंजवाल का यह विशेष आलेख। संपादक

दशकों से अपनी अलग पहचान की छटपटाहट पहाड़ की आम जनता में साफ नजर आती है। आपदा, पलायन और विस्थापन से जूझते पहाड़ को अपनी विलुप्त होती कला, संस्कृति और खासकर गढ़वाली-कुमाऊँनी लोकभाषा के संरक्षण संवर्धन को लेकर एक स्पष्ट नीति की आवश्यता सिद्दत से महसूस होने लगी है। वो भी तब जब उत्तराखण्ड में पंजाबी, संस्कृत और उर्दू को लेकर आकादमी खोले जाने की घोषणाए की जा चुकी है।

इसके उलट राज्य की अपनी लोकभाषा गढ़वाली-कुमाऊँनी के लिए कोई अकादमी अस्तित्व में नही है। वोटबैंक की इस राजनीति में पहाड़ का आम आदमी खुद को ठगा महसूस कर रहा है। वर्षों से उपेक्षा झेल रहे पहाड़ के लिए अपने ही राज्य में भेदभाव होना एक यक्ष प्रश्न भी उठाने लगा है, क्या भाषाई और भौगोलिक विभिन्नता के आधार पर बने ‘उत्तराखण्ड राज्य’ में स्थानीय पहचान को न्याय न मिल पाना अंसगत नहीं है? सूबे की सरकार इन बीते 13 सालों में लोकभाषा गढ़वाली-कुमाऊँनी की मान्यता को लेकर एक बार भी खुलकर नहीं बोल पाई। पंजाबी और उर्दू अकादमी खोले जाने की घोषणा के बाद अब आखिर सवाल उठना लाजमि है कि राज्य बने बीते 13 सालों में पहाड़ की इस अहम पहचान को लेकर सरकार अब तक अहम फैसला क्यों नहीं ले पाई? जबकि भारतीय संविधान ;अनुच्छेद 350 कद्ध भी मानता है कि किसी भी राज्य में मातृभाषाओं को पाठ्यक्रम में लागू किया जाना उनकी राज्य सरकारों का कार्य है। राज्य प्राप्ति पर राजकाज की भाषा गढ़वाली कुमाऊँनी होने और उसके विकास के लिए एक अद्द लोकभाषा साहित्य संस्थान की मांग भी कई बार राज्य के बु(िजीवी उठा चुके है। लोकसाहित्य जगत मानता है कि प्रदेश में स्पष्ट लाकेभाषा नीति लागू की जानी चाहिए। गढ़वाल सांसद सतपाल महाराज द्वारा भारतीय संसद में गढ़वाली कुमाऊँनी भाषा को संवैधानिक मान्यता देने को लेकर उठाया गया प्रश्न भी महज पैरवी से आगे नहीं बढ़ पाया।
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अब पहाड़ के एक जननेता के रूप में सूबे के नए मुख्यमंत्री हरीश रावत से पहाड़ की उम्मीदों को फिर से पंख लगे है। हाल ही में पीपुल्स लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इण्डिया द्वारा किए गए सर्वे में पता चला है कि गढ़वाली-कुमाऊँनी ऐसी भाषा है जिनके सामने हिन्दी और अंग्रेजी का साहित्य भी फीेका पड़ जाता है। जैसे गढ़वाली में अलग-अलग गंध को बताने के लिए 50 से भी अधिक शब्द है। आवाज को करीब सौ शब्दों से व्यक्त किया जा सकता है, स्वाद के लिए 32 ‘ाब्द है, स्पर्श के लिए 26 और विभिन्न संवेदनाओं के लिए 60 से भी अधिक शब्द है। गढ़वाली की तरह कुमाऊँनी, जौनसारी, भोटिया, रंवाल्टी और अन्य उपबोलियों में भी ऐसे शब्दों की भरमार है। दसवी सदी से प्रचलित इस लोकभाषा ने विलुप्ति का दंश झेलने के साथ साथ भी जिस तेजी से विशाल साहित्य सृजन और नये नये शोधांे का जो कीर्तिमान स्थापित किया वह हर उत्तराखण्डी के लिए आज गर्व की बात है। वर्तमान में लोकभाषा के 63576 शब्दों को विभिन्न शब्दकोषों के जरिये प्रकाशित किया जा चुका है। 14000 से अधिक गढ़वाली मुहावरों का संकलन दुनिया में अब तक के सबसे अधिक मुहावरों का कीर्तिमान बना चुका है।
लोकभाषा के व्याकरण, इतिहास पर भी सैकड़ों पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है। साप्ताहिक, पाक्षिक अखबार, मासिक पत्र-पत्रिकाओं के साथ हजारों की संख्या में कविता, कहानी, नाटक, व्यंग्य, गज़ल संग्रह और शोध ग्रन्थों को प्रकाशित करने का सिलसिला लगातार जारी है। कविता पोस्टरों के जरिए भी लोकभाषा की समृ(ि एक नए दौर में प्रवेश कर चुकी है। उत्तराखण्डी लोकभाषाओं की इस अनूठी विशेषता को देखते हुए देश में भाषाओं पर कार्य करने वाली सर्वोच्च संस्था ‘साहित्य अकादमी नई दिल्ली’ द्वारा वर्ष 2010 में पौड़ी में गढ़वाली भाषा सम्मेलन का भव्य आयोजन किया गया। पौड़ी में आयोजित गढ़वाली भाषा सम्मेलन में साहित्य आकदमी के उपाध्यक्ष सुतिन्दर सिंह नूर और सचिव अग्रहर कृष्ण मूर्ति ने अपनेे अध्यक्षीय व्याख्यान समेत स्वागत अभिभाषण के दौरान गढ़वाली भाषा को मान्यता दिये जाने का आवश्यक बताते हुए समर्थन दिया है। सांस्कृतिक नगरी पौड़ी में ही लोकभाषा को संविधान की आठवी अनुसूची में मान्यता दिलाने की मांग को लेकर ‘लोकभाषा आन्दोलन’ की नींव रखी गई।

