udaydinmaan, News Jagran, Danik Uttarakhand, Khabar Aaj Tak,Hindi News, Online hindi news उत्तराखंड: सरकारों के मुखिया से लेकर नौकरशाहों की दिल्ली दौढ़

उत्तराखंड: सरकारों के मुखिया से लेकर नौकरशाहों की दिल्ली दौढ़

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उत्तराखंड में  तो सदियों से आफत कब और किस रूप में आ जाए कुछ कहा नहीं जा सकता है। पहाड़ के लोगों के भाग्य में यह सदियों से लिखा हुआ है और वह अपनी मदद खुद करते आ रहे हैं वह भी सदियों से। आधुनिक भारत में पहाड़ के लोगों ने भी खुद को बदलने के लिए एक अलग राज्य की मांग की और इसके लिए पहाड़ जैसी परेशानियों से भी दो चार हुए और आखिरकार उनका सपना पूरा हुआ उत्तराखंड राज्य बना।

राज्य के लोगों का राज्य बनाने के पीछे का मकसद राज्य बनने के साथ पूरा होने की यहां के लोगों ने उम्मीद की, लेकिन उन्हें क्या पता था कि राज्य बनने के बाद राज्य का संबंध उत्तराखंड कि पहाडि़यों और पहाड़ के लोगों से होने के बजाय ‘दिल्ली दरबार’ से होगा। जैसे ही राज्य बना वैसे ही ‘दिल्ली दरबार’ की परिक्रम शुरू हो गई। राज्य की पहली थोपी हुई सरकार के दिल्ली आकाओं ने राज्य के सत्तासीन नेताओं और नौकरशाहों को दिल्ली दरबार में हाजिरी लगाने का क्रम शुरू किया तो यह आज भी जारी है। राज्य बनने के बाद पहले भाजपा फिर कांग्रेस और उसके बाद फिर से भाजपा और फिर कांग्रेस की सरकारें आयी और सभी सरकारों के मुखिया से लेकर नौकरशाहों की दिल्ली दौढ़ आज दिन तक जारी है।

दिल्ली दौढ़ के चक्कर में राज्य का विकास आज भी अधूरा है यह कहा जाए कि विकास की किरण आयी तो सिर्फ नेताओं के घर, यहां की जनता आज भी उसी हाल में है जिस हाल में राज्य बनने से पहले थे। जो परिवर्तन हुआ भी है वह यहां के लोगों ने अपनी मानसिकता के बलबूते किया या यह कहा जाए कि आधुनिकता की चकाचौंध में रमने के बाद आया तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। अभी तक की सरकारों ने तो सिर्फ दिल्ली दरबार की परिक्रमा पर अपना ध्यान केंद्रित रखा। उसके पीछे सबसे बड़ा कारण नेताओं को अपनी कुर्सी बचाए रखने और अपने आकाओं और अपनी जेबों को भरने में लगा रहा। जनता जाए भाड़ में। राज्य बनने से लेकर अभी तक की स्थिति संतोष बेंजवाल की यह विशेष टिप्पणी।

उत्तराखंड को खंड-खंड कर दिया
विगत 2013 जून माह में आयी आपदा ने पूरे उत्तराखंड को खंड-खंड कर दिया और यहां के लोग बेघर हो गए। न बचे खेत-खलियान, न छत और अपनों से भी हाथ धोना पड़ा। आज पहाड़वासियों की पथराई ऑखें हमारे प्रदेश के नेताओं की ओर हैं कि वह…। लेकिन, हमारे नेताओं को दिल तो इस हृदय विदारक दृष्य को देखने के बाद भी नहीं पसीजा और वह आपदा के नाम पर भी राजनीति करने में लग गए।
राज्य पर पड़ी है राजनेताओं की कुदृष्टि
देश का 27वां राज्य एक ऐसा राज्य है जिसकी देश ही नहीं विदेशों में भी अलग पहचान है। इसके पीछे कारण एक नहीं कई हैं और देश-विदेश के पर्यटकों, तीर्थयात्रियों और अनेक धर्मों के लोगों का इस भू-भाग के प्रति आस्था और लगाव सदियों से है। क्योंकि यहां गगनचुंभी पर्वत श्रृंखलाएं, जलधराओं से बनी गहरी घाटियां, सदाबहार वृक्षों से आच्छादित भू-भाग, मखमखी बुग्याल, शिवलिंग नुमा पत्थर, सीढ़ीनुमा खेत-खलियान और अपने अतिथि को अराध्य मानने वाले लोग पहाड़ का अपने आप में पूरा परिचय है। यहीं नही पंच बदरी, पंच केदार के साथ सि(पीठों और प्रयाग विश्व के लोगों के लिए आस्था और श्र(ा के साथ पर्यटन का भी प्रमुख केंद्र है।

