udaydinmaan, News Jagran, Danik Uttarakhand, Khabar Aaj Tak,Hindi News, Online hindi news शहर मे लाखों का पैकेज छोड़ गांव की माटी में उगा रही है सोना

केदार घाटी की बेटी

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शहर मे लाखों का पैकेज छोड़ गांव की माटी में उगा रही है सोना
संजय चौहान
वास्तव में यदि देखा जाय तो वर्तमान में जिस तरह से बेटियां पहाड़ का नाम रोशन कर रही है और शहर की चकाचौंध दुनिया को अलविदा कह कर गांवो की और लौट रही है और रोजगार के नए अवसर उपलब्ध करा रहे हैं वो भविष्य के लिए शुभ संकेत है, रंजना रावत ने अपने चमकदार कैरियर को छोड़ पुरखों की माटी में पलायन को रोकने और रोजगार सृजन की जो मुहीम चलाई है वो सुखद है, इस लेख के जरिये रंजना को उनके बुलंद होंसले और जिजिवाषा को एक छोटी सी भेंट

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जी हाँ जिन हाथों ने बीमार ब्यक्तियों के लिए गोली, इंजेक्सन, आँखों की दवाई, ट्यूब से लेकर जीवन रक्षक दवाई बनानी थी वही हाथ अपनी पुरखों की माटी की मिटटी में सोना उगा रही है, २४ सालों तक जिन हाथों ने केवल पेन, पेन्सिल, रबर और मोबाइल को ही चलाया हो और उसके बाद पहली बार दारंती, कुदाल, बेलचा, गैंती, गोबर, से लेकर मिटटी से साक्षत्कार हुआ हो तो जरुर उसमे कोई न कोई ख़ास बात जरुर होगी, नहीं तो यों ही कोई पढाई लिखाई शहरों में करने के बाद रोजगार के लिए अपने गांव का रुख नहीं करते —

 

केदार घाटी की बेटी रंजना रावत से आपको रूबरू करवाते हैं – हिमवंत कवि चन्द्रकुंवर बर्त्वाल की कर्मस्थली और महात्म्य अगस्त ऋषि की तपोभूमि में मन्दाकिनी नदी के बांयी और बसा है भीरी चंद्रापुरी का सुंदर क्षेत्र, इस पूरे इलाके में दर्जनों ग्रामसभाएं है जिनका केंद्र बिंदु भीरी है, इसी भीरी गांव के अनीता रावत और दरबान सिंह रावत जी जो वर्तमान में जिलाधिकारी कार्यालय रुद्रप्रयाग में बतौर प्रसाशनिक अधिकारी के पद पर कार्यरत है के घर ३ मार्च १९९२ को एक बिटिया का जन्म हुआ, माता-पिता ने बड़े प्यार से अपनी इस लाडली का नाम रंजना रखा, माता-पिता को उम्मीद ही नहीं बल्कि पूर्ण विश्वास था की उनके बेटी जरुर उनका नाम रोशन करेगी, रंजना बचपन से ही मेधावी और होनहार थी, रंजना की प्राथमिक से लेकर १२ वीं तक कि शिक्षा अलकनंदा और मन्दाकिनी के संगम में बसे और महान योगी श्री १०८ स्वामी सच्चिदानंद की पावन भूमि रुद्रप्रयाग में हुई, जिसके बाद हेमवंती नंदन गढ़वाल विश्वविद्यालय से फार्मेसी में स्नातक की डिग्री प्राप्त की, बचपन से ही बहुमखी प्रतिभा की धनी रंजना ने स्कूली शिक्षा से लेकर तकनीकी शिक्षा में अपनी सृजनात्मक गतिविधियों से अपनी अलग ही पहचान बनाई थी, शिक्षा ग्रहण करते समय इन्होने पोस्टर कैम्पैनिग से लेकर रंगोली में हर जगह अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया, फार्मेसी में स्नातक के बाद रंजना को बहुरास्ट्रीय कम्पनी में क्वालिटी ऑफिसर के रूप में नौकरी मिल गई, इस दौरान रंजना को कई रास्ट्रीय स्तर के सेमिनारों में प्रतिभाग करने का मौका भी मिला जिसमे उन्हें ग्रामीण इलाको की समस्याओं को जाना,

मन ही मन रंजना लोगो के लिए कुछ करना चाहती थी, लेकिन वो अंतर्द्वंद में कैद हो कर रह गई थी, मन करता की लोगों के लिए कुछ करूँ और घर वाले और दोस्त नौकरी से खुश थे, इसी दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रेडियो कार्यक्रम ‘’ मन की बात’’ में एक महिला द्वारा पूछे गए प्रश्न – की –क्या आपको पता था की आप एक दिन देश के प्रधानमन्त्री बनोगे, तो मोदी जी का जबाब था की नहीं लेकिन अगर आपको जीवन में कुछ बनाना है तो उसके सपने जरुर देखो और उस सपने को पूरा करने के लिए हर मुमकिन कोशिस करो,– इस एक बात ने रंजना के मन की बात सुन ली और रंजना ने अपनी अच्छी खासी नौकरी को अलविदा कह कुछ करने की ठानी, वैसे नौकरी में रहते हुये भी रंजना समाज के लिए कार्य करती रहती थी,

