जंग के मैदान में आतंकवादी संगठन इस्लामिक स्टेट से लड़ रही हैं कुर्दिश महिलाएं

बेरुत। आतंकवादी संगठन इस्लामिक स्टेट (आईएस) के खिलाफ इराक और सीरिया में सैन्य अभियान जोरों पर है। जंग का मैदान पुरुषों से भरा हुआ है। मोर्चे पर दोनों ओर पुरुषों की बड़ी तादाद नजर आ रही है। पुरुषों से भरी इस तस्वीर में अच्छी-खासी तादाद महिला सिपाहियों की भी है। सीरिया में सक्रिय कुर्दिश विमिंज़ प्रॉटेक्शन यूनिट्स (वाईपीजे) महिला लड़ाकों की ऐसी सैन्य टुकड़ी है, जो कि युद्ध के मैदान में पूरी ताकत से मोर्चे पर तैनात है और आईएस से लड़ रही है। इस लड़ाई में अरब मूल की और महिलाओं को शामिल करने की कोशिशें तेज हो गई हैं। ऐसी महिलाओं की तलाश हो रही जो कि आईएस के खिलाफ चल रही जंग से जुडऩा चाहती हैं। कट्टरपंथी अरब में आतंकवादियों के खिलाफ मोर्चा संभाल रही वाईपीजे की ये महिलाएं ना केवल महिलाओं की आजादी और उनके सशक्तिकरण की पहचान बन रही हैं, बल्कि सामाजिक बदलाव की जड़ों को भी मजबूत कर रही हैं।
इस जंग में महिलाओं की सक्रियता और उनकी भूमिका बढ़ाने की कोशिश कर रही वाईपीजे रक्का में अपनी सैन्य कार्रवाई को और तेज करने की भी तैयारी कर रही है। मालूम हो कि रक्का आईएस का मजबूत गढ़ है। वाईपीजे की प्रवक्ता नेसरीन अब्दुल्ला ने बताया, वाईपीजे की महिलाएं होने के तौर पर हम ना केवल आईएस से आजादी चाहते हैं, बल्कि कट्टरपंथी मानसिकता और विचारों से भी मुक्ति चाहते हैं। मालूम हो कि कुर्दिश एक एथनिक समूह है और यह मध्यपूर्व के कुछ इलाकों में रहते हैं। इनकी भाषा और संस्कृति अरबों से अलग है। इनका मुख्य क्षेत्र पूर्वी और दक्षिण-पश्चिमी तुर्की, पश्चिमी ईरान, उत्तरी इराक और उत्तरी सीरिया है।
एक कुर्दिश न्यूज एजेंसी को दिए गए इंटरव्यू में नेसरीन ने कहा, जंग केवल जमीन को आजाद कराने के लिए नहीं है। हम औरतों और मर्दों को आईएस के चंगुल से बचाकर उन्हें आजाद कराने के लिए भी लड़ रही हैं। अगर हम ऐसा नहीं करेंगी, तो पितृसत्तात्मक व्यवस्था एक बार फिर हावी हो जाएगी। अमेरिका के समर्थन वाले सीरियन डेमोक्रैटिक फोर्सेस (एसडीएफ) ने रक्का से आईएस का खात्मा करने के लिए नवंबर में ऑपरेशन शुरू किया था। एसडीएफ में ज्यादातर लड़ाके कुर्दिश हैं। एक तरफ जहां इराक के मोसुल में आईएस के खिलाफ सैन्य कार्रवाई चरम पर है, तो वहीं सीरिया के रक्का में भी उनपर हमला तेज कर दिया गया है। दोनों जगहों पर आईएस के खिलाफ सैन्य कार्रवाई जोरों पर है।
नेसरीन ने कहा कि साल 2016 में आईएस के खिलाफ चल रही मुहिम के साथ बड़ी संख्या में महिलाएं जुड़ीं। सीरिया और इराक दोनों जगहों पर कई नए सैन्य संगठनों का गठन किया गया। इन संगठनों का मकसद अरब और याजिदी मूल की महिलाओं को आईएस के खिलाफ चल रही मुहिम में शामिल करना है। वाईपीजे की महिला लड़ाकों को देखकर बड़ी संख्या में महिलाएं प्रेरित हुईं और इस अभियान के साथ जुड़ीं। नेसरीन बताती हैं, ऐसा इसलिए कि वाईपीजे क्रूरता और बर्बरता से लडऩे वाली महिलाओं का संगठन नहीं है। यह सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक चेतना जगाने की कोशिश कर रही है। जो महिलाएं इस काम में अपनी जिम्मेदारी समझती हैं, वे इस संघर्ष में हमारे साथ जुड़ती हैं। वाईपीजे ने अल-बाब शहर से आईएस को बाहर खदेडऩे के लिए महिलाओं की एक बटैलियन तैयार की है।
नेसरीन ने बताया कि महिलाओं को युद्ध का प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है। 2017 में खासतौर पर महिलाओं के लिए एक सैन्य प्रशिक्षण अकादमी और कॉलेज जैसा शैक्षणिक संस्थान शुरू किए जाने की योजना है। नेसरीन ने इंटरव्यू में बताया, सीरिया और इराक में जिन इलाकों को आईएस के कब्जे से बाहर निकाला गया, वहां रहने वाली ज्यादातर आबादी अरबी मूल के लोगों की है। जब उन्होंने देखा कि महिलाएं सैन्य अभियान में सक्रिय भागीदारी कर रही हैं और सैन्य कार्रवाई में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रही हैं, तो लोग बहुत प्रभावित हुए। इसका बहुत गहरा असर हुआ। कई शहरों की महिलाएं अब हमारे साथ जुड़ गई हैं। वे सैन्य प्रशिक्षण हासिल कर पूरी तरह से तैयार हैं और जंग के मैदान में मोर्चा संभाल रही हैं।
वाईपीजे को ना केवल युद्ध के मैदान में सफलता मिल रही है, बल्कि सामाजिक तौर पर वह महिलाओं में आत्मविश्वास भरने में भी कामयाब हो रहा है। महिलाएं बिना पुरुषों पर निर्भर रहे अपने फैसले खुद लेने के लिए प्रेरित हो रही हैं। इस लिहाज से देखा जाए, तो अरब की महिलाओं में सामाजिक चेतना फैलाने और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने में भी वाईपीजे का बहुत बड़ा योगदान है। युद्ध और हिंसा से जूझ रहे अरब में वाईपीजे की महिला सैनिकों ने यकीनन एक नया भरोसा जगाया है।