उत्तराखंड राज्य निर्माण आन्दोलन  इतिहास
राज्य के लोगों ने इस भू-भाग को अलग प्रदेश बनाने की मांग की और उसके पीछे उनका जो उद्देश्य था वह आज दिन तक पूरा नहीं हो पाया क्योंकि राज्य पर राजनेताओं की कुदृष्टि जो पड़ गई है। यहां में अगर उत्तराखंड राज्य आंदोलन के दौरान की कुछ बात करू तो स्थिति स्पष्ट हो जाएगी।
उत्तराखंड राज्य निर्माण आन्दोलन के इतिहास में वैसे तो अनेकों ऐसे महत्वपूर्ण पड़ाव हैं जहॉ इस प्रदेश निर्माण को लेकर राज्य के लिए समर्पित आन्दोलनकारियों ने बड़ी-2 शहादतें दी थीं। शहादत के इन कुछ प्रमुख अध्यायों में रामपुर तिराहा कॉड जो कि गॉधी जयंती के 02 अक्टूबर 1994 को, मसूरी कॉड 02 सितम्बर 1994, खटीमा कॉड 01 अक्टूबर 1994 को घटित हुईं थीं प्रमुख हैं। खटीमा कॉड और मसूरी कॉड जहॉ इस विभत्सता के लिए जाने जाते हैं कि वहॉ पर उत्तराखंड राज्य की मॉग करने वाले आन्दोलनकारियों को गोलियों से भून दिया गया था वहीं पर दूसरी ओर रामपुर तिराहा कॉड में युवा आन्दोलनकारियों को न केवल गोलियों से छलनी किया गया था बल्कि महिला आन्दोलनकारियों की आबरु तक को तार-2 कर दिया गया था। इसी श्रेणी में एक विभत्स कॉड 10 नवम्बर 1995 को गढ़वाल श्रीनगर स्थित श्रीयन्त्र टापू में भी घटित हुआ था। इस घटना का सच क्या है यह उत्तराखंड सरकार भी नहीं जानती सरकार के पास इसकी कोई स्पष्ट जानकारी नहीं है। अब आप खुद ही इस बात से अंदाजा लगा सकते हैं कि राज्य में नेताओं की क्या चाल और कब चली जाती होगी।

जल विद्युत परियोजनाएं बनाकर खोखला कर दिया
उल्लेखनीय है कि राज्य बनाने के पीछे यहां के लोगों की मंशा बेरोजगारी, विकास के साथ सरकार की योजनाओं को धरातल पर लाना था, लेकिन आज दिन तक यह कुछ नहीं हुआ। राज्य तो बना पर राज्य बनाने के पीछे राज्य के लोगों की सोच के विपरीत। आज उत्तराखंड राज्य नेताओं की बपौती बन गया है। विकास के नाम पर राज्य को गिरवी रखा गया, पहाड़ के पानी को विदेश कंपनियों को बेच दिया और बेचा जा रहा है, पहाड़ की जवानी को नशे के दलदल में फंसा दिया, पहाड़ की जमीन को विदेशी कंपनियों को बेच दिया, गंगनचुंभी पर्वत श्रृंखलाओं को जल विद्युत परियोजनाएं बनाकर खोखला कर दिया, जो बचे थे वो यहां के तीर्थस्थल। उनमें भी आधुनिकता की चकाचौंध अपने फायदे के लिए पहुंचाकर राज्य को विनाश के गर्त में धकेल दिया और उसके परिणाम भी एक दशक के बाद प्राकृतिक आपदा के रूप में सामने आ गया।