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राज्य के प्रत्येक जिले में इसकी समितियाँ बनाई गई है। जिसमें विभिन्न कार्यक्रमों, काव्यपाठ और चर्चाओं के माध्यम से लोकभाषा आन्दोलन की धै आम जनता तक पहुंचाई जा रही है।ईन्टरनेट की सोसल नेटवर्किग साईटों पर भी हिन्दी, अंग्रेजी और दुनिया की अन्य भाषाओं के सापेक्ष गढ़वाली-कुमाऊँनी में तेजी से लोकसाहित्य का प्रचार प्रसार हो रहा है।

ई पाठशालाओं में लग रही हर दिन गढ़वालि-कुमाऊनी की कक्षाऐं

अपनी भाषा बोली के प्रति उत्तराखण्डी जनमानस का जोश व उत्साह इन दिनांे चरम सीमा पर हैै देश के कोने-कोने में रह रहे राज्य के उत्साही युवाओं ने इसका जिम्मा लिया है। फेसबुक पर हर दिन ई पाठशाला में ई गुरजी सिखा रहे अपने ई विद्यार्थीयों को लोकभाषा के गुर। ई दुनिया की बेहद लोकप्रिय सोसल नेटवर्किग साईट फेसबुक पर ई-पाठशाला, ई-गुरूजी और ई-विद्यार्थीयों की तिकड़ी गढ़वालि-कुमाऊंनी सीखने, बूझने और समझने वालो के लिए नयी क्रांति की शुरूवात बनती जा रही है। फेसबुक पर मी उत्तराखण्डी छौं, अपणी भाषा अपणी पच्छाण और गढ़वालि सीखा, कुमाऊनी भाषा बोली, गढ़वालि एण्ड कुमाऊंनी लैग्वेजेज इनकुलुसन इन इंण्डियन कान्सीटूयूशन, हैलो दगडि़यों फॅार उत्तराखण्डी भाषा, मीठी तेरी बोली, गढ़वालि भाषा हमारि दुदबोली, गढ़वालि-कुमाऊनी भा”ाा क्रांति जैसे अनगिनत ई-पाठशालाए है। जिनके एक क्लिक पर आप गढ़वालि-कुमाऊंनी भाषा के सृजन, इतिहास, व्याकरण पर दुर्लभ और शोधपूर्ण सामग्री पलभर में पा सकते है। इन ई ग्रपों के अपने-अपने अनुभवी टयूटर भी है।