इसी दौरान कुछ दोस्त और सहयोगियों के साथ मिलकर इन्होने आरोही फाउंडेशन की नीव रखी थी, जिसका उद्देश्य ग्रामीण इलाको के लोगो को रोजगार, पलायन, कृषि, बागवानी, स्वास्थ्य सुविधाएं, सहित कई जनपयोगी कार्यों को दूर गांव के अंतिम ब्यक्ति तक पहुँचाना था, शुरुआत में इन्होने कई गांवो में मेडिकल कैम्प लगवाये और लोगो की मदद की— नौकरी छोड़ने के बाद जैसे ही इसके बारे में माता- पिता को बताया और अपने भविष्य के कार्यक्रम के बारे में अवगत करवाया तो माता- पिता सकते में आ गए, उन्हें लगा अपनी बेटी पर उन्होंने इतने पैसे खर्च किये अब वो लोगो को क्या कहेंगे, लेकिन रंजना की जिद के आगे आख़िरकार माता- पिता ने अपनी बेटी को हरी झंडी दे दी, परिवार की हामी से रंजना को जैसे सपना सच होने जैसे था, इसी बीच रंजना ने दिल्ली से मशरूम उत्त्पादन से लेकर बागवानी, कृषि और फल संरक्षण का प्रशिक्षण भी लिए और बारीकियां भी सीखी, नई उम्मीद, नए सपने और होंसलो को लिए रंजना ने जनवरी २०१६ में चमकते भविष्य को छोड़कर अपने गांव की माटी की और रुख किया,

और अपने गांव भीरी में आरोह फाउन्डेशन के जरिये अपना खुद का काम शुरू किया, शुरु शुरू में जरुर परेशानीयों से रूबरू होना पड़ा, लेकिन जिद और धुन की पक्की रंजना ने हार नहीं मानी, इस दौरान रंजना ने गांव गांव का भ्रमण कर लोगो को जागरूक और प्रेरित करने का कार्य किया, जिसकी परणीती यह हुई की महज ६ महीनो में ही रंजना ने भीरी के आस पास के ३५ गांवो के ५०० ग्रामीणों को प्रशिक्षत करके उन्हें स्वरोजगार का मंत्र दिया है, आज ३५ गांवो के लोग, मशरूम उत्पादन, कृषि, फल संरक्षण, फूल उत्पादन, साग-सब्जी उत्पादन के जरिये अच्छी खासी आमदानी कर रहें है, उनके कार्यों को कई मंचो पर सम्मान भी मिला साथ ही मुंबई कौथिग में भी रंजना को प्रतिभाग करने का मौका मिला, बकौल रंजना कहती है की अब जाकर उन्हें लगता है की वो अपने कार्य में सफल हो पाई है, कहती है की ये तो महज एक शुरुआत भर है अभी तो बहुत ऊँची उड़ान भरनी है, रंजना से हुई लम्बी गुफ्तगू में रंजना कहती है की आज भी हमारे समाज में लडकियों की जिन्दगी महज पढाई और शादी तक ही सिमित होकर रह गई है,

आज भी बेटियों को सपने बुनने की आजादी नहीं है, लेकिन में बहुत खुसनसीब हूँ की मेरे माता- पिताजी ने मेरे सपनो को हकीकत में बदलने के लिए मेरा साथ दिया और मेरा होंसला बढाया शुरू शुरू में उन्हें आशंका थी लेकिन आज वे मेरी सफलता से बेहद खुश हैं, आगे कहती है की हमारे पहाड़ की महिलाओं का जीवन बेहद कठिन है, जितना मेहनत वे करते हैं उसका महज ५ फीसीदी ही उनके हिस्से आता है, यदि हम अपनी परम्परागत तकनीक में बदलाव लाकर नई तकनीक को अपनाए तो जरुर सफलता मिलेगी, जरुरत है तो सिर्फ और सिर्फ अपने हाथों पर विश्वास करने की, कुछ देर रुकने के बाद कहती है की मैंने भी तो अपने जीवन में कभी कुदाल, बेलचा, गैंती, सब्बल, कुल्हाड़ी, बांसुलू नहीं पकड़ा था और न ही इनके बारे में जाना था, लेकिन मन में लोगों के लिए कुछ करने का जूनून था, इसलिए पहले खुद से शुरुआत की और धीरे धीरे ये कारवां आगे बढ़ रहा है, आज मुझे काम करते हुये जो पहली मर्तबा देखेंगे तो उन्हें विश्वास ही नहीं होगा की मैंने २४ साल बाद कुदाल से लेकर कुल्हाड़ी पकड़ी है, लेकिन मेरा ब्यक्तिगत अनुभव कहता है की जीवन का आनंद जो अपने माटी की महक और सौंधी खुशबु में है वो मेट्रो और मॉल और बर्गर-पिज्जा में नहीं, जीवन का उदेश्य पूछने पर कहती हैं की खाली होते गांवो में यदि रौनक आ जाये, बंजर मिट्टी में सोना उगले, हारे हुये लोगों को होंसला दे सकूँ, भटके हुये लोगो को रास्ता मिल सके, पलायन कर चुके लोग वापस अपने गांवो की और लौट आये, और मायुस हो चुके चेहरों पर यदि खुशियों की लकीरों को लौटा सके तो मुझे लगेगा की में अपने मंजिल को पाने में कामयाब हो पाई,

में चाहती हूँ की पहाड़ को लेकर जो भ्रांतियां लोगों के मन मस्तिष्क में घिर गई है की पहाड़ का पानी और जवानी पहाड़ के काम नहीं आती है बस उसे बदलने का समय आ चूका है की अब पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी पहाड़ को नए मुकाम पर ले जा सकता है, अभी तो बस कुछ कदमों का सफर ही तय किया है आगे मंजिल साफ़ दिखाई दे रही है, पीएम मोदी को अपना आदर्श मानने वाली रंजना कहती हैं की बदलाव महज सोचने और कहने भर से नहीं आता है इसके लिए चाहिए की असली धरातल पर कार्य हो रहा है की नहीं, मुझे ख़ुशी है की पहाड़ के लोगों ने अपने बेटियों के प्रति परम्परागत सोच को तिलांजली देकर उन्हें आगे बढ़ने का होंसला दे रहें है,

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