विगत 2013 जून माह में आयी आपदा ने पूरे उत्तराखंड को खंड-खंड कर दिया और यहां के लोग बेघर हो गए। न बचे खेत-खलियान, न छत और अपनों से भी हाथ धोना पड़ा। आज पहाड़वासियों की पथराई ऑखें हमारे प्रदेश के नेताओं की ओर हैं कि वह…। लेकिन, हमारे नेताओं को दिल तो इस हृदय विदारक दृष्य को देखने के बाद भी नहीं पसीजा और वह आपदा के नाम पर भी राजनीति करने में लग गए। इस राजनीति के पीछे वही लोग हैं जो यहां लंबे समय से अपना और अपने परिवार का पेट राजनीति के भरोसे पालने के साथ अपने साथ कई ऐसे लोगों का भी पेट पाल रहे हैं जो राज्य का भला नहीं चाहते हैं और अपनी राजनैतिक रोटियां सेंकने में लगे हुए हैं।
अलग राज्य आज भी पहाड़ से लखनउ के सफर जैसा

राज्य गठन से पूर्व की बात करें तो यह भू-भाग यूपी का एक हिस्सा होता था। यूपी में भी समय-समय पर अलग-अलग सरकारें आयी और चली गई। इसके साथ ही उस समय के नेताओं के मन में इस भू-भाग के विकास के प्रति सोच थी। यही कारण था कि लखनऊ में एक अलग पर्वतीय संभाग था जहाँ से इस विशेष उत्तराखंड क्षेत्र के लिए नीतियाँ बनतीं थीं और इस भू-भाग के बारे में सदा चर्चा होती थी। उस समय शायद सत्रह के आसपास विधायक इस क्षेत्र में होते और उनमे से एक पर्वतीय विकास मंत्री बनता था। उस समय अगर कोई पहाड़ से लखनऊ जाता तो मंत्री से लेकर संत्री और विधायक भी क्षेत्र के लोगों का विशेष ध्यान रखते थे और उनकी समस्याओं को सूनने के साथ ही फाइल को खुद संबंधित विभाग में ले जाकर उसका निदान करवाते थे। यह कहा जाए कि जो भी उस समय लखनउ जाता था खाली हाथ नहीं आता था तो इस बात में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। आज जबकि उत्तराखंड राज्य अलग बने एक दशक से भी अधिक का समय हो गया, लेकिन यहां की जनता के लिए यह अलग राज्य आज भी पहाड़ से लखनउ के सफर जैसा है।

लखनउ की बात तो अलग ही थी, आज वो………..।

क्योंकि लखनऊ जाना अब भी नैनीताल की साईड ;कुमाऊँ रीजनद्ध से आसान है, देहरादून दूर है। इसके पीछे कारण यह है कि राज्य बनने के बाद कुछ विधायक आज भी ऐसे हैं जो मंत्री से लेकर सीएम रहे और आज भी है। ;अकेले गढ़वाल क्षेत्र की बात करू तो गढ़वाल के किrameshसी भी क्षेत्र से लोग एक दिन में देहरादून पहुंच सकते हैं। यही हाल कुमाउ का भी है वहां से भी एक दिन में लोग देहरादून आ सकते हैं। वशर्तें कि सड़के ठीक हों और बारिश का मौसम न हो।द्ध लेकिन उनसे जैसे हम लखनउ में मिलते थे आज नहीं मिल सकते क्योंकि आज वह इतने बिजी हो गए हैं कि उन्हें जनता की कम अपनी जेब की चिंता ज्यादा लगी रहती है और वह अपनी जनता का ध्यान नहीं रख पाते। यह टिप्पणी किसी व्यक्ति विशेष के लिए नहीं, बल्कि राज्य के उन सभी 70 विधायकों के लिए है जो यहां जनता के प्रतिनिधि तो बने हैं पर जनता के कम कमा कर देने वालों के अधिक हैं। आम जनता उनकी ओर से आये-जाये, उन्हें उससे कुछ नहीं लेना देना है। वही लखनउ की बात तो अलग ही थी, आज वो………..।