और विदेशियांे ने लगाया गले
उत्तराखण्ड के एक अधिसंख्य समाज ने भले ही गढ़वाली-कुमाँऊनी को गैर मानकर बिसरा दिया हो लेकिन विदेशियों ने इसे सिरमाथ लिया है। यूनीवर्सटी ऑफ हेडलबर्ग जर्मनी समेत दुनिया के कई हिस्सों में गढ़वाली कुमाऊँनी भाषा, संस्कृति पर अध्ययन किया जा रहा है। हेडलबर्ग यूनीवर्सटी के इन्डोलॉजी विभाग के भाषा विज्ञानी डा0 राम प्रसाद भट्ट गढ़वाली भाषा पर कार्य कर रहे है। जिससे उनके कई विदेशी विद्यार्थी ठेठ अदांज में भी गढ़वाली बालने लगे है। सेंटर फॉर परफार्मिग आटर््स एंड कल्चर, गढ़वाल विवि के शोधार्थी स्टीफन समेत अनेक विदेशियों की गढ़वाली कई मायनों में गढ़वाली भाषा के लिए एक अच्छा संकेत हैै।
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संसद में गूंजी भी गढ़वाली कुमाँऊनी की आवाज
गढ़वाल संासद सतपाल महाराज भी संसद में गढ़वाली कुमाऊँनी की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और समृ( परम्परा का हवाला देते हुए इन्हें संविधान की आंठवी अनसूची में शामिल करने की मांग उठा चुके है। लोकसभा में शून्यकाल के दौरान सतपाल महाराज ने कहा कि 13 वी-14 वीं सदी से पहले सहारनपुर व हिमाचल तक फैले गढ़वाली साम्राज्य का राजकाज गढ़वाली भाषा में ही होता था।

इतिहास के पन्नों में राजभाषा गढ़वाली-कुमाऊँनी
गढ़ सामंतो के काल से लेकर पंवार वंशी राजाओं के शासन काल में भी गढ़वाली जनभाषा, राजपरिवार तथा राजकाज की भाषा रही है। कुमाऊँनी एवं गढ़वाली मिश्रित जनभाषा में इन दो राज्यों के बीच विचारों का आदान-प्रदान तथा पत्राचार होता रहा है। 14 वीं-15 वीं शताब्दी तक भी गढ़वाल व कुमाऊँ राज्यों के बीच मौखिक व लिखित संवाद गढ़वाली-कुमाऊँनी भाषा और देवनागरी लिपि में होता रहा है। इसी काल खण्ड में गढ़वाली में गद्य साहित्य की रचना शुरू हो चुकी थी।गढ़वाली साहित्य का दुर्भाग्य यह भी रहा कि उत्तराखण्ड गढ़वाल में 9 वीं-10 वीं तथा 14 वीं-15 वीं शताब्दी में आये भूकम्प के कारण जो तबाही मची, उसमें अधिकांश साहित्य, अभिलेख तथा राजकाज के दस्तावेज धरती के गर्भ में समा गये। सन् 1744 में उत्तराखण्ड कुमाऊँ पर रोहिलों के आक्रमण ने तो यहां के मठ-मन्दिरों, मूर्तियों को ध्वस्त कर साहित्य एवं कला को नष्ट करने में कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखी। विक्रमी सम्वत् 1860 ई0सं0 1803 में आये भयानक भूकम्प ने तो गांव के गांव उजाड़ दिये।

जो कुछ बचा-खुचा था, उसकी कसर 1804-1816 के काल में गोरखों के अत्याचारी शासन ने निकाल दी। उत्तराखण्ड में हाय-त्राहि मच गयी। इस पर भी गढ़वाली रचनाओं तथा राजकीय अभिलेखों के जो कुछ बिखरे पन्ने मिले हैं, उनको कम नहीं समझना चाहिए। चित्रकार मौलाराम 1744-1833 ई0 कृत काव्य साधना भी गढ़वाली भाषा और देवनागरी लिपि के बढ़ते सोपानों को आगे बढ़ाने में विशेष सहयोगी रही है। उनके द्वारा रचित गढ़गीता-संग्राम, गढ़राज वंश, मन्मथ सागर आदि उल्लेखनीय हैं। ब्रिटिश शासन में भी ‘‘गढ़वाली भाषा’’ को मान्यता प्राप्त रही है। द्वितीय महायु( 1939-1945 ई0 के कारणों तथा घटनाओं पर प्रकाश डालने के लिए ‘‘यूरोप को यु( नामक पुस्तक प्रकाशित हुई जिसकी भाषा गढ़वाली है। ‘गढ़वाली साहित्य परम्परा’ नामक लेख में अबोधबन्धु बहुगुणा ने कई गढ़वाली साहित्यकारों के नामों का उल्लेख किया है जो इस प्रकार हैं-

सन् 1743 ई0 में महाराजा प्रदीप शाह के राज ज्योतिषि जयदेव बहुगुणा की रचना ‘रंच जूड्या पंच जूड्या’ ‘जूडि़ग्या घिमसांण जी’ ;पखाणाद्ध 1828 में महाराजा सुदर्शन शाह की ‘सभा सार’, 1830 में अमेरिकन मिशनरी द्वारा न्यू टेस्टामेन्ट का गढ़वाली अनुवाद’, 1875 में जयकृष्ण दौर्गादत्वि का ‘वेदान्त सन्देश’ 1900 में गोविन्द प्रसाद घिल्डियाल द्वारा प्रकाशित ‘राजनीति, 1913 में सदानन्द कुकरेती की विशाल कीर्ति में प्रकाशित पहली गढ़वाली कहानी ‘गणेशु कौंका भितर स्वांला-पकोैड़ा’ एवं लीला प्रेम सागर। इसके अलावा बहुगुणा ले अपने उक्त सन्दर्भित लेख में सत्यशरण रतूड़ी का उठा गढ़वाल्यो अब समय यो स्येण कू नी छ’, आत्माराम गैरोला का ‘चला ग्वेरो गोरू चरौला भ्यूं कि रौ, वखि माछा मार्ला ढुंगळि भी पकौला’, तारादत्त गैरोला का लोकप्रिय काव्य ‘सदेई’, भवानीदत्त थपल्याल का ‘प्रहलाद नाटक’ चन्द्रमोहन रतूड़ी का दिव्य भाव से परिपूर्ण ‘फ्यंूली’, लीलानंद कोटनाला की कविता ‘लाट रिपन’, ;काले-गोरे का भेद मिटाने के स्वरद्ध, भजन सिंह ‘ंिसंह’ का ‘सिंहनाद’, शिवनारायण सिंह बिष्ट का ‘मोछंग’ आदि प्रभृति साहित्यकारों का उल्लेख किया है।

दरअसल देखा जाय तो यह काल गढ़वाली साहित्य के युग का वह प्रबु( प्रवाह था जिसकी शंखध्वनि ने यहां के साहित्यकारों को सुप्त निद्रा से जगाया है। साहित्य व साहित्यकरों की इतनी लम्बी सूची है कि उनकी कृतियों को इस छोटे से लेख में समाना सम्भव नहीं है। गढ़वाली में लिखित साहित्य की विपुलता है। आज आवश्यकता है तो जातीय चेतना जगाने की है। गढ़वाली आज जो अस्मिता की लड़ाई लड़ रहे हैं, वह भाषा की ही लड़ाई नहीं है अपितु सांस्कृतिक, सामाजिक, पारम्परिक, आर्थिक एवं राजनीतिक संसाधनों की लड़ाई भी है। उल्लेखनीय है कि गढ़वाली अन्य सभी भाषाओं की सहयोगी रही है। इसने कभी किसी भाषा का विरोध नहीं किया।

लेखक -लोकभाषा आन्दोलन समिति, जनपद रूद्रप्रयाग के सक्रिय सदस्य है

गढ़वालि भाषामा लिखित साहित्य को भंडार तैं छैं ही छ पर अलिखित साहित्य यानि कि लोक साहित्य को इतगा बड़ो भण्डार सैदी कै हैंकि भाषामा हो। यो हम्हरो दुरभाग छ कि उत्तराखण्ड बण्यां तेरह साल होणा बाद बि अबि तक इख इनो क्वी माई को लाल पैदा नि “वे जो अपणि यीं दुधभाषा कि खोज-खबर लेकि यांका विकास का बारामा कुछ सुचदो, कुछ करदो। हम्हरा संविधान का अनुच्छेद 350 ;कद्ध मा या बात लिखीं छ कि राज्य सरकार प्राथमिक स्तर पर मातृभाषामा शिक्षा देणै सुविधा उपलब्ध कराली पर शिक्षा उपलब्ध करौणै बात त दूर अब तक अपणि लोकभाषौं का बारामा हम्हरि सरकारन् एक शब्द बि नि बोलि।
विमल नेगी, संपादक उत्तराखण्ड खबरसार,पौड़ी

14 सालों से लोकभाषा में निकलने वाला एक अखबार
ई दुनिया मा हमरि भाषाओं पर भौत कार्य होणू च, दुनिया का कोणा-कोणा मा बसाया प्रवासी उत्तराखण्डी हर दिन लोकभाषाओं का प्रचार प्रसार मा बेब साईट, ब्लाग अर ई-पेजों मा अपणि भाषा का परति कार्य कन्ना छन। औण वाला वक्त मा ईन्टरनेट पर ही गढ़वालि-कुमाऊंनी कू अधिकांश साहित्य उपलब्ध वे जालू, जैसे यूं भाषाओं का प्रचार प्रसार और अधिक बड़ी चढ़ी तैं कार्य होलू।
ई ब्लागर जगमोहन सिंह जायड़ा, दिल्ली।

डेढ लाख से अधिक ई-व्यूअर्स के साथ गढ़वालि-कुमाऊनी पोस्टो के लिए विख्यात ई लेखक भीष्म कुकरेती लोकभाषा के प्रचार प्रसार में ई लर्निग को कारगार जरिया मानते है। उनका मानना है कि पुस्तकों की अपेक्षा ईन्टरनेट पर पाठक और प्रतिक्रियायों का प्रतिशत कहीं जादा है। उनके पोस्ट व्यूअर्स में मीडिल ईस्ट, तंजानिया, अस्ट्रेलिया तक के कई विदेशी भी शामिल है।
ई-लेखक भीष्म कुकरेती, मुबंई

आजकल इन्टरनेट को जमानू च, छोटा छाटा नौन्याल बि माबाईल पर ईन्अरनेट को इस्तेमाल कना छा, ईन्टरनेट पर राज्य की लोकभाषाओं अर कला संस्कृति से जुड़ी बात तौते आकर्षित त कन्नी च। अब सी गर्व से बोल्दा छा ‘‘मीं उत्तराखण्डी छौ’’
विनोद जेठुड़ी, दुबई यू ए ई

लोक भाषा का प्रति या भौत बडि़या पहल च, ई पाठशाला लोकभाषा का प्रति कारगार भूमिका निभोणी च। हमते आधुनिक दुनिया का दगड़ी कदम मिलेकि अपणी भाषा, कला संस्कृति का परति बि यन काम कन्ने जर्वत च
गणेश खुगसाल ‘गणी’,
लोकभाषा साहित्यकार

गढ़वाली और कुमाऊनी भारत में संख्या की दृष्टि से 16 वें व 17 स्थान पर बोले जाने वाली एक समृ( भाषा है, इसलिए इसे आठवी सूची में शामिल किया जाने के लिए प्रयास आवश्यक है। सरकार भी यह जिम्मेदारी बनती है कि वह इसके विकास के लिए आगे आये।

कपिल कपूर
प्रधान संपादक
इनसाइक्लोपीडिया ऑफ इंडिन पोएटिक्स

हमें गढ़वाली होने और बोलने पर गर्व होना चाहिए, यही हमारी संस्कृति है। और इस महान संस्कृति को बचाने के लिए माता पिता अपने बच्चों को गढ़वाली जरुर सिखाये। सरकार भी गढ़वाली और कुमाऊँनी को अनिवार्य रुप से पाठ्यक्रम में शामिल करें।

डा0डी आर पुरोहित, निदेशक लोक कला संस्कृति निष्पादन केन्द्र, गढ़वाल विवि0 श्रीनगर

हमारी उदासीनता के ही कारण विश्व की इनोर्डजर्ड लैग्वेज सूची में गढ़वाली आज शामिल हो गई है, इसे बचाने के लिए एकजुट होकर प्यार, भावुकता और अपनत्व के साथ इसे अपनाने और नयी पीढ़ी को हस्तातंरित करने की आवश्यकता है।

डा0 राम प्रसाद भट्ट, भाषा विज्ञानी, यूनीवर्सटी ऑफ हेडलबर्ग जर्मनी
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अपणि भाषा अपणि पच्छाण
अपणि बोली अपणि भाषा
होन्दी अपणि पछ्याण
अपणि ब्वै त अपणि होन्दी
बिराणी ब्वै मौस्याण।।
बिंगै जन्दि अपणि बोली
मन का सारा बिचार
देववाणी जन मीठी
जिया ब्वै की अन्वार।।
आत्मा से नातु यींकु
जनि जिकुडि़ ज्यू ज्यान
स्वाभिमान ज्यूँदु रखदि
कनि प्यारी रसाण।।
घुर घुर घुघति नि छोड़दि
मया वाणी भेष।
औणु जाणु मुल्कु मुल्कु
देशु जान्दी प्रदेश।।
भौंरा पुतफा-चखुला
बोली अपणी छोड़दा नी।
दूर-दूर जख भी जांदा
वाणी अपणी बच्यांद सी
कागा तैं ढुंग्योंदा सभी
काँव-काँव छोड़दा नी
शरादों मा भाषा प्रेमी
दूध-भात पौंदा सी।।
बणचरों से सीख लेवा
स्वाभिमान कन होन्द।
अपणि बोली जौन नि छोड़ी
मुल्क आज सी अगिन।।
विकास की दौड़ भयो
भाषा सभी सीखा तुम।
पर घौर ऐक मेरा भयो
वक-बक ना बोला तुम।।
भला सिम, भला रिवाज
पफूल भला चुनादूँ तुम।।
मां की बोली मां कु मंत्र
भयो! ना बिसरावा तुम।
चिठ्ठी-पत्री सेवा सौंफी
बोली मा लेखादूँ तुम।।
गढ़वाली कुमौयीं भाषा
छन हमारी ध्यिाण।
देवभूमि उत्तराखण्ड की
छन द्वी बैणी पछ्याण।
रामेश्वरी नेगी ‘अध्यापिका’
राउमावि कण्डाली, रूद्रप्रयाग

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