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जमीनी नेता की हकीकत

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Indresh Maikhuri

जमीनी नेता कहे जाने वाले उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत,राज्य को किस जमीन पर पटकना चाहते हैं,यह समझना भारी पड़ रहा है.
हरीश रावत ने मुख्य सचिव के विरोध के बावजूद सुमेर सिंह यादव को सेवानिवृत्ति के बाद उत्तराखंड ऊर्जा निगम के महानिदेशक पद पर दूसरी बार सेवा विस्तार दिया.अब उन यादव साहब पर विद्युत् नियामक आयोग ने पचास हज़ार रूपये जुर्माना ठोक दिया है.वहीँ राज्य में केवल ज्वाइन करके छुट्टी चले जाने वाले आई.ए.एस. आर.के.सिंह के लिए मुख्य सचिव की कुर्सी का रास्ता भी वे खोलने जा रहे हैं.
सबसे गजब तो कैलाश खेर प्रकरण में कर डाला,रावत साहब की सरकार ने.आज केदारनाथ में हुए कैलाश खेर के कार्यक्रम के बाद सोशल मीडिया में तैर रहा एक आर.टी.आई.उत्तर यदि वास्तविक है तो वह फिजूलखर्ची का चरम नमूना है.उक्त आर.टी.आई.के अनुसार कैलाश खेर को केदारनाथ पर डाक्यूमेंट्री/सीरियल/विज्ञापन तीन करोड़ छियासठ लाख चौहत्तर हज़ार तीन सौ चार रूपया भुगतान कर चुकी है.खबरें तो यहाँ तक आ रही हैं कि केदारनाथ में हुए खेर के कार्यक्रम के लिए उन्हें दस करोड़ रूपया भुगतान किया गया.इसमें उपरोक्त पौने चार लाख शामिल है या फिर यह अलग से दस करोड़ है,यह अभी स्पष्ट नहीं हो पाया है.पर यह साफ़ ही है कि आपदा कैलाश खेर के लिए फायदा का सौदा सिद्ध हो रही है.लेकिन उसी केदार घाटी में लोगों के आपदा के जख्म तीन साल बाद भी भरे नहीं हैं.एक भी व्यक्ति का पुनर्वास नहीं हुआ है,न कहीं पुनर्वास के लिए एक इंच जमीन चिन्हित की गयी है.तीन साल बाद भी आपदा में बहा एक भी पुल सरकार नहीं बना सकी है.आये दिन ट्रॉलियों में लोगों के हाथ पिसने,बच्चों के गिर कर मरने तक की खबरें आम हैं.ऐसे में इस उत्सवी माहौल और शाह खर्ची का क्या मतलब है?इसका सीधा अर्थ यह है कि हरीश रावत सरकार की रूचि पर्यटकों में है,लेकिन स्थानीय जनता की दुःख-तकलीफों से उसका कोई सरोकार नहीं है.सरकार को सरोकार होता तो वह आपदा पीड़ितों के घावों पर मरहम लगाने के प्रति संजीदा होती,विज्ञापन के जरिये अपनी छवि चमकाने पर सार्वजानिक धन को किसी बिगडैल रईस की तरह नहीं बहा रही होती.
यह जरुर देखना है कि चुनाव से पूर्व के कुछ महीनों में हरीश रावत सार्वजानिक धन की और कितनी बंदरबांट कर पाते हैं.लगता है कि इसी काम में वे अपने पूर्ववर्तियों से इक्कीस साबित होना चाहते हैं क्यूंकि इस मामले में उन्नीस तो उनके पूर्ववर्ती भी नहीं रहे हैं.

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