जिंदगी पहाड़ जैसी ही दुरूह
बात लखनउ के समय की हो रही है उस समय ये जो उत्तराखंड की जनता है उस समय तक किसी भी बाहरी को ‘दिल्ली वाला’ बोलती थी जो की इधर घूमने आया है, घूम फिर कर चला जायेगा। इसके बाद अलग राज्य की बात उठी, वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली के समय किये गए वादे तो नेहरू जी ही भूल चुके थे तो कोई और क्या करता। लेकिन इस क्षेत्र से आने वाले सबसे महान जिन्दा पीर बन चुके विकास पुरुष डीएनए ब्राण्ड एनडी तिवाड़ी बीच में आ गए की राज्य का बंटवारा मेरी लाश पर होगा, अनुभवी आदमी थे, उनको पता था की पहाड़ रहने के लिए ठीक नहीं। मौसम ठीक रहे तो सेहत के लिए पहाड़ जाया जाता है, वर्ना वहां की जिंदगी पहाड़ जैसी ही दुरूह है।

 

औरतों की इज्जत आबरू लूटवा दी

लाश तिवाड़ी जी की क्या गिरती, उनके चेले मुलायम सिंह ने लाशें गिरवायीं। उत्तराखंड राज्य की मांग को लेकर दिल्ली में प्रदर्शन को जा रहे उत्तराखंडियों पर मुलायम सिंह ने गोलियां चलवा दी, औरतों की इज्जत आबरू लूटवा दी। यह मैं नहीं कह रहा राज्य में राजनीति कर रहे दल समय-समय पर कहते रहे हैं और आज भी मंचों पर कहते है। उस समय दिल्ली दरबार तक अपनी बात रखने जा रहे आन्दोलनकारी महिलाओं के साथ मुलायम सिंह की फौज ने बलात्कार किये। कितने युवक-युवतियों की हत्या की गयी। सब क्षुब्( थे पर यातना की खबर दिल्ली नहीं पहुंची, यहाँ तक की तब लोगों ने भी काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के पास महेंद्रवी के गेट पर इसके विरोध में धरना और चक्का जाम किया था।

 

photo by-naveen pandey.
photo by-naveen pandey.

उत्तराखंड सहित देश यहां तक की विदेशों में भी कहां-कहां तक आंदोलन होते रहे इसका जिक्र तो पूरा नहीं कर सकता, लेकिन राज्य की मांग को लेकर अपनी आवाज दिल्ली दरबार तक पहुंचाने जा रहे लोगों के साथ हुए अत्याचार के बाद भी दिल्ली उदासीन थी, हाँ एक बड़े साहब थे जिन्होंने बलात्कार और फायरिंग को निर्देशित किया था उनका बयान आया था की गन्ने के खेत में किसी भी आदमी को कोई महिला मिलेगी तो क्या करेगा। उनकी ऐसी समझ से प्रभावित हो कर मुलायम और बाद में भारतीय जनता पार्टी ने इतना उपकृत किया जैसे लगा की ये बदजात अपने बाप का कर्जा उतार रहे हैं। अदालत भी इलाहाबाद थी बाद में वहां से मामला नए राज्य की अदालत में भी आया पर जैसा की हमेशा न्याय बलात्कारियों और हत्यारों के पक्ष में रहता है, यहाँ भी वही हुआ। बल्कि अब तो हत्यारे सीधे-सीधे सरकार में आ गये हैं और आन्दोलनकारियों के मापदंड तय कर रहे हैं। राज्य के वे आंदोलनकारी आज क्षुब्ध हैं, जिन्होंने राज्य के निर्माण में बिना किसी स्वार्थ के लड़ाई लड़ी थी और आज खुद को ठगा सा महसूस कर रहे हैं।
आंदोलन के दौरान हुए विभत्स पर पर्दा डालकर और आंदोलन की जलती ज्वाला को शांत करने के लिए यह जरूरी हो गया था कि अलग राज्य बना दिया जाए। इस पर काफी मंथन चला और आखिरकार राज्य का निर्माण जैसे-तैसे हो ही गया। राज्य के लोगों का बलिदान उस समय सफल हुए और लोगों के मन में उम्मीद जगी की अब आने वाले समय में उनकी मांग और उनके विकास के साथ बैरोजगारी और पहाड़ का भला हो जाएगा, लेकिन आज तक यह एक सपना बना हुआ है। उस समय राज्य बना तो बिना इलेक्शन के कीचड़ में सने कमल ने इलाके को लपेट लिया क्योंकि तब यूपी में भाजपा की सरकार थी और पहाड़ में भाजपा के कमल के प्रति लोगों की श्र(ा थी। यह कहा जाए कि पहाड़ में भाजपा का जनाधार था तो इस बात मेें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। इस भू-भाग की जनता खुश थी कि उनकी अपनी सरकार आ गयी और अब जल्द ही इस राज्य का भला हो जाएगा। यह वही उत्तराखंड की जनता थी जो उस समय तक किसी भी बाहरी को ‘दिल्ली वाला’ बोलती थी जो की इधर घूमने आया है, घूम फिर कर चला जायेगा। कभी कभी दिल्ली वाले जमीन भी खरीदते थे,

 

फिर गाँव का आदमी जमीन बेचने के बदले मिले पैसे की दारू पी जाता और उसी जमीन की चौकीदारी में लग जाता। दिल्ली वाला उसको अपनी गाड़ी में घुमा लेता तो क्या पूछना, अगल-बगल उसकी इज्जत बढ़ जाती और सब अपनी भी जमीन के सौदे के फेharish-rawat-copyर में पड़ जाते। क्योंकि दिल्ली वाले ये भी बोलते की होटल बनायेंगे और सबको बर्तन-भांडा मांजने की नौकरी मिल जाएगी। यह सपना लिये लोग समय के चक्र के साथ आगे बढ़ते रहे और समय कब चला गया कुछ पता ही नहीं चला और सरकार क्या बनी दिल्ली वालों का पूरा कब्जा हो गया। सरकार में गवर्नर एक पंजाबी और मुख्यमंत्री एक देशी को बनाया गया ताकि उत्साह में स्थानीय लोग ‘बाहरियों’ के साथ भेदभाव न करें। हुक्मरानों की समझ कितनी शातिर होती है, जनता भले न ध्यान दे पर माहौल दिल्ली वाले ही बनाते हैं। बूडे़ मुख्यमंत्री का पूरा कार्यकाल कोने-कोने में जा कर ढोल-दमाऊँ के साथ नाचने और स्वागत समारोह में बीत गया। फिर एक संघी प्रचारक बैचलर मुख्यमंत्री बने, सीधे -साधे कहे जाने वाले, जिनको आजकल साधे रखने के लिए दिल्ली में भाजपा मुख्यालय के बगल वाली कोठी मिली हुई है। उनसे एक बार उनसे पूछा की नए राज्य से क्या फायदा हुआ तो भोला भाला जवाब था की अब मैं हेलीकाप्टर में उड़ता हूँ जो कभी सपने में भी नहीं सोचा था।

ध्यान दीजिएगा की राजधानी देहरादून है जो कहीं से भी पहाड़ी कल्चर और समस्याओं से बहुत दूर की घाटी
ध्यान दीजिएगा की राजधानी देहरादून है जो कहीं से भी पहाड़ी कल्चर और समस्याओं से बहुत दूर की घाटी

ध्यान दीजिएगा की राजधानी देहरादून है जो कहीं से भी पहाड़ी कल्चर और समस्याओं से बहुत दूर की घाटी

ध्यान दीजिएगा की राजधानी देहरादून है जो कहीं से भी पहाड़ी कल्चर और समस्याओं से बहुत दूर की घाटी है। बाद में दूसरे मुख्यमंत्री हुए तो उन्होंने शिशुमंदिर के शिक्षक के रूप में जो पढाया था सब भूल गए और उनकी छवि मरहूम प्रमोद महाजन वाली बन गयी, लोकल अमर सिंह कहने में दिक्कत है क्योंकि अमर सिंह का एप्रोच ग्लोबल है। ये कविता कहानियाँ भी लिखते रहे और महान साहित्यकार के रूप भी पार्टी में प्रसि( हो गए, खुले आम भ्रष्टाचार के आरोप में हटाये गए और इनके कौशल को सम्मान देते हुए इन्हें दिल्ली वालों ने बड़ा पद दे दिया और ये आजकल नेशनल कमेटी में कुछ हैं। फिर फौजी आये बड़े ईमानदार, इतने ईमानदार की काँग्रेस प्रत्याशी के विरु( चुनाव में नहीं खडे़ हुए क्योंकि वो इनका नजदीकी रिश्तेदार था। कहीं और से लड़े जहाँ इनको हराने के लिए इनकी ही पार्टी के लोगों ने दिन रात एक कर दिया और आर्मी ने अपने जनरल को हरा कर विजय का जश्न मनाया।

कांग्रेस से एकोहम वाली मुद्रा में तिवाड़ी जी की किवाड़ी
कांग्रेस से एकोहम वाली मुद्रा में तिवाड़ी जी की किवाड़ी

कांग्रेस से एकोहम वाली मुद्रा में तिवाड़ी जी की किवाड़ी
कांग्रेस से एकोहम वाली मुद्रा में तिवाड़ी जी की किवाड़ी खुल गयी, अपनी लाश पर ही बंटवारे की बात करने वाले पंडीजी लखनऊ और दिल्ली की फौज लेकर पहाड़ में मौज करने आ गए। मौजी स्वभाव देख आला कमान ने प्रधानमंत्री मैटेरियल रहे पडित जी को साऊथ में गवर्नर बना कर भेज दिया क्योंकि घर के पास के पार्क में रोज भेलेनटाईन डे मनाने पर बहुत खतरा होता है। दक्षिण में भी गवर्नर हॉउस में इनका सिनेमा बन गया और ये उत्तर की तरफ वानप्रस्थ में आ गए। इसके बाद सबसे बड़ा धोखा हुआ राज्य के साथ और ऐसे व्यक्ति को दिल्ली की महारानी ने देहरादून में स्थापित कर दिया जिनका यहाँ से इतना ही सम्बन्ध है की इनके पिता जी इस इलाके में पैदा हुए थे। पर इनके पिताजी ऐसे व्यक्ति थे जिनके बारे में इंदिरा गाँधी ने कहा था की उनके जीवन में बस बार खुद उनको चल कर किसी के दरवाजे जाना पड़ा था और वो थे हेमवती नंदन बहुगुणा। पर उसी शख्सियत के पुत्र का हेलीकाप्टर हमेशा तैयार रहता है की न जाने कब दिल्ली दरबार जाना पड़ जाए। और तो और राहुल बाबा की सार्वजनिक चरण वंदना करने पर बहादुर स्वाभिमानी सैनकों के राज्य के इस मुखिया को राहुल बाबा ने सबके सामने लताड़ लगाई।

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क्या पहाड़ में आज कल आफत है
क्या पहाड़ में आज कल आफत है? पहाड़ में तो हमेशा आफत है, तफरीह करने वाले मजे में हैं क्योंकि दिल्ली वालों ने ऐसा पासा चला की हर घर में उनके एजेंट बन गए हैं। ठेकेदार और नेता हर गाँव में पैदा हो गए, जो धीरे धीरे दिल्ली वालों जैसे ही हो गए हैं। आपदा प्रबंधन की बात मत करिए, जिनसे आपको आशाएं हैं वो अपनी दीवारें मजबूत करने में लगे हैं। बरसात हमेशा बहुत कुछ बहा ले जाती है पर अब तो राजधानी भी पानी-पानी हो गई है, बह जाए कुछ दिल्ली वाली घास और गंधाता कीचड़ भी तब समझ में आये की ऊपर वाले की लाठी बराबर चलती है वर्ना ये ही सच है की भगवान भी बस अमीरों का है। उत्तराखंड राज्य बने एक दशक से भी अधिक का समय हो गया है और राज्य के नेताओं चाहे वह भाजपा के हों या फिर कांग्रेस के दिल्ली के दरबार में दौढ़ अभी तक बंद नहीं हुई। राज्य बनने के पीछे की मंशा आज भी पूरी नहीं हुई। राज्य के विकास की योजनाएं आज भी दिल्ली दरबार के इसारे पर बनती और लागू होती हैं। उत्तराखंड में तो आज दिन तक स्थाई राजधानी तक नहीं बन पायी आप खुद ही सोचिए कि इस राज्य का भला कब और कैसे होगा। राज्य की जनता को क्या फिर से आंदोलन करना होगा या फिर चुपचाप दिल्ली दरबार की ओर निगाहें लगानी होंगी या फिर…..